जब पर्दे पर पहली बार यथार्थ जीवंत हुआ
आधुनिक कलाओं की जननी फ्रांस को ही फिल्म-कला के जन्मदाता होने का श्रेय जाता है। लुमिएर बंधु — आगस्त और लुई — तथा जॉर्ज मेल्यिए, तीनों फ्रांस के नागरिक थे और तीनों ने ही, अपने-अपने ढंग से, इस नवजात कला-माध्यम की नींव रखी। लुमिएर बंधु वर्षों से छायांकन के क्षेत्र में अभिनव प्रयोगों में रत थे। अपने प्रारंभिक प्रयोगों में सफलता मिलने के बाद उन्हें प्रतीत हुआ कि चलचित्र का माध्यम यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है। 28 दिसंबर 1895 को पेरिस में जब उन्होंने स्टेशन पर आती रेलगाड़ी, फैक्टरी से छूटकर घर लौटते मज़दूरों तथा बग़ीचे में पानी देते माली के चलचित्र पहली बार प्रदर्शित किए, तो इन फिल्मों में स्थान, समय और परिवेश का जो प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण था, वह दर्शकों को यथार्थ को साक्षात् जी लेने का अहसास कराता था। मानव-इतिहास में यह चमत्कार पहली बार घटित हुआ था कि लोग जिस घटना के भागीदार थे, उसी घटना से बाहर खड़े होकर, उसे पर्दे पर हूबहू घटित होते देख रहे थे — यह अनुभव अपने-आप में एक दार्शनिक विस्थापन था, जहाँ दर्शक और घटना के बीच पहली बार एक तकनीकी बिंब आ खड़ा हुआ।
इसी कारण भारत में 7 जुलाई 1896 की संध्या, ठीक छह बजे, बंबई के वाटसन होटल में जिन लोगों ने इन फिल्मों का प्रथम प्रदर्शन देखा, वे चकित हुए बिना न रह सके। होटल के बंद कमरे में एक पूर्णाकार रेलगाड़ी को साक्षात् अपनी ओर बढ़ती देखने का अद्भुत अनुभव, तथा भय और आनंद के मिश्रित भावों ने दर्शकों को आह्लादित कर दिया। उस प्रदर्शन में समुद्र-स्नान, स्टेशन पर आती रेलगाड़ी, एक दीवार का गिराया जाना, बालक द्वारा नाश्ते का सेवन, फैक्टरी से बाहर आते मज़दूर — ऐसी कुल आठ फिल्में दिखाई गई थीं।
एक बार जो प्रवाह आरंभ हुआ, वह फिर कभी थमा नहीं। सन् 1896 में भी, एक रुपये का टिकट ख़रीदकर इस आधे घंटे के प्रदर्शन को देखने वालों की भीड़ घटने का नाम नहीं ले रही थी। 'जनता की भारी माँग पर कुछ दिन और' के बोर्ड लगते रहे, और यह फिल्म-प्रदर्शन वाटसन होटल से हटकर नॉवेल्टी थियेटर में जा पहुँचा, जहाँ टिकट-दरें नाटकों की परंपरा के अनुरूप ही रखी गई थीं — गैलरी अर्थात् सबसे पीछे के लिए आठ आना, हॉल की पिछली कुर्सियों के लिए एक रुपया, और आगे की पंक्ति के लिए दो रुपये।
लुमिएर बंधु भली-भाँति जानते थे कि उनका आविष्कार अपने प्रथम प्रदर्शन में ही दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देगा। साथ ही वे जर्मनी, इंग्लैंड, इटली और अमेरीका में इसी दिशा में चल रहे समानांतर प्रयोगों से भी पूर्णतः परिचित थे। इसीलिए 28 दिसंबर 1895 के सफल प्रदर्शन के तत्काल बाद उन्होंने पच्चीस एक-समान सिनेमैटोग्राफ यंत्र बना डाले। उनका यह यंत्र त्रिगुणी क्षमता से युक्त था — छायाचित्रों को अंकित करना, उन्हें प्रदर्शन योग्य बनाना, और उन्हें प्रक्षेपित करना, तीनों कार्य एक ही उपकरण से संभव थे।
स्थिर छायांकन से गतिशील बिंब तक
सन् 1839 में, एक फ्रांसीसी ने ही स्थिर छायांकन की तकनीक का आविष्कार किया था। लुई दुगारे द्वारा खोजी गई इस पद्धति ने, जिसमें छायाचित्रों को स्थिर एवं सुरक्षित रूप में सहेजा जा सकता था, अनेक नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए। सबसे पहली उत्सुकता यही थी — क्या कैमरा एक साथ एक से अधिक छायाचित्र ले सकता है? क्या समय के अंतराल को इतना संकुचित किया जा सकता है कि एक शृंखलाबद्ध चित्रावली एक ही क्षण में क़ैद हो जाए?
कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर लीलैंड स्टैनफ़ोर्ड ने सन् 1872 में यह जानने का प्रयास किया कि क्या तेज़ी से दौड़ते समय घोड़े के चारों पैर किसी क्षणांश में धरती से पूर्णतः ऊपर उठ जाते हैं — अर्थात् क्या घोड़ा कभी हवा में तैरने लगता है? इस जिज्ञासा के समाधान हेतु गवर्नर ने सैन फ्रांसिस्को के छायाकार एडवर्ड मेब्रिज को नियुक्त किया, जिन्हें दौड़ते घोड़े के एक साथ कई चित्र लेने थे। किंतु मेब्रिज के अथक प्रयासों के बावजूद प्राप्त छायाचित्रों में दौड़ता हुआ घोड़ा इतना धुंधला दिखाई देता था कि उनसे कोई ठोस निष्कर्ष निकालना असंभव था।
यह चुनौती मेब्रिज के मन से उतरी नहीं। पाँच वर्षों के अथक परिश्रम के बाद, एक युवा इंजीनियर के सहयोग से उन्होंने एक अभिनव प्रयोग किया। इंजीनियर ने एक पंक्ति में चौबीस कैमरे व्यवस्थित कर उन्हें एक विद्युत-तार से जोड़ दिया, ताकि बटन दबाते ही विद्युत-प्रवाह के साथ-साथ एक के बाद एक सभी कैमरे स्वतः संचालित हो जाएँ।
प्रेक्सिनोस्कोप और काइनेटोस्कोप
अब आवश्यकता केवल इस बात की थी कि घोड़े के प्रभावित क्षेत्र में प्रवेश करने और कैमरों के संचालित होने का प्रथम क्षण पूर्णतः समकालिक हो। बटन दबाते ही, घोड़े की गति के साथ-साथ प्रवाहित होते विद्युत के कारण सभी कैमरे क्रमवार स्पष्ट छायाचित्र लेने में सफल रहे — उन्होंने वह क्षणांश भी क़ैद कर लिया जब घोड़े के चारों पैर हवा में थे, ऐसी स्थिति जिसे मनुष्य की आँख अपने पूरे प्रयत्न के बावजूद कभी पकड़ नहीं पाती। सन् 1882 में एडवर्ड मेब्रिज ने अपने इस आविष्कार — 'गतिशील वस्तुओं को छायांकित करने और दर्शाने की पद्धति' — को पंजीकृत कराया, और उसी वर्ष एमील रेनार्ड द्वारा आविष्कृत उपकरण प्रेक्सिनोस्कोप के माध्यम से पेरिस के एक हॉल में अपने चित्रों का प्रदर्शन किया।
सन् 1891 में थॉमस अल्वा एडिसन ने अपने काइनेटोस्कोप का पंजीकरण करवाया, यद्यपि इस आविष्कार में एडिसन की भूमिका एक व्यापारी से अधिक नहीं थी। उन दिनों उनकी कंपनी में इंग्लैंड से आया एक युवा इंजीनियर विलियम डिकसन कार्यरत था, जो वास्तविक आविष्कारक था — एडिसन तो उन आविष्कारों को अपने नाम से पंजीकृत भर करवा लेते थे। सन् 1888 में एडवर्ड मेब्रिज ने न्यू जर्सी में एक भाषण देकर अपने प्रयोग का संपूर्ण विवरण सार्वजनिक रूप से साझा किया था, जिसका लाभ आगे चलकर इन आविष्कारकों को मिला।
सन् 1893 में एडिसन और डिकसन ने काइनेटोस्कोप का ऐसा मॉडल तैयार कर लिया, जिसे व्यावसायिक प्रदर्शन हेतु प्रस्तुत किया जा सकता था। यह चार फुट ऊँचे एक बक्से में रखा गया उपकरण था, जिसके ऊपरी हिस्से में बना एक छिद्र दर्शक को उसमें आँख लगाकर तीव्र गति से चलती फिल्म का आनंद लेने की सुविधा देता था।
सविराम-गति-प्रक्रिया: सिनेमा का अदृश्य व्याकरण
फिल्म देखते समय पर्दे पर बिंब निरंतर हमारी आँखों के सामने से गुज़रते प्रतीत होते हैं, और हमें लगता है कि यह एक अविरल बहती हुई पट्टी है। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है — फिल्म रुक-रुक कर ही चलती है। फिल्मांकन तथा फिल्म-प्रक्षेपण, दोनों ही अवस्थाओं में प्रत्येक फ्रेम का आगे बढ़ने से पूर्व पूर्णतः स्थिर हो जाना अनिवार्य है; तभी कैमरे द्वारा फिल्मांकन संभव हो पाता है, और इसी प्रक्रिया के कारण हम पर्दे पर प्रक्षेपित बिंब को अपनी चेतना में आत्मसात् कर पाते हैं। इसे 'सविराम-गति-प्रक्रिया' (इंटरमिटेंट-मोशन-मैकेनिज़्म) कहा जाता है। इसकी खोज फ्रांस में लुई और आगस्त लुमिएर ने, तथा अमेरीका में थॉमस आरमैट ने, संयोगवश एक ही वर्ष — सन् 1894 — में की।
इस खोज से परिचित होने के बाद थॉमस अल्वा एडिसन ने अपने उपकरण में अनेक सुधार किए। उन्होंने लैथम-लूप की सहायता से लंबी फिल्म-पट्टी को लपेटकर रखने, तथा सविराम-गति-प्रक्रिया द्वारा स्पष्ट चित्र दिखाने की पद्धति में सफलता प्राप्त की। उनका कैमरा एक सेकंड में चालीस फ्रेम फिल्मांकित करता था। एडिसन ने ऐसे एक हज़ार काइनेटोस्कोप बनवाए और 14 अप्रैल 1894 को पहली बार ब्रॉडवे में इन्हें जनता के प्रदर्शनार्थ रखा।
दो राहों का बिखराव: व्यक्तिगत अंतरंगता बनाम सामूहिक तमाशा
लुमिएर बंधुओं ने अपने सिनेमैटोग्राफ का तुरंत उत्पादन आरंभ कर, प्रक्षेपण की विधि से एक साथ अनेक दर्शकों को समूह में फिल्म दिखाने का जो निर्णय लिया, उसने फिल्म-कला के अगले अस्सी वर्षों का भविष्य निर्धारित कर दिया। यहाँ यह प्रश्न विचारणीय है — यदि लुमिएर बंधुओं के प्रक्षेपण-यंत्र के साथ-साथ एडिसन का काइनेटोस्कोप भी समान रूप से प्रचलन में बना रहता, तो सिनेमा का भविष्य कैसा होता? संभवतः यह कला केवल सामूहिक संवेगात्मक आनंद-प्राप्ति का माध्यम बनकर ही सीमित न रहती, बल्कि व्यक्ति द्वारा एकांत में बैठकर अध्ययन, मनन और चिंतन किए जाने योग्य कला के रूप में भी विकसित होती। एडिसन के काइनेटोस्कोप में यह संभावना अंतर्निहित थी कि फिल्म-कला समूह के मनोवैज्ञानिक दबाव से मुक्त रह पाती, और फिल्म-पट्टी को आगे-पीछे चलाकर, एक पुस्तक की भाँति, एक समय में एक व्यक्ति द्वारा 'पढ़े' जाने की संभावनाएँ प्रबल होतीं। अर्थात् काइनेटोस्कोप के व्यापक प्रसार से फिल्में बनाने और देखने के समूचे तौर-तरीक़े ही भिन्न दिशा में विकसित होते।
किंतु यह केवल व्यावसायिक दबावों के कारण ही हुआ कि एडिसन का काइनेटोस्कोप बाज़ार से बाहर हो गया। एडिसन ने लुमिएर बंधुओं द्वारा प्रदर्शित उपकरण की नक़ल की और चार माह बाद, 23 अप्रैल 1896 को, न्यूयॉर्क में प्रक्षेपण-विधि से फिल्म का प्रदर्शन किया। सन् 1896 में ही इंग्लैंड और इटली में भी ऐसे उपकरण खोजे जा चुके थे। इसी परिप्रेक्ष्य में लुमिएर बंधुओं के बाज़ार पर शीघ्रातिशीघ्र अधिकार जमा लेने के प्रयासों को समझा जा सकता है।
यह एक दिलचस्प संयोग भी है कि लुमिएर बंधुओं ने पेरिस में जिस स्थान पर अपनी फिल्मों का प्रथम प्रदर्शन आयोजित किया था, उस हॉल का नाम 'इंडियन-रूम' था। लुमिएर बंधु अपने समकालीनों — थॉमस अल्वा एडिसन तथा अन्य व्यवसायी-आविष्कारकों — से कहीं अधिक कुशल व्यवसायी और प्रबंधक सिद्ध हुए। वे अपने आविष्कार की संभावनाओं के प्रति पूर्णतः सजग थे। इसीलिए दिसंबर 1895 के प्रथम प्रदर्शन से पूर्व ही वे पचास लघु फ़िल्में बनाकर तैयार कर चुके थे, और इसकी भनक तक किसी को नहीं लगने दी थी। वे जीवन की रोज़मर्रा की घटनाओं को उनकी सहज-स्वाभाविकता में क़ैद करना चाहते थे, इसीलिए प्रायः उनका कैमरा छिपा हुआ और अलक्षित रहता था। फैक्टरी से निकलते कामगारों पर बनी फिल्म, भीड़ के निकलने से आरंभ होकर, सबके चले जाने के बाद चौकीदार द्वारा गेट बंद किए जाने पर समाप्त होती है — इस फिल्मांकन के समय कैमरा सामने की इमारत की एक खिड़की में छिपाकर रखा गया था, और किसी को यह भनक तक नहीं थी कि उनकी यह सहज गतिविधि कैमरे में क़ैद हो रही है।
इस प्रथम प्रदर्शन में शामिल एक फिल्म में दीवार गिराए जाने का दृश्य था। मज़दूरों द्वारा दीवार तोड़कर गिरा दिए जाने में तो कुछ भी असाधारण नहीं था, किंतु जब इस फिल्म-पट्टी को उलटा चलाया गया, तब मलबे के ढेर से दीवार का पुनर्निर्माण होता दृश्य — प्रकृति के समस्त ज्ञात-अज्ञात नियमों की अवहेलना करता हुआ — दर्शकों पर मानो जादुई प्रभाव छोड़ता था।
सन् 1895 से 1905 तक लुमिएर बंधु अपने आविष्कार के दूरदर्शितापूर्ण प्रयोग के बल पर विश्व फिल्म-बाज़ार पर छाए रहे। लुमिएर कंपनी की एक विशेषता यह भी थी कि उनके दूत जिस भी देश का दौरा करते, वहाँ के स्थानीय दृश्यों का फिल्मांकन भी साथ-साथ करते जाते, और इन फिल्मों की मूल प्रतियाँ पेरिस स्थित मुख्यालय भेज देते। इस प्रकार लुमिएर के पास एक हज़ार लघु फिल्मों का विशाल भंडार संचित हो गया था। ये सभी फिल्में लुमिएर ने अपनी मृत्यु से दो वर्ष पूर्व, सन् 1948 में, फ्रांस के फिल्मागार (फ़िल्म आर्काइव) को सौंप दी थीं।
लुमिएर की फिल्मों की एक विशेषता — या यूँ कहें, एक सीमा भी — यह थी कि वे प्रत्येक एक ही शॉट में पूर्ण हो जाती थीं। इस कारण यथार्थ की प्रामाणिकता में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी। किंतु कैमरे का एक ही स्थान पर स्थिर बने रहना, और एक शॉट का दूसरे शॉट से न जुड़ पाना, मानव-मन की गहरी जिज्ञासाओं का समाधान करने में असमर्थ रहा।
जब सिनेमा को अपना पहला समीक्षक मिला
सन् 1896 के उत्तरार्द्ध में ही लुमिएर के पच्चीस सिनेमैटोग्राफ यंत्र, चुनिंदा फिल्मों की प्रतियों सहित, यूरोप के विभिन्न देशों में पहुँचा दिए गए थे, और वहाँ इन फिल्मों का प्रदर्शन भी हो चुका था। भारत पहुँचने वाले दल में लुमिएर के प्रतिनिधि मॉरिस सेस्त्र और वेयरे शामिल थे। सामान्यतः लुमिएर के एजेंट किसी भी नए स्थान पर पहुँचते ही सबसे पहले वहाँ के स्थानीय दृश्यों का फिल्मांकन कर लिया करते थे, किंतु भारत में फिल्माए गए दृश्यों से लुमिएर कंपनी के प्रतिनिधि संतुष्ट नहीं हो सके। यही कारण था कि वाटसन होटल में संपन्न प्रथम प्रदर्शन में कोई भारतीय दृश्य सम्मिलित नहीं किया जा सका — जबकि रूस पहुँच चुके लुमिएर के प्रतिनिधियों ने ज़ार निकोलस द्वितीय के राजसी जुलूस को फिल्मांकित कर लिया था। रूस में इन फिल्मों का प्रथम प्रदर्शन सेंट पीटर्सबर्ग में 19 मई 1896 को आयोजित हुआ।
जून के महीने में यही फिल्में नोवगोरोद के मेले में जा पहुँचीं। वहीं एक स्थानीय अख़बार के संवाददाता के रूप में मैक्सिम गोर्की ने इन फिल्मों को देखा — जिनमें 'बाग़ में पानी देता माली' भी शामिल थी। इस फिल्म में एक माली बग़ीचे के पौधों को कपड़े की पाइप से पानी दे रहा होता है, तभी एक बालक आकर पाइप पर पैर रख देता है और पानी का प्रवाह रुक जाता है। माली अकस्मात् पानी रुकने का कारण न समझ पाकर पाइप की ओर झाँकता है, ठीक उसी क्षण बालक पैर हटा लेता है और पानी की तेज़ बौछार सीधे माली के चेहरे पर जा पड़ती है — माली पाइप छोड़कर बालक के पीछे दौड़ पड़ता है।
अगले दिन मैक्सिम गोर्की ने अपनी रिपोर्ट में लिखा — कल रात वे मानो छायाओं के एक साम्राज्य में विचरण कर रहे थे, और उन्होंने लुमिएर के सिनेमैटोग्राफ द्वारा प्रदर्शित चलचित्र देखे। उन बिंबों का प्रभाव इतना असाधारण, जटिल और बहुआयामी था कि गोर्की स्वयं को उसकी संपूर्ण व्याख्या करने में असमर्थ पाते हैं। उन्होंने लिखा कि दर्शक को लगता है मानो वह बौछार स्वयं उसके चेहरे पर भी पड़ने वाली है, और वह अनायास पीछे हट जाता है — यह भूलकर कि वह वास्तव में कहाँ बैठा है। गोर्की ने भविष्यवाणी भी की कि शीघ्र ही ऐसी फ़िल्में बनने लगेंगी जिनके शीर्षक होंगे, जैसे 'कपड़े उतारती हुई महिला' या 'स्नान करती हुई महिला'।
यह उल्लेखनीय है कि सिनेमा के जन्म के साथ ही, सिनेमा के प्रथम समर्थ आलोचक की टिप्पणी भी विश्व-साहित्य में दर्ज हो चुकी थी। गोर्की की दृष्टि की तीक्ष्णता, सिनेमा की सम्मोहक शक्ति के प्रति उनकी सजगता, 'अंधेरे के साम्राज्य' की उनकी रूपक-कल्पना, तथा सिनेमा की संभावनाओं और सीमाओं का उनका गहन विश्लेषण — यह सब मिलकर मैक्सिम गोर्की की इस समीक्षात्मक टिप्पणी को सिनेमा-इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रारंभिक दस्तावेज़ बना देता है।
किंतु भारत में सिनेमा एक भिन्न ही रूप में अवतरित हुआ था — एक चमत्कार के रूप में। वाटसन होटल के प्रथम प्रदर्शन के अगले दिन 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने लिखा था कि एक शक्तिशाली लालटेन की सहायता से वास्तविक जीवन से मिलते-जुलते अनेक दृश्य पर्दे पर प्रदर्शित किए गए, और जिस स्पष्टता से प्रत्येक पात्र की भाव-भंगिमाएँ प्रस्तुत हो सकीं, उससे यह प्रकट होता है कि छायांकन की कला और जादुई लालटेन के इस गठजोड़ ने कितनी उन्नत अवस्था प्राप्त कर ली है। एक मिनट में लगभग सात-आठ सौ छायाचित्र पर्दे पर प्रकाशमान होते थे, और दर्शकों ने इन दृश्यों को अत्यंत पसंद किया।
रूस के मैक्सिम गोर्की और भारत के 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की इन दो प्रतिक्रियाओं के बीच का अंतर केवल संयोग नहीं, बल्कि दो भिन्न वैचारिक धरातलों का प्रतिनिधित्व करता है — एक ओर सिनेमा के दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक स्वरूप पर गहन चिंतन, तो दूसरी ओर उसकी तकनीकी विस्मयकारिता पर विस्मय-भरा वर्णन। यही अंतर आगे चलकर, अपने-अपने स्तर पर, रूसी सिनेमा और भारतीय सिनेमा की सैद्धांतिक और सांस्कृतिक दिशाओं में परिभाषित तथा प्रतिबिंबित हुआ।
भारत में फिल्मांकन के प्रथम प्रयास
जनवरी 1897 से भारत में फ्रांस, अमेरीका, इटली, इंग्लैंड, जर्मनी और डेनमार्क की फ़िल्में बड़ी संख्या में पहुँचने लगी थीं। 14 जुलाई 1896 के बाद नॉवेल्टी थियेटर में नाटकों का मंचन बंद हो गया था, और वहाँ प्रतिदिन संध्या छह बजे से फ़िल्में ही दिखाई जाने लगी थीं। शीघ्र ही गेयटी थियेटर में भी फिल्म-प्रदर्शन आरंभ हो गया। उसी वर्ष बंबई के धोबी तालाब क्षेत्र में स्थित फ्रामजी कावसजी हॉल में भी फ़िल्में दिखाई जाने लगीं। धीरे-धीरे बंबई के अनेक थियेटर, जो पहले नाटकों के आयोजन के लिए जाने जाते थे, फिल्म-प्रदर्शन हेतु अपने हॉल किराए पर देने लगे।
विदेशों से फ़िल्में मँगवाने और उनका प्रदर्शन करने में विदेशी उद्यमी ही अग्रणी थे। इन विदेशी फिल्मों में 'डेथ ऑफ़ नेल्सन', 'कॉल ऑन द लंदन फ़ायर ब्रिगेड' तथा 'मिस्टर ग्लैडस्टन्स फ्यूनरल' जैसी सूचनात्मक फ़िल्मों की प्रधानता थी। सन् 1898 में ही 'हमारा भारतीय साम्राज्य', 'लखनऊ का महान इमामबाड़ा' तथा 'बंबई स्टेशन पर रेलगाड़ी का आगमन' जैसी भारतीय दृश्यों पर आधारित फ़िल्में भी प्रदर्शित की जाने लगीं। किंतु इन सभी फिल्मों में कैमरे का संचालन करने वाला व्यक्ति एक अंग्रेज़ ही हुआ करता था — भारतीय सिनेमा की अपनी दृष्टि और अपने कैमरे की प्रतीक्षा अभी शेष थी।
💬 Discussion
0 comments