एक परंपरा जो सिनेमा से भी पुरानी है

भारत में चलचित्र-तकनीक के साथ सर्वप्रथम प्रयोग करने वाले वे ही भारतीय थे, जो पहले से ही स्थिर छायांकन की तकनीक से भली-भाँति परिचित हो चुके थे। अर्थात् भारतीय सिनेमा की नींव किसी शून्य में नहीं, बल्कि छायांकन की एक सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा की कोख में पड़ी। भारत में स्थिर छायांकन का इतिहास अत्यंत पुराना है, और यह इतिहास इस बात का सुस्पष्ट प्रमाण है कि भारतीयों ने नई वैज्ञानिक उपलब्धियों को कितने उत्साह से अपनाया, तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष करते हुए अपनी कला को किस दृढ़ता से विकसित किया।

सन् 1827 में फ्रांस में बिंब को काग़ज़ पर स्थायी रूप से अंकित कर पाने की पहली सफलता मिली थी। सन् 1839 में दागेर (दुआरे) का कैमरा बाज़ार में आ चुका था, और उसी वर्ष विलियम हेनरी फ़ॉक्स टैलबॉट ने ऐसी नेगेटिव-विधि विकसित कर ली थी, जिसके माध्यम से एक ही मूल छवि से अनगिनत प्रतियाँ तैयार की जा सकती थीं — यह आविष्कार आगे चलकर संपूर्ण छायांकन-उद्योग की आधारशिला सिद्ध हुआ। सन् 1850 से ही भारतीयों की इस नवीन कला में रुचि प्रकट होने लगी थी, जो दर्शाता है कि भारत ने पश्चिमी तकनीकी क्रांति को उसके जन्म के मात्र दशक भर के भीतर ही आत्मसात् कर लिया था।

सोसायटियों का उदय और एक जातीय पूर्वाग्रह की छाया

सन् 1854 में भारत की प्रथम फ़ोटोग्राफ़िक सोसायटी अस्तित्व में आ चुकी थी, और सन् 1855 से ही इस सोसायटी ने अपनी स्वतंत्र पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया था — किंतु इसके आरंभिक पैंतीस सदस्यों में से मात्र सात या आठ ही भारतीय थे। इसके विपरीत, कलकत्ता में सन् 1856 में स्थापित 'फ़ोटोग्राफ़िक सोसायटी' के सौ संस्थापक सदस्यों में तीस से अधिक भारतीय सम्मिलित थे — यह अनुपात उस समय के लिए उल्लेखनीय रूप से प्रगतिशील था।

किंतु यह संतुलन शीघ्र ही एक कटु यथार्थ से टकरा गया। अंग्रेज़ सदस्य भारतीयों की इतनी बड़ी संख्या को सहन नहीं कर पा रहे थे, और जब सन् 1857 में बाबू राजेंद्र लाल मित्र सोसायटी के कोषाध्यक्ष चुने गए, तो तत्काल उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई — यह घटना अपने-आप में औपनिवेशिक भारत में कला और तकनीक के क्षेत्र में व्याप्त जातीय पूर्वाग्रह का एक मार्मिक दृष्टांत है। इसके फलस्वरूप कलकत्ता की फ़ोटोग्राफ़िक सोसायटी में क्रमशः केवल अंग्रेज़ सदस्य ही शेष रह गए। सन् 1861 तक इस सोसायटी की सदस्य-संख्या दो सौ तक जा पहुँची थी, किंतु उसमें भारतीय सदस्यों की संख्या घटकर मात्र सात रह गई थी — जबकि विडंबना यह है कि उसी दौर में, सन् 1860 में, कलकत्ता में कम-से-कम एक सौ तीस भारतीय छायांकन के व्यवसाय से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। अर्थात् संस्थागत मान्यता भले ही भारतीयों से छिन गई हो, किंतु उनका व्यावहारिक कौशल और उद्यमशीलता निरंतर बढ़ती ही रही।

बंबई और कलकत्ता के आरंभिक भारतीय छायाकारों ने छायांकन को एक स्वतंत्र कला के रूप में अपनाया। इनमें से अनेक अन्य व्यवसायों से भी जुड़े थे — कई डॉक्टर और वकील भी अत्यंत उत्कृष्ट छायाचित्र खींच रहे थे, जो यह दर्शाता है कि उस युग में छायांकन केवल एक पेशा नहीं, बल्कि शिक्षित भारतीय वर्ग की एक सांस्कृतिक अभिरुचि बन चुका था। सन् 1866 में आगरा में आयोजित एक छायाचित्र-प्रदर्शनी के अवसर पर 'पायनियर' नामक अख़बार ने लिखा था कि विगत कुछ वर्षों से भारतीयों में छायांकन की कला लोकप्रिय हो चुकी है, और उत्तम छायाचित्रों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

त्रिपुरा के राजदरबार में पला-बढ़ा एक कलाकार

त्रिपुरा के नरेश सन् 1850 से ही दागेर के कैमरे से छायाचित्र खींच रहे थे, और उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को भी इस कला का प्रशिक्षण दिया। महाराजा के छोटे पुत्र, बड़े ठाकुर, सन् 1895 तक विश्व के जाने-माने छायाकारों में गिने जाने लगे थे। बड़े ठाकुर ने सन् 1869 में, मात्र छह वर्ष की आयु से ही, अपने पिता की छत्रछाया में छायांकन का प्रशिक्षण लेना आरंभ कर दिया था — यह तथ्य स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राजघरानों में यह कला कितनी गंभीरता से सिखाई-सँजोई जाती थी। सन् 1885 तक वे चित्रकला और रसायनशास्त्र, दोनों ही विषयों का गहन अध्ययन कर चुके थे — यह द्विविध दक्षता उन्हें छायांकन की रासायनिक प्रक्रिया पर आश्चर्यजनक पकड़ प्रदान करती थी।

उस दौर में विदेश से आयातित प्लैटिनोटाइप काग़ज़, त्रिपुरा की नम एवं उष्ण जलवायु में प्रायः अनुपयोगी सिद्ध हो जाता था। इस व्यावहारिक चुनौती का सामना करते हुए बड़े ठाकुर ने विदेश से केवल सादा छायांकन-काग़ज़ मँगवाया, और उस पर रसायनों की परत स्वयं अपने हाथों से चढ़ाई — यह नवाचार उस युग में भारतीय तकनीकी आत्मनिर्भरता का एक दुर्लभ किंतु प्रेरक उदाहरण है। 'प्रैक्टिकल फ़ोटोग्राफ़ी' पत्रिका ने सन् 1885 के मई अंक में यह स्वीकार किया कि बड़े ठाकुर द्वारा स्वनिर्मित काग़ज़ पर तैयार छायाचित्र, किसी भी आयातित आलेपित काग़ज़ पर बने छायाचित्रों से कहीं बेहतर थे।

दीनदयाल: सर्वेक्षक से लेकर निजाम के राजकीय छायाकार तक

उस समय के सर्वाधिक सक्षम छायाकारों में राजा दीनदयाल का नाम अग्रगण्य है। दीनदयाल ने सन् 1860 में छायांकन सीखना आरंभ किया था, जब वे इंदौर में सर्वेक्षक के पद पर कार्यरत थे — अर्थात् उनकी यात्रा एक सरकारी तकनीकी सेवा से आरंभ होकर कला की ऊँचाइयों तक पहुँची। सन् 1880 तक उन्होंने बंबई और हैदराबाद में विशाल स्टूडियो स्थापित कर लिए थे, फिर भी उन्होंने इंदौर स्थित अपना आरंभिक, छोटा डार्करूम कभी नहीं छोड़ा — मानो वह उनकी सृजन-यात्रा की जड़ों से जुड़े रहने का प्रतीक हो। सन् 1880 में ही दीनदयाल निज़ाम के दरबार में मुख्य छायाकार नियुक्त हुए, जहाँ उनका वेतन छह सौ रुपए प्रतिमाह निर्धारित हुआ — उस युग के लिए यह एक अत्यंत सम्मानजनक राशि थी।

सन् 1880 से ही दीनदयाल के पुत्र ज्ञानचंद्र ने भी छायांकन सीखना आरंभ कर दिया था, मानो यह कला अब एक पारिवारिक विरासत का रूप ले चुकी हो। सन् 1894 में निज़ाम ने दीनदयाल को सम्मानस्वरूप 'राजा' की उपाधि प्रदान की। इसके पश्चात् दीनदयाल केवल निज़ाम से संबंधित कार्य ही देखने लगे, जबकि देशभर में फैले उनके स्टूडियो-तंत्र का संपूर्ण संचालन ज्ञानचंद्र ने अपने हाथों में ले लिया — पिता-पुत्र की यह जोड़ी भारतीय छायांकन के व्यावसायीकरण का एक आरंभिक और सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक साझा विरासत, अनेक संग्रहालयों में सुरक्षित

बंबई और कलकत्ता के अनेक उच्चकोटि के छायाकारों के साथ-साथ बनारस के प्रथम छायाकार गिरीश चंद्र डे, जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय, राजा दीनदयाल, तथा त्रावणकोर और त्रिपुरा के राजघरानों द्वारा सन् 1860 से 1880 के मध्य खींचे गए छायाचित्र आज भी अनेक संग्रहालयों में संरक्षित हैं और देखे जा सकते हैं। ये छायाचित्र केवल ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उस मूक किंतु दृढ़ रचनात्मक चेतना के जीवंत साक्ष्य हैं, जिसने आगे चलकर, दो-तीन दशकों बाद, भारतीय चलचित्र-कला की नींव रखने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई। जिस दिन 7 जुलाई 1896 को वाटसन होटल में पहली फिल्म पर्दे पर उतरी, उसके पीछे राजा दीनदयाल, बड़े ठाकुर और उनके जैसे अनगिनत भारतीय छायाकारों के दशकों पुराने प्रयोग और परिश्रम अदृश्य रूप से खड़े थे।