सन् 1950 में सत्यजित राय लंदन में थे। एक विज्ञापन एजेंसी की नौकरी उन्हें वहाँ ले गयी थी। उन दिनों उन्होंने वित्तोरियो डे सिका की 'बाइसिकिल थीव्ज़' देखी, और उस एक फिल्म ने उन्हें भीतर से हिला दिया। उसमें न स्टूडियो की चमक थी, न पेशेवर सितारे, न कोई भव्यता। बस एक आदमी, उसका बेटा, और एक चोरी गयी साइकिल।

राय पहले ही बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास 'पाथेर पांचाली' के एक संस्करण के लिए रेखाचित्र बना चुके थे, यानी वह कहानी उनके भीतर बैठी हुई थी। लंदन की उस शाम के बाद वह बैठी हुई कहानी हिलने लगी।

यह ध्यान देने लायक बात है। विचार उस दिन पैदा नहीं हुआ था। वह पहले से मौजूद था। उस दिन जो हुआ, वह यह था कि उन्हें दिख गया कि इस विचार को फिल्म कैसे बनाया जा सकता है।

लगभग हर फिल्म की शुरुआत ऐसी ही होती है। एक चीज पहले से भीतर पड़ी रहती है, और किसी दिन दूसरी चीज आकर उसे जगा देती है।

विचार और कहानी एक चीज नहीं है

नये लेखक अक्सर कहते हैं कि उनके पास एक जबरदस्त विचार है। बात करने पर पता चलता है कि उनके पास एक स्थिति है।

"एक आदमी की याददाश्त चली जाती है।" यह विचार है। "एक आदमी की याददाश्त चली जाती है, और जो लोग उसे संभाल रहे हैं, वे नहीं चाहते कि उसे कुछ याद आए।" अब इसमें कहानी की गुंजाइश बन गयी, क्योंकि अब इसमें विरोध है।

विचार एक बीज है, और बीज को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पेड़ कैसा होगा। आपको उसे बोना पड़ता है। इस पोस्ट का पूरा काम यही है कि बोना कैसे है।

विचार कहाँ से आते हैं

पाँच स्रोत ऐसे हैं जिनसे ज्यादातर फिल्में निकलती हैं।

अपना जीवन। यह सबसे भरोसेमंद खान है और सबसे कम इस्तेमाल की जाने वाली भी। जेनिफर ग्रिसांती ने अपनी पुस्तक में यही तर्क दिया है कि लेखक के अपने अनुभव में, खास तौर पर उसकी चोटों में, वह सामग्री पड़ी होती है जो किसी और के पास नहीं है। यह सोचना गलत है कि हमारी जिंदगी साधारण है। कहानी बड़ी घटना से नहीं, सच्चे भाव से बनती है।

दूसरों का जीवन। वह बात जो आपने ट्रेन में सुनी, वह किस्सा जो चाचा बार-बार सुनाते हैं, वह मोहल्ला जिसमें एक अजीब आदमी रहता था। लेखक का आधा काम सुनना है।

समाचार और सच्ची घटनाएँ। अखबार में छपी दो पंक्तियाँ अक्सर एक पूरी फिल्म का सिरा होती हैं। ध्यान रहे कि खबर घटना देती है, कहानी नहीं। कहानी तब बनेगी जब आप उस घटना के भीतर किसी एक आदमी को खड़ा करेंगे।

साहित्य और रूपांतरण। उपन्यास, कहानी, नाटक, आत्मकथा। भारत में यह परंपरा बहुत पुरानी और बहुत समृद्ध रही है। रूपांतरण पर हम आगे एक अलग पोस्ट में विस्तार से आएँगे।

कोई छवि या प्रश्न जो पीछा न छोड़े। कभी-कभी विचार कहानी की शक्ल में नहीं, एक दृश्य की शक्ल में आता है। खाली कमरे में बजता हुआ टेलीफोन। बारिश में खड़ी एक औरत। ऐसी छवि को तुरंत समझाने की कोशिश मत कीजिए, उसे कुछ दिन अपने पास रहने दीजिए।

विचार तीन शक्लों में आता है

व्यवहार में विचार तीन में से किसी एक रूप में आता है, और हर रूप को आगे बढ़ाने का तरीका अलग है।

स्थिति के रूप में। जैसे, एक गाँव को अंग्रेजों से क्रिकेट मैच खेलना पड़ता है। यहाँ आपके पास ढाँचा है, पात्र नहीं। इसलिए अगला काम यह पूछना है कि इस स्थिति में सबसे ज्यादा किसका नुकसान होगा। वही आपका नायक है।

पात्र के रूप में। जैसे, एक बूढ़ा आदमी जो अपनी वंशावली की किताबें किसी को नहीं देना चाहता। यहाँ आपके पास आदमी है, घटना नहीं। इसलिए अगला काम यह पूछना है कि इस आदमी से वह चीज छीनने के लिए कौन आएगा।

छवि के रूप में। यहाँ आपके पास न आदमी है न घटना, केवल एक भाव है। यह सबसे नाजुक शुरुआत है और अक्सर सबसे मौलिक फिल्में इसी से बनती हैं। यहाँ जल्दबाजी सबसे ज्यादा नुकसान करती है।

विचार की परख: पाँच सवाल

हर विचार फिल्म नहीं बनता। कुछ विचार अच्छे दृश्य भर होते हैं, कुछ अच्छी शॉर्ट फिल्म बनते हैं, और कुछ केवल अच्छी बातचीत होते हैं। दो साल की मेहनत लगाने से पहले अपने विचार से ये पाँच सवाल पूछ लीजिए।

  1. इसमें कोई है जो कुछ चाहता है? अगर उत्तर नहीं है, तो अभी यह विचार नहीं, विषय है।
  2. इसमें कोई है जो उसे रोकेगा? विरोध के बिना विचार समतल रहेगा।
  3. क्या यह दो घंटे तक टिक सकता है? कुछ विचार बीस मिनट में चुक जाते हैं। यह दोष नहीं है, यह सूचना है। ऐसा विचार शॉर्ट फिल्म का है।
  4. क्या मैं इसके साथ दो साल रह सकता हूँ? एक फिल्म लिखने, बनाने और रिलीज करने में इतना समय तो लगता ही है। जो विचार आपको एक हफ्ते बाद उबाने लगे, वह आपका विचार नहीं है।
  5. क्या यह दिखाया जा सकता है? फिल्म देखी जाती है। जो विचार केवल बहस में मौजूद रहता है और जिसे बाहर से देखा नहीं जा सकता, वह निबंध का विचार है।

पाँचों का उत्तर हाँ होना जरूरी नहीं। लेकिन जहाँ नहीं है, वहाँ आपको पता होना चाहिए कि आप वहाँ काम करने जा रहे हैं।

बीज को उगाने की विधियाँ

अब असली काम। विचार हाथ में है, उसे कहानी कैसे बनाएँ।

'क्या हो अगर' को दस बार दोहराइए। पहली बार में जो आता है, वह आम तौर पर सबसे घिसा हुआ उत्तर होता है। दसवें उत्तर तक पहुँचते-पहुँचते आप वहाँ होते हैं जहाँ बाकी लोग नहीं पहुँचे।

सबसे बुरी स्थिति खोजिए। अपने पात्र से पूछिए कि इस दुनिया में उसके साथ सबसे बुरा क्या हो सकता है। फिर वही उसके साथ कीजिए। लेखक की दया कहानी की सबसे बड़ी दुश्मन है।

उल्टा सवाल पूछिए। अगर आपका विचार यह है कि एक ईमानदार अफसर व्यवस्था से लड़ता है, तो पूछिए कि क्या हो अगर वह व्यवस्था का हिस्सा बनकर ही लड़े। मौलिकता प्रायः नये विषय से नहीं, जाने-पहचाने विषय के उल्टे कोण से आती है।

पात्र को नाम, उम्र और पता दीजिए। जब तक वह "एक आदमी" है, वह किसी का नहीं है। जिस दिन वह "छत्तीस साल का रमेश, जो गाजियाबाद में किराये के कमरे में रहता है" बन जाता है, उसी दिन से वह अपने फैसले खुद लेने लगता है।

अंत का अनुमान लगाइए, फिर उसे मत मानिए। पहला अंत जो सूझे, उसे लिख लीजिए, क्योंकि वह आपको दिशा देगा। लेकिन उससे चिपकिए मत। अच्छे लेखक प्रायः बीच रास्ते में बेहतर अंत खोज लेते हैं।

विचार को एक हफ्ता अकेला छोड़ दीजिए। जो विचार एक हफ्ते बाद भी लौटता है, वह टिकाऊ है। जो भूल जाता है, उस पर दो साल क्यों लगाना।

अपने अनुभव का इस्तेमाल कैसे करें

निजी अनुभव पर एक चेतावनी जरूरी है।

अपनी जिंदगी से कहानी निकालने का अर्थ अपनी जिंदगी लिख देना नहीं है। डायरी और पटकथा में यही फर्क है। डायरी में लेखक को सफाई चाहिए होती है, पटकथा में उसे सच चाहिए होता है, और वे दोनों अक्सर एक जगह नहीं होते।

इसलिए तथ्य बदल दीजिए और भाव बचा लीजिए। अगर आपके पिता से आपका झगड़ा एक नौकरी को लेकर हुआ था, तो फिल्म में वह झगड़ा जमीन को लेकर हो सकता है, शहर छोड़ने को लेकर हो सकता है, शादी को लेकर हो सकता है। जो चीज नहीं बदलनी चाहिए, वह उस झगड़े के बाद की चुप्पी है। भावनात्मक सच ही वह चीज है जो दर्शक तक पहुँचती है।

वरुण ग्रोवर ने बनारस में बिताए अपने वर्षों से 'मसान' का संसार निकाला। वह उनकी अपनी कहानी नहीं है। वह उनका देखा हुआ शहर है, उसकी नैतिकता है, उसका डर है। यही सही अनुपात है।

नोटबुक की आदत

आखिरी और सबसे व्यावहारिक बात।

विचार सुविधा देखकर नहीं आते। वे बस में, नींद के ठीक पहले, किसी की बात के बीच में आते हैं, और बीस मिनट में चले जाते हैं। इसलिए हर लेखक के पास एक जगह होनी चाहिए जहाँ वह उन्हें तुरंत डाल सके। कागज की डायरी हो या फोन का नोट, इससे फर्क नहीं पड़ता। आदत से फर्क पड़ता है।

दो साल बाद जब आप वह नोटबुक पलटेंगे, तो दो चीजें मिलेंगी। पहली, कुछ ऐसे विचार जिन्हें आप पूरी तरह भूल चुके थे। दूसरी, और ज्यादा कीमती, यह पता चलेगा कि आप बार-बार किन चीजों की ओर लौटते हैं। वही आपका असली विषय है।

आम भूलें

  1. स्थिति को कहानी मान लेना। जब तक विरोध नहीं, तब तक कहानी नहीं।
  2. पहला ही उत्तर पकड़ लेना। जो सबसे पहले सूझता है, वह सबको सूझता है।
  3. विचार को बहुत जल्दी बताना। कच्चे विचार को दस लोगों को सुनाने से वह कमजोर पड़ जाता है, क्योंकि हर कोई अपनी राय उसमें डाल देता है। उसे पहले खुद थोड़ा मजबूत कर लीजिए।
  4. निजी अनुभव को ज्यों का त्यों उतार देना। तब लेखक पात्रों को माफ करने लगता है।
  5. विचार इकट्ठा करते रहना, उगाना कभी नहीं। सौ विचारों की सूची से एक लिखी हुई कहानी हमेशा भारी है।

अभ्यास

एक कागज लीजिए और अपनी जिंदगी की पाँच ऐसी घटनाएँ लिखिए जिन्हें याद करके आज भी भीतर कुछ हिलता है। शर्म, गुस्सा, अपराधबोध, बेबसी, कोई भी भाव।

अब उनमें से एक चुनिए। उसे तीन पंक्तियों में लिखिए, लेकिन इस तरह कि उसमें आप न हों। नाम बदल दीजिए, जगह बदल दीजिए, पेशा बदल दीजिए। केवल भाव वैसा ही रहने दीजिए।

अब उससे पूछिए, क्या हो अगर यही घटना दस साल बाद दोहरायी जाए। यहीं से आपकी कहानी खुलनी शुरू होगी।

सार

  • विचार कहानी नहीं है। विचार बीज है, कहानी उसे उगाने से बनती है।
  • विचार पाँच जगहों से आते हैं: अपना जीवन, दूसरों का जीवन, खबरें, साहित्य, और कोई छवि जो पीछा न छोड़े।
  • हर विचार दो घंटे की फिल्म नहीं बनता। पाँच सवालों से उसकी परख पहले कर लीजिए।
  • विचार को उगाने की सबसे कारगर विधियाँ हैं, 'क्या हो अगर' को कई बार दोहराना, सबसे बुरी स्थिति खोजना, और पात्र को ठोस पहचान देना।
  • निजी अनुभव का उपयोग तथ्य बदलकर और भाव बचाकर कीजिए। डायरी लिखना पटकथा लिखना नहीं है।

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  • रूपांतरण (Adaptation): उपन्यास से पर्दे तक

संदर्भ पुस्तकें: जेनिफर ग्रिसांती, स्टोरी लाइन · लाजोस एग्री, द आर्ट ऑफ ड्रामैटिक राइटिंग · सिडनी ल्यूमेट, मेकिंग मूवीज

संदर्भ फिल्में: पाथेर पांचाली (1955) · बाइसिकिल थीव्ज़ (1948) · मसान (2015) · लगान (2001)