पिछली दो पोस्ट में हमने यह देखा कि कहानी क्या है और मनुष्य को उसकी जरूरत क्यों पड़ती है। अब दर्शन से उतरकर कारीगरी में आना चाहिए।

कोई भी फिल्म तीन सामग्रियों से बनती है: कथानक, पात्र और थीम। हर पटकथा में तीनों मौजूद होते हैं, चाहे लेखक ने उन्हें नाम दिया हो या नहीं। इन्हें अलग-अलग पहचानना और इनके बीच का सही क्रम समझना, पटकथा लेखक की पहली सचमुच व्यावहारिक जिम्मेदारी है।

तीनों की परिभाषा

कथानक वह है जो होता है। घटनाओं की वह शृंखला जो कारण और परिणाम से बँधी है।

पात्र वह है जिसके साथ होता है। लेकिन जैसा हम आगे देखेंगे, यह परिभाषा अधूरी है।

थीम वह है जिसके बारे में यह सब है। फिल्म की भीतरी दलील, वह सवाल जिसका जवाब पूरी फिल्म देती रहती है।

'शोले' का कथानक यह है कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी दो छोटे अपराधियों को किराये पर लाकर एक डाकू से बदला लेना चाहता है। पात्र ठाकुर, जय, वीरू, गब्बर, बसंती और राधा हैं। और थीम बदले की कीमत है, साथ ही उस दोस्ती की है जो बिना कहे निभायी जाती है।

तीनों अलग चीजें हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लेखक इन्हें एक ही मान लेता है।

असली क्रम: पात्र पहले

नये लेखक प्रायः कथानक से शुरू करते हैं। उनके पास एक दिलचस्प स्थिति होती है, कोई मोड़ होता है, कोई अंत होता है, और फिर वे उस स्थिति में डालने के लिए पात्र गढ़ते हैं।

लाजोस एग्री ने अपनी पुस्तक में यही सबसे बड़ी आपत्ति दर्ज की थी। उनका तर्क था कि कथानक पात्र से पैदा होता है, पात्र कथानक की जरूरत पूरी करने के लिए नहीं गढ़ा जाता। अगर आप जानते हैं कि आपका आदमी कौन है, वह किस डर से बना है, वह किस बात पर समझौता नहीं करेगा, तो आप उसे किसी भी दबाव में डाल दीजिए, वह खुद कुछ करेगा। और जो वह करेगा, वही आपका कथानक है।

इसकी जाँच आसान है। अगर आपकी कहानी में कोई दृश्य ऐसा है जहाँ पात्र वह काम कर रहा है जो उसे नहीं करना चाहिए था, केवल इसलिए कि आगे की घटना के लिए वह जरूरी था, तो वहाँ कथानक ने पात्र को दबा दिया है। दर्शक इसे तुरंत पकड़ लेता है, भले ही शब्दों में न बता पाए। वह बस इतना कहता है कि फिल्म बनावटी लग रही थी।

पात्र कोई व्यक्ति नहीं होता

यह बात पहली बार में उलटी लगती है, इसलिए धीरे से।

असल जिंदगी का आदमी हर दिशा में फैला हुआ होता है। उसमें सैकड़ों आदतें हैं, अनगिनत विरोधाभास हैं, बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो कहीं नहीं जातीं। फिल्म का पात्र ऐसा नहीं हो सकता। वह चुनी हुई चीजों से बना होता है, और जो चुना गया है वह कहानी के काम आता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि पात्र को सपाट बना दिया जाए। अर्थ यह है कि पात्र की जटिलता भी दिशा वाली होनी चाहिए। 'मदर इंडिया' की राधा में ममता और कर्तव्य दोनों हैं, और ये दोनों आपस में टकराते हैं। यही टकराव अंत में उस दृश्य को संभव बनाता है जहाँ माँ अपने ही बेटे पर गोली चलाती है। अगर उसमें दस और गुण जोड़ दिये जाते जिनका इस टकराव से कोई संबंध नहीं होता, तो वह दृश्य उतना भारी नहीं पड़ता।

एग्री पात्र को तीन तलों पर देखने की सलाह देते हैं: शारीरिक, सामाजिक और मानसिक। इस पर हम पात्र-निर्माण वाली पोस्ट में विस्तार से लौटेंगे। अभी इतना काफी है कि पात्र गढ़ना भरना नहीं, चुनना है।

पात्रों का जाल

एक और चीज जिसे नये लेखक लगभग हमेशा छोड़ देते हैं, वह यह है कि पात्र अकेले नहीं गढ़े जाते।

पात्र अपने संबंधों में ही दिखाई देता है। आदमी अपने पिता के सामने अलग होता है, अपने दोस्त के सामने अलग, और अपने दुश्मन के सामने अलग। अगर आपकी फिल्म के सारे पात्र एक जैसी सोच रखते हैं और एक जैसी भाषा बोलते हैं, तो संघर्ष नहीं बनेगा, चाहे कथानक में कितनी भी घटनाएँ हों।

एग्री इसे पात्रों की तालमेल-योजना कहते हैं। सीधी बात यह है कि आपके पात्र इस तरह चुने जाने चाहिए कि उनका आपस में टकराना अनिवार्य हो। 'शोले' में जय की चुप्पी और वीरू की बकबक कोई संयोग नहीं है। ठाकुर का ठंडापन और गब्बर की उग्रता भी नहीं। यही जोड़ियाँ फिल्म को खड़ा रखती हैं।

थीम: फिल्म असल में किसके बारे में है

थीम वह वाक्य है जो फिल्म साबित करती है।

'मदर इंडिया' कहती है कि सम्मान भूख से बड़ा है, और इसकी कीमत माँ चुकाती है। 'आनंद' कहती है कि जीवन की लंबाई नहीं, उसका भराव मायने रखता है। 'अंधाधुन' कहती है कि झूठ बोलकर बचना भी अपनी सजा साथ लाता है।

ध्यान दीजिए कि ये सब दावे हैं, विषय नहीं। 'दोस्ती' थीम नहीं है, वह विषय है। 'सच्ची दोस्ती वही है जो बिना कहे जान दे दे', यह थीम है। इस अंतर को न समझना नये लेखकों की सबसे आम भूल है।

एग्री ने इसी को प्रीमाइस कहा, और उनका कहना था कि बिना स्पष्ट प्रीमाइस के लिखी गयी रचना भटक जाती है। हम अगली पोस्टों में प्रीमाइस पर अलग से बात करेंगे, क्योंकि यह अपने आप में एक पूरा औजार है।

थीम खुद लेखक को चुनती है

एक दिलचस्प बात यह है कि अनुभवी लेखक प्रायः थीम तय नहीं करते, वे उसे खोज लेते हैं।

पहला ड्राफ्ट लिखा जाता है, और उसके बाद लेखक को दिखता है कि वह बार-बार किस चीज की ओर लौट रहा था। ऋत्विक घटक की फिल्मों में विभाजन बार-बार लौटता है। सत्यजित राय के यहाँ परंपरा और आधुनिकता का तनाव लौटता है। यह कोई योजना नहीं थी, यह उनके भीतर बैठा हुआ प्रश्न था।

इसलिए थीम की तलाश दूसरे ड्राफ्ट का काम है। पहले ड्राफ्ट में उसे जबरन तय करने की जरूरत नहीं।

थीम को पहले रख देने का खतरा

अब उलटी दिशा।

अगर लेखक थीम से शुरू करता है, और यह तय करके बैठ जाता है कि उसे दहेज के खिलाफ या शिक्षा के पक्ष में फिल्म लिखनी है, तो प्रायः एक ही चीज होती है। पात्र दलील के प्रवक्ता बन जाते हैं। वे बोलने लगते हैं और जीना बंद कर देते हैं। संवाद में वह सब आ जाता है जो लेखक साबित करना चाहता था, और दर्शक को ठीक वहीं से शक होने लगता है।

अच्छी विचारधारात्मक फिल्म भी इसी नियम से चलती है। वह साबित करती है, समझाती नहीं। 'दो बीघा जमीन' गरीबी पर भाषण नहीं देती, वह एक आदमी को कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा खींचते हुए दिखाती है, और दर्शक खुद नतीजे तक पहुँच जाता है।

यही कारण है कि लेखक के लिए सबसे उपयोगी क्रम प्रायः यह रहता है: पात्र से शुरू करो, कथानक को उससे निकलने दो, और थीम को बाद में पहचानो, फिर दूसरे ड्राफ्ट में उसे तेज करो।

भारतीय व्यावसायिक फिल्म पर एक टिप्पणी

हिंदी की मुख्यधारा फिल्म में थीम प्रायः खुलकर बोली जाती है। कोई पात्र कहीं न कहीं वह वाक्य कह देता है जो फिल्म का सार है, और दर्शक तालियाँ बजाता है।

पश्चिमी पटकथा-शिक्षा इसे कमजोरी मानती है। मैं इसे इतनी जल्दी खारिज नहीं करूँगा। हमारी परंपरा में कथावाचक का खुलकर बोलना स्वीकृत रहा है, और दर्शक उस मुहावरे को जानता है। समस्या तब बनती है जब वह वाक्य फिल्म के बाकी हिस्से से निकला हुआ न हो। अगर पूरी फिल्म ने उस बात को साबित कर दिया है, तो उसका बोला जाना संतोष देता है। अगर नहीं किया है, तो वही वाक्य उपदेश बन जाता है।

फर्क इसमें नहीं है कि थीम बोली गयी या नहीं। फर्क इसमें है कि वह कमायी गयी थी या नहीं।

आम भूलें

  1. विषय को थीम समझ लेना। 'भ्रष्टाचार' विषय है, थीम एक दावा होता है।
  2. कथानक के लिए पात्र से गलत काम करवाना। दर्शक इसे बनावटीपन के रूप में महसूस करता है।
  3. सारे पात्रों का एक जैसा होना। टकराव के लिए पात्रों का चुनाव सोच-समझकर करना पड़ता है।
  4. पहले ड्राफ्ट में थीम तय कर लेना। इससे पात्र प्रवक्ता बन जाते हैं।
  5. थीम को दर्शक तक संवाद से पहुँचाना। वह घटनाओं से पहुँचनी चाहिए।

अभ्यास

अपनी पसंद की तीन फिल्में लीजिए और हर एक के लिए दो पंक्तियाँ लिखिए।

पहली पंक्ति: कथानक, तीस शब्दों से ज्यादा नहीं। दूसरी पंक्ति: थीम, और उसे दावे की शक्ल में लिखिए, विषय की शक्ल में नहीं।

अब जाँचिए कि दूसरी पंक्ति का दावा पहली पंक्ति की घटनाओं से सचमुच साबित होता है या नहीं। जहाँ नहीं होता, वहीं फिल्म की कमजोरी बैठी हुई है।

अंत में यही अभ्यास अपनी कहानी पर कीजिए।

सार

  • हर फिल्म तीन सामग्रियों से बनती है: कथानक, पात्र और थीम।
  • कथानक पात्र से निकलता है, इसलिए लेखन का उपयोगी क्रम पात्र से शुरू होता है।
  • पात्र असल आदमी की नकल नहीं, चुनी हुई विशेषताओं का ढाँचा है, और वह अपने संबंधों में ही दिखता है।
  • थीम विषय नहीं, दावा है, और वह प्रायः दूसरे ड्राफ्ट में पहचान में आती है।
  • थीम को घटनाओं से साबित होना चाहिए। संवाद में कही गयी थीम तभी काम करती है जब फिल्म ने उसे पहले कमा लिया हो।

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  • अगली पोस्ट: विचार से कहानी तक, बीज कैसे उगता है
  • पात्र के तीन आयाम: शरीर, समाज, मनोविज्ञान

संदर्भ पुस्तकें: लाजोस एग्री, द आर्ट ऑफ ड्रामैटिक राइटिंग · विजय मिश्रा, बॉलीवुड सिनेमा · सिडनी ल्यूमेट, मेकिंग मूवीज

संदर्भ फिल्में: शोले (1975) · मदर इंडिया (1957) · दो बीघा जमीन (1953) · अंधाधुन (2018) · आनंद (1971)