किसी भी प्रोडक्शन ऑफिस में जाइए। आपके बैठते ही, चाय आने से भी पहले, एक सवाल आता है।
"कहानी क्या है?"
यहीं पर ज्यादातर लेखक फिसल जाते हैं। वे शुरू करते हैं, "देखिए सर, एक लड़का है, वह मेरठ का रहने वाला है, उसके पिता रेलवे में थे, फिर उनका ट्रांसफर हो गया..." और पाँच मिनट बाद सामने बैठे आदमी का ध्यान उसके फोन पर चला जाता है।
लॉगलाइन इसी समस्या का हल है। यह एक या दो वाक्यों में लिखी गयी आपकी पूरी फिल्म है, इस तरह कि सुनने वाला उसे एक बार में पकड़ ले और दिन भर याद रखे।
लेकिन इसे केवल बेचने का औजार समझना गलती होगी। असल में लॉगलाइन सबसे पहले लेखक के अपने काम आती है, और यह पोस्ट ज्यादातर इसी बात पर है।
लॉगलाइन में क्या होता है
एक काम की लॉगलाइन में पाँच चीजें होती हैं। सब हमेशा शब्दों में नहीं आतीं, लेकिन लेखक के मन में पाँचों साफ होनी चाहिए।
- नायक, एक विशेषण के साथ। केवल "एक आदमी" काफी नहीं। "अपने हाथ गँवा चुका एक पूर्व पुलिस अधिकारी" में स्थिति भी है और सीमा भी।
- वह घटना जो उसे धक्का देती है। कहानी किस दिन से शुरू होती है।
- उसका लक्ष्य। वह अब क्या करना चाहता है।
- विरोध। कौन या क्या उसे रोक रहा है।
- दाँव या मोड़। असफल होने पर क्या जाएगा, या स्थिति में वह एक विडंबना क्या है जो इसे बाकी सबसे अलग करती है।
इनका ढाँचा मोटे तौर पर ऐसा बनता है। एक [विशेषण वाला नायक] को [घटना] के बाद [लक्ष्य] पाना है, लेकिन [विरोध] रास्ते में है, और असफल हुआ तो [नुकसान]।
यह सूत्र सहारा है, बेड़ी नहीं। जिस दिन आपकी लॉगलाइन सूत्र की तरह पढ़ी जाने लगे, उसे तोड़ दीजिए। पाँचों जानकारियाँ बची रहनी चाहिए, ढाँचा नहीं।
उदाहरण
सिद्धांत से ज्यादा काम उदाहरण करते हैं। नीचे कुछ जानी-पहचानी फिल्मों की लॉगलाइनें हैं।
शोले। अपने हाथ गँवा चुका एक पूर्व पुलिस अधिकारी दो छोटे-मोटे चोरों को किराये पर लाता है ताकि वे उस डाकू को जिंदा पकड़ लाएँ जिसने उसका पूरा परिवार खत्म कर दिया था।
लगान। सूखे से त्रस्त एक गाँव का नौजवान किसान अंग्रेज अफसर की शर्त मान लेता है कि अगर गाँववाले क्रिकेट मैच जीत गये तो तीन साल का लगान माफ होगा और हार गये तो तिगुना देना होगा, जबकि गाँव में यह खेल किसी ने कभी खेला तक नहीं है।
दृश्यम। चौथी कक्षा तक पढ़ा एक केबल ऑपरेटर, जिसकी पूरी दुनिया फिल्मों से बनी है, अपने परिवार को एक हत्या के आरोप से बचाने के लिए पुलिस के सामने एक पूरी झूठी याद गढ़ देता है।
अंधाधुन। अंधा होने का नाटक करता एक पियानो वादक एक हत्या का अकेला गवाह बन जाता है, और अब जिंदा रहने के लिए उसे अपना झूठ बनाए रखना है।
इन चारों में ध्यान दीजिए कि कहीं भी रहस्य नहीं रखा गया है। लॉगलाइन का काम उत्सुकता जगाना है, चीज छिपाना नहीं।
लॉगलाइन वह नहीं है जो लोग समझते हैं
तीन चीजें हैं जिनसे इसे अक्सर गड्डमड्ड कर दिया जाता है।
टैगलाइन नहीं है। पोस्टर पर छपने वाली पंक्ति प्रचार की चीज है। वह जानबूझकर अधूरी होती है। लॉगलाइन इसके उलट पूरी होती है।
सिनॉप्सिस नहीं है। सिनॉप्सिस में पूरी कहानी होती है, शुरू से अंत तक, कई अनुच्छेदों में। लॉगलाइन एक या दो वाक्य है।
थीम नहीं है। "यह फिल्म दोस्ती की कीमत के बारे में है", यह थीम का बयान है। लॉगलाइन में घटना होनी चाहिए, दलील नहीं।
असली फायदा: यह लेखक की जाँच है
अब मुख्य बात।
अगर आप अपनी फिल्म की लॉगलाइन नहीं लिख पा रहे, तो लगभग हमेशा इसका कारण भाषा नहीं होती। कारण यह होता है कि कहानी में ही कोई चीज साफ नहीं है।
लॉगलाइन अटकने के चार आम कारण हैं, और हर कारण एक अलग बीमारी की ओर इशारा करता है।
- नायक का नाम लिखते ही रुक जाना। इसका अर्थ है कि आपको खुद पता नहीं कि फिल्म किसकी है। जब तक यह तय नहीं होगा, दर्शक भी किसी के साथ नहीं बैठेगा।
- लक्ष्य लिखते समय शब्द न मिलना। इसका अर्थ है कि आपका नायक कुछ चाहता ही नहीं, केवल चीजें उसके साथ हो रही हैं। ऐसी पटकथा पढ़ने में सुस्त लगती है।
- विरोध की जगह खाली रह जाना। इसका अर्थ है कि आपकी कहानी में टकराव कमजोर है। यह सबसे खतरनाक बीमारी है और सबसे आम भी।
- दो वाक्यों में बात न सिमटना। इसका अर्थ प्रायः यह होता है कि आप दो फिल्में एक साथ लिख रहे हैं।
इसीलिए मैं सलाह देता हूँ कि लॉगलाइन दो बार लिखी जाए। एक बार पटकथा शुरू करने से पहले, जिससे दिशा साफ रहे। दूसरी बार पहला ड्राफ्ट पूरा होने के बाद, बिना पुरानी वाली देखे। अगर दोनों लगभग एक जैसी निकलीं, तो आपने वही फिल्म लिखी जो लिखने चले थे। अगर बहुत अलग निकलीं, तो रुककर तय कीजिए कि इनमें से बेहतर कौन सी है। कई बार दूसरी वाली बेहतर होती है, और तब पुनर्लेखन की दिशा भी वहीं से मिल जाती है।
हर फिल्म की लॉगलाइन नहीं बनती
यह बात ईमानदारी से कह देना जरूरी है, क्योंकि पश्चिमी पटकथा-पुस्तकें इसे प्रायः छिपा जाती हैं।
'पाथेर पांचाली' की लॉगलाइन लिखने बैठिए तो अटक जाएँगे। उसमें कोई लक्ष्य नहीं है जिसे नायक पाना चाहता है। वह एक परिवार के कुछ बरसों का जीवन है, जिसमें गरीबी है, बच्चों का कौतूहल है, और अंत में एक मृत्यु है।
ऐसी फिल्मों के लिए लॉगलाइन की जगह केंद्रीय तनाव लिखिए। यानी वह वाक्य जो बताए कि यह फिल्म किन दो शक्तियों के बीच खिंची हुई है। 'पाथेर पांचाली' के लिए वह कुछ ऐसा होगा कि गाँव में टिके रहने की जिद और वहाँ से निकल जाने की मजबूरी के बीच एक परिवार धीरे-धीरे टूटता है।
यही बात कई समानांतर कहानियों वाली फिल्मों पर भी लागू होती है। 'मसान' में दो अलग धाराएँ हैं, इसलिए उसकी एक-वाक्य लॉगलाइन बनाना खींचतान होगी। वहाँ बेहतर तरीका यह है कि दो पंक्तियाँ लिखी जाएँ, एक हर धारा के लिए, और एक तीसरी पंक्ति में वह बताया जाए जो दोनों में साझा है, यानी वह शहर और उसकी नैतिकता।
भारतीय संदर्भ में एक जरूरी बात
हिंदी उद्योग में कहानी सुनाने की अपनी परंपरा है, जिसे नरेशन कहा जाता है। यहाँ लेखक निर्माता या कलाकार के सामने बैठकर पूरी फिल्म सुनाता है, दृश्य दर दृश्य, और यह दो घंटे तक चल सकता है।
इससे यह गलतफहमी फैल जाती है कि यहाँ लॉगलाइन की जरूरत नहीं है। सच इसका उल्टा है। नरेशन के पहले दो मिनट में आपको वह बात कहनी ही पड़ती है जो सामने वाले को बैठाए रखे। वे दो मिनट ही आपकी लॉगलाइन हैं, भले ही आप उसे इस नाम से न बुलाएँ।
और उससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि नरेशन के बाद जब वह आदमी अपने साथी को बताएगा कि उसने आज क्या सुना, तो वह दो घंटे नहीं बोलेगा। वह एक वाक्य बोलेगा। वह वाक्य आपने लिखकर दिया है या उसने खुद गढ़ा है, इसी से तय होता है कि आपकी फिल्म आगे किस शक्ल में पहुँचेगी।
आम भूलें
- रहस्य रखना। "और फिर जो होता है वह आप सोच भी नहीं सकते।" यह लॉगलाइन नहीं, बहाना है।
- अस्पष्ट नायक। "एक आदमी", "एक लड़की" से काम नहीं चलता। एक विशेषण चाहिए जो स्थिति बताए।
- बहुत लंबा लिखना। तीन वाक्यों से आगे जाते ही यह सिनॉप्सिस बनने लगती है।
- भावों की सूची बना देना। "यह प्रेम, त्याग और बदले की कहानी है।" इसमें कोई घटना नहीं है।
- शैली का दावा करना। "एक दिल को छू लेने वाली कहानी।" यह फैसला दर्शक करेगा, लेखक नहीं।
- नाम गिनाना। लॉगलाइन में एक या दो पात्रों से ज्यादा नाम आते ही वह उलझ जाती है।
अभ्यास
तीन काम कीजिए, इसी क्रम में।
पहला, अपनी पसंद की पाँच फिल्में लीजिए और हर एक की लॉगलाइन लिखिए, ज्यादा से ज्यादा दो वाक्य। इनमें कम से कम एक फिल्म ऐसी रखिए जिसमें साफ लक्ष्य न हो, ताकि पता चले कि तब क्या करना पड़ता है।
दूसरा, अपनी कहानी की लॉगलाइन लिखिए। जहाँ अटकें, वहाँ हार मत मानिए, बल्कि किनारे पर नोट कर लीजिए कि किस अंग पर अटके थे। वही आपकी कहानी की कमजोर जगह है।
तीसरा, अपनी लॉगलाइन किसी ऐसे व्यक्ति को सुनाइए जो फिल्मों का जानकार न हो। एक बार सुनाइए, फिर दस मिनट कुछ और बात कीजिए, और फिर पूछिए कि वह कहानी क्या थी। अगर वह दोहरा देता है, तो आपकी लॉगलाइन काम कर रही है।
सार
- लॉगलाइन एक या दो वाक्यों में लिखी गयी पूरी फिल्म है, जिसमें नायक, घटना, लक्ष्य, विरोध और दाँव मौजूद होते हैं।
- यह टैगलाइन, सिनॉप्सिस और थीम से अलग चीज है, और इसमें रहस्य नहीं रखा जाता।
- इसका सबसे बड़ा उपयोग बेचने में नहीं, लेखक की अपनी जाँच में है। जहाँ लॉगलाइन अटकती है, वहीं कहानी कमजोर है।
- इसे दो बार लिखिए, लिखने से पहले और पहला ड्राफ्ट खत्म होने के बाद, और दोनों की तुलना कीजिए।
- लक्ष्य-रहित या कई धाराओं वाली फिल्मों के लिए लॉगलाइन की जगह केंद्रीय तनाव लिखिए।
आगे पढ़ें
- पिछली पोस्ट: विचार से कहानी तक, बीज कैसे उगता है
- अगली पोस्ट: संघर्ष के बिना कहानी क्यों नहीं बनती
- सिनॉप्सिस, वन-पेजर और वन-लाइनर
संदर्भ पुस्तकें: लाजोस एग्री, द आर्ट ऑफ ड्रामैटिक राइटिंग · तेजस्विनी गांटी, प्रोड्यूसिंग बॉलीवुड
संदर्भ फिल्में: शोले (1975) · लगान (2001) · दृश्यम (2015) · अंधाधुन (2018) · पाथेर पांचाली (1955) · मसान (2015)
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