मध्य प्रदेश के भीमबेटका की गुफाओं में दीवारों पर बने चित्र हजारों साल पुराने हैं। उन चित्रों में शिकार है, भागते हुए जानवर हैं, हाथों में भाला लिए मनुष्यों की टोली है, और कहीं-कहीं नाचते हुए लोग हैं। जिसने वे चित्र बनाए, उसके पास लिपि नहीं थी। उसके पास शायद उतने शब्द भी नहीं थे जितने आज एक बच्चे के पास होते हैं। फिर भी उसने दीवार पर वह दर्ज किया जो घटा था, और इस तरह दर्ज किया कि आज भी देखने वाला समझ जाता है कि यहाँ कुछ हुआ था।

यही कहानी की सबसे पुरानी शक्ल है। आदमी ने पहिया बाद में बनाया, कहानी पहले बनायी।

घटना और कहानी एक चीज नहीं है

सबसे आम भूल यही है कि लोग घटनाओं की सूची को कहानी समझ लेते हैं।

"राजा मरा, फिर रानी मरी।" यह घटनाओं का क्रम है, सूचना है, समाचार है।

"राजा मरा, फिर रानी शोक में मर गयी।" अब यह कहानी है।

अंग्रेजी उपन्यासकार ई. एम. फ़ॉर्स्टर ने यह अंतर बहुत पहले बताया था और आज तक इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिला। दूसरे वाक्य में एक शब्द जुड़ा है, 'शोक में', और उसी एक शब्द से दो अलग-अलग मौतें आपस में जुड़ गयीं। अब पाठक केवल यह नहीं जानता कि क्या हुआ, वह यह भी जानता है कि क्यों हुआ। कारण और परिणाम का यह धागा ही कहानी को घटना से अलग करता है।

फिल्म में यह भूल और भी महँगी पड़ती है। नये लेखक अक्सर एक के बाद एक दृश्य लिख देते हैं, और हर दृश्य अपने आप में ठीक भी होता है, लेकिन उनके बीच कोई धागा नहीं होता। ऐसी पटकथा पढ़ने में चलती हुई लगती है और पर्दे पर रुक जाती है, क्योंकि दर्शक के भीतर कोई प्रश्न पैदा ही नहीं होता।

कहानी की तीन शर्तें

किसी भी कहानी को, चाहे वह दो मिनट की हो या तीन घंटे की, तीन चीजें चाहिए।

पहली शर्त: कोई हो जो कुछ चाहता हो। कहानी तब शुरू होती है जब कोई व्यक्ति किसी चीज की इच्छा करता है। वह इच्छा बड़ी हो सकती है, जैसे देश की आजादी, या बहुत छोटी, जैसे साइकिल वापस पाना। इच्छा का आकार मायने नहीं रखता। यह मायने रखता है कि वह इच्छा उस व्यक्ति के लिए कितनी जरूरी है।

दूसरी शर्त: उसे वह आसानी से न मिले। जिस क्षण पात्र को उसकी चाही हुई चीज मिल जाती है, कहानी खत्म हो जाती है। इसलिए कहानी का पूरा शरीर बाधा से बना होता है। बाधा दूसरा आदमी हो सकता है, समाज हो सकता है, व्यवस्था हो सकती है, प्रकृति हो सकती है, और सबसे दिलचस्प स्थिति में खुद वह पात्र हो सकता है।

तीसरी शर्त: अंत तक कुछ बदल जाए। यह वह शर्त है जिसे नये लेखक सबसे ज्यादा भूलते हैं। अगर फिल्म के आखिरी दृश्य में पात्र वहीं खड़ा है जहाँ पहले दृश्य में खड़ा था, और भीतर से भी वैसा ही है, तो जो बीच में हुआ वह कहानी नहीं, केवल हलचल थी। परिवर्तन बाहरी हो सकता है, जैसे कोई जीत या हार, और भीतरी भी, जैसे समझ का बदल जाना। सबसे अच्छी फिल्मों में दोनों होते हैं।

नाटक का असली ईंधन

अंग्रेजी नाट्य-समीक्षक विलियम आर्चर ने नाटक की जो परिभाषा दी थी, वह आज भी काम की है। उनके अनुसार नाटक प्रतीक्षा और अनिश्चय के मेल से बनता है। दर्शक को कुछ होने की उम्मीद हो, लेकिन यह पक्का न हो कि वह होगा ही।

यही वजह है कि केवल दुख दिखाने से कहानी नहीं बनती और केवल घटनाएँ भर देने से भी नहीं। दर्शक को भीतर से यह पूछते रहना चाहिए कि अब क्या होगा। जिस क्षण उसे उत्तर पहले से पता चल जाता है, उसका ध्यान टूट जाता है।

अनुभवी लेखक इसी कारण हर दृश्य के बाद खुद से पूछते हैं कि इस दृश्य ने दर्शक के मन में कौन सा नया प्रश्न पैदा किया। अगर कोई प्रश्न पैदा नहीं हुआ, तो वह दृश्य कहानी को आगे नहीं ले जा रहा।

भारतीय विरासत

भारत में कहानी कहने की परंपरा इतनी पुरानी और इतनी संगठित है कि उसे केवल मनोरंजन कहना गलत होगा।

पंचतंत्र में कहानी शिक्षा का औजार है। एक राजा के मूर्ख बेटों को नीति सिखाने के लिए विष्णु शर्मा ने उपदेश नहीं दिये, कहानियाँ सुनायीं, और कहानी के भीतर कहानी रखने की जो विधि उन्होंने अपनायी, वह आज की फिल्मों की फ्रेम नैरेटिव तकनीक से अलग नहीं है।

कथासरित्सागर में कहानियों का पूरा समुद्र है, जिसमें एक कथा दूसरी को जन्म देती जाती है। जातक कथाओं में कहानी नैतिक स्मृति का काम करती है।

भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में कहानी की चिंता इससे भी गहरी है। वहाँ प्रश्न यह नहीं है कि दर्शक को क्या दिखाया जाए, प्रश्न यह है कि दर्शक के भीतर कौन सा भाव जगाया जाए और उसे कैसे रस में बदला जाए। पश्चिमी पटकथा-सिद्धांत संरचना से शुरू करता है, भारतीय परंपरा भाव से शुरू करती है। एक भारतीय लेखक के लिए दोनों को साथ जानना फायदे का सौदा है, क्योंकि हमारा दर्शक दोनों से बना हुआ है।

गाँव का कथावाचक, रामलीला का मंच, नानी की कहानी और आज का तीन घंटे का सिनेमा, ये सब एक ही धारा की अलग-अलग शक्लें हैं।

फिल्म की कहानी अलग क्यों है

उपन्यास में लेखक सीधे बता सकता है कि पात्र के मन में क्या चल रहा है। फिल्म यह सुविधा नहीं देती। कैमरा केवल बाहर देख सकता है। इसलिए फिल्म की कहानी में भीतर की बात बाहर के व्यवहार से कहनी पड़ती है।

सत्यजित राय की 'पाथेर पांचाली' में जब दुर्गा की मृत्यु के बाद हरिहर घर लौटता है और शहर से लायी गयी साड़ी सर्वजया के सामने रखता है, तो कोई संवाद यह नहीं बताता कि उस औरत के भीतर क्या टूट रहा है। वह टूटना दिखता है। यही फिल्म की भाषा है।

वित्तोरियो डे सिका की 'बाइसिकिल थीव्ज़' में पूरी कहानी एक साइकिल की तलाश है। साइकिल बहुत छोटी चीज है। लेकिन उस साइकिल के बिना आदमी की नौकरी चली जाएगी, और नौकरी गयी तो परिवार भूखा रहेगा। इसलिए दर्शक के लिए वह साइकिल किसी खजाने से कम नहीं रह जाती। यह कहानी-लेखन का सबसे बड़ा सबक है। चीज को बड़ा मत बनाइए, उसके दाँव को बड़ा बनाइए।

आम भूलें

  1. घटनाओं की सूची को कहानी मान लेना। दृश्य एक के बाद एक हैं, लेकिन एक दूसरे से पैदा नहीं हो रहे।
  2. पात्र की इच्छा साफ न होना। अगर लेखक खुद एक वाक्य में नहीं बता सकता कि उसका नायक क्या चाहता है, तो दर्शक भी नहीं समझेगा।
  3. बाधा को कमजोर रखना। नायक जितनी आसानी से जीतेगा, दर्शक को उतना ही कम अच्छा लगेगा।
  4. अंत में कोई बदलाव न होना। फिल्म खत्म होती है, लेकिन कुछ हुआ ही नहीं लगता।
  5. भीतर की बात संवाद में कहलवा देना। पात्र से यह कहलवाना कि "मैं बहुत अकेला हूँ", उसका अकेलापन दिखाने की जगह ले लेता है।

अभ्यास

अपनी पसंद की कोई एक फिल्म चुनिए, जो आपने कम से कम दो बार देखी हो। अब उसे तीन वाक्यों में लिखिए।

पहला वाक्य: नायक कौन है और वह क्या चाहता है। दूसरा वाक्य: उसे वह क्यों नहीं मिल पा रहा। तीसरा वाक्य: अंत तक उसमें क्या बदल जाता है।

अगर तीनों वाक्य आसानी से लिखे गये, तो आपने फिल्म की कहानी पकड़ ली। अगर कोई एक वाक्य अटक रहा है, तो या तो फिल्म में वह चीज कमजोर है, या आपने उसे अभी ठीक से देखा नहीं है। दोनों ही स्थितियाँ सीखने लायक हैं।

यही अभ्यास अपनी लिखी हुई कहानी पर भी कीजिए। यहाँ अटकना ज्यादा जरूरी सूचना देता है।

सार

  • कहानी घटनाओं का क्रम नहीं, कारण और परिणाम से जुड़ा हुआ क्रम है।
  • हर कहानी को तीन चीजें चाहिए: कोई जो कुछ चाहता हो, उसके रास्ते में बाधा, और अंत तक परिवर्तन।
  • नाटक प्रतीक्षा और अनिश्चय से बनता है, इसलिए हर दृश्य को दर्शक के मन में नया प्रश्न पैदा करना चाहिए।
  • भारतीय परंपरा कहानी को भाव और रस की ओर से देखती है, पश्चिमी सिद्धांत संरचना की ओर से। भारतीय लेखक को दोनों चाहिए।
  • फिल्म भीतर की बात बाहर के व्यवहार से कहती है, इसलिए दिखाना कहने से हमेशा भारी पड़ता है।

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संदर्भ पुस्तकें: लाजोस एग्री, द आर्ट ऑफ ड्रामैटिक राइटिंग · भरत मुनि, नाट्यशास्त्र · ई. एम. फ़ॉर्स्टर, आस्पेक्ट्स ऑफ नॉवेल

संदर्भ फिल्में: पाथेर पांचाली (1955) · बाइसिकिल थीव्ज़ (1948) · मदर इंडिया (1957)