एक छायाकार की आँख से जन्मा सिनेमाई सपना
सन् 1896 में जब सिनेमा भारत पहुँचा, तो इस नए माध्यम को सबसे पहले अपनाने वाले वही लोग थे, जो पहले से ही स्थिर छायांकन की कला में निपुणता प्राप्त कर चुके थे — मानो यह नया माध्यम पुरानी दक्षता की ही अगली कड़ी हो। कलकत्ता में चलती-फिरती फिल्मों का पहला प्रदर्शन सन् 1897 में हुआ, और इसे देखकर हीरालाल सेन के भीतर भी फिल्में बनाने की गहरी रुचि जाग उठी। यह कोई आकस्मिक आकर्षण नहीं था — सन् 1898 तक हीरालाल सेन के अनेक छायाचित्र, स्थिर छायांकन की विभिन्न अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं और प्रदर्शनियों में पुरस्कृत और सम्मानित हो चुके थे। जब उनके एक छायाचित्र को 'सूर्यास्त दर्शाने वाले सर्वोत्तम छायाचित्र' के लिए स्वर्ण पदक मिला, तब वे मात्र सोलह वर्ष के थे — यह तथ्य अपने-आप में उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।
एक बार फिल्में देख लेने के बाद हीरालाल सेन पर मानो एक नई धुन सवार हो गई। संयोगवश उन्हें कुछ पुरानी पत्रिकाएँ हाथ लग गईं, और सन् 1898 के अप्रैल माह में लंदन से मँगवाया गया प्रक्षेपण-यंत्र भी उन्हें प्राप्त हो गया। सेन ने चार से आठ आने के टिकट बेचकर, धन अर्जित करने की परंपरागत राहों से हटकर, एक बिल्कुल नई राह की खोज की। वे बिहार, उड़ीसा और बंगाल की दूर-दराज़ की रियासतों में घूमने लगे, और वहाँ राजाओं, ज़मींदारों तथा उनके दरबारियों के लिए फिल्म-प्रदर्शन आयोजित करने लगे। देशभर में फैली इन रियासतों तक पहुँचकर फिल्में दिखाने के इस व्यवसाय में धनार्जन की विपुल संभावनाएँ देखकर बंगाल के अनेक युवक इसी क्षेत्र में उतर आए — नारायण बैसाख ने लंदन बायोस्कोप, अनिल चटर्जी ने इंपीरियल बायोस्कोप, प्रमथनाथ गांगुली ने ओरिएंटल बायोस्कोप, और सत्यचरण घोष ने बंगाल बायोस्कोप जैसी कंपनियाँ स्थापित कीं, और इस प्रकार आयातित चलचित्र धीरे-धीरे गाँव-गाँव तक पहुँचने लगे।
पाथे कंपनी से मिली संगत, और आत्मविश्वास की पहली किरण
चूँकि सेन स्वयं एक कुशल छायाकार थे, इसलिए वे केवल फिल्में प्रदर्शित करने भर से संतुष्ट नहीं हो सके — उनकी दृष्टि फिल्म-निर्माण की मूल प्रक्रिया तक पहुँचना चाहती थी, और शीघ्र ही उन्हें यह अवसर भी मिल गया। सन् 1900 में फ्रांस की पाथे कंपनी के कई कैमरामैन अपने उपकरणों सहित कलकत्ता पहुँचे, और वहाँ के जनजीवन के सजीव दृश्यों का फिल्मांकन करने में जुट गए। हीरालाल सेन इन विदेशी छायाकारों के सहायक बनकर उनके साथ घूमने लगे। कहा जाता है कि कुछ ही दिनों में पाथे के छायाकारों ने सेन पर इतना विश्वास जताया कि उन्हें स्वयं एक कैमरा सौंप दिया, और गंगा-घाट के दृश्य, मुर्ग़ों की लड़ाई, तथा विभिन्न मार्गों से गुज़रती भीड़ के दृश्य फिल्माने भेज दिया। इस अनुभव ने सेन के भीतर गहरा आत्मविश्वास जगाया, और आगे चलकर उन्होंने अपना निजी कैमरा भी मँगवा लिया।
हीरालाल सेन वह पहले भारतीय थे जिन्होंने फ्रांस की पाथे कंपनी का कैमरा ख़रीदा। यह उल्लेखनीय है कि पाथे बंधु उस समय फिल्म-उपकरणों के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में लुमिएर बंधुओं से भी कहीं आगे निकल चुके थे। चार्ल्स पाथे ने अपने तीन भाइयों के साथ मिलकर सन् 1896 से ही चलचित्र-उपकरण बनाने का कार्य आरंभ कर दिया था, और कुछ ही वर्षों में फिल्म-संबंधी समस्त उपकरणों तथा सामग्री के उत्पादन में पाथे बंधु विश्व में श्रेष्ठतम माने जाने लगे थे। वे न केवल कैमरे और प्रक्षेपण-यंत्र बनाते थे, बल्कि जॉर्ज ईस्टमैन से पेटेंट अधिकार प्राप्त कर लेने के बाद कैमरे में प्रयुक्त होने वाली कच्ची फिल्म का उत्पादन भी करने लगे थे। पाथे कंपनी स्वयं अनगिनत फिल्मों का निर्माण करती थी, और विश्वभर में उसके अपने थियेटर थे, जहाँ केवल उसी की निर्मित फिल्में प्रदर्शित की जाती थीं — अर्थात् सेन ने अपने समय के सबसे शक्तिशाली और सर्वाधिक उन्नत फिल्म-प्रतिष्ठान से सीधा नाता जोड़ा था।
पाथे कंपनी के इसी कैमरे के सहारे हीरालाल सेन ने सन् 1902 से सन् 1905 के बीच कम-से-कम बीस नाटकों के दृश्यों का फिल्मांकन किया।
परस्पर विरोधी आख्यानों के बीच तथ्य की खोज
हीरालाल सेन के जीवन और कार्य को लेकर कई परस्पर विरोधाभासी विवरण उपलब्ध हैं, और भारतीय सिनेमा के विकास को उसके सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए यह आवश्यक है कि इन विवरणों की तटस्थतापूर्वक जाँच की जाए, न कि उन्हें अंधाधुंध स्वीकार कर लिया जाए। प्रसिद्ध फिल्मकार बासु भट्टाचार्य के अनुसार:
"सन् 1900 में फ्रांस की पाथे कंपनी के कुछ कैमरामैन कलकत्ता पहुँचे। सेन ने उनसे कैमरे के बारे में जानकारी हासिल की और एक कैमरा स्वयं ख़रीदने का प्रयत्न किया। इस प्रयास में असफल होकर सेन ने स्वयं कैमरा बनाने का निर्णय लिया और बना डाला। इस स्वनिर्मित कैमरे से सेन ने कई शॉट लिए।"
इसके विपरीत, बांग्ला फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता प्रभात मुखर्जी का विवरण एक भिन्न ही कहानी प्रस्तुत करता है:
"सन् 1903 में सेन ने दो फिल्में (नाटकों और स्टेज-शो के फिल्मांकन) बनाईं। ये दोनों फिल्में, उस समय की विदेशी फिल्मों की भाँति, मात्र दस मिनट में समाप्त नहीं हो जाती थीं — प्रत्येक एक घंटे तक चलती थी, और दोनों में ही सिनेमा माध्यम के नए प्रयोगों की भरमार थी, जैसे क्लोज़अप, पैनिंग और टिल्ट्स। सेन ने न केवल स्थानीयता को महत्त्व दिया, बल्कि इस नए कला-माध्यम की ओर अन्य रचनात्मक प्रतिभाओं का ध्यान खींचने में भी सफलता प्राप्त की।"
मुखर्जी आगे लिखते हैं:
"सन् 1904 में हीरालाल सेन ने 'अलीबाबा और चालीस चोर' नामक फिल्म बनाई, जो दो घंटे से भी अधिक समय तक चलती थी और जिसमें सेन ने कई अभिनव प्रयोग किए। सन् 1906 तक सेन कई कथा-फिल्में बना चुके थे और नाटकों के फिल्मी रूपांतरण प्रस्तुत कर चुके थे। इसी वर्ष उन्होंने एक समाचार वृत्तचित्र 'बंगाल के विभाजन का आंदोलन' बनाया, जिसे इंग्लैंड भी भेजा गया।"
इन दावों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना असंभव-सा प्रतीत होता है, क्योंकि मुखर्जी स्वयं इस असंभवता का कारण स्पष्ट कर देते हैं:
"सन् 1917 में हीरालाल सेन की मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उनके भाई के गोदाम में भीषण आग लगी, और हीरालाल सेन द्वारा निर्मित सभी फिल्में जलकर राख हो गईं।"
अर्थात् जिन फिल्मों के आधार पर ये विस्तृत दावे किए जा रहे हैं, वे स्वयं अब अस्तित्व में ही नहीं हैं — यह विडंबना हीरालाल सेन के संपूर्ण मूल्यांकन को एक अनिश्चितता के धुंधलके में ढँक देती है।
फिर भी, इन अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होने वाले वक्तव्यों से हीरालाल सेन का ऐतिहासिक महत्त्व तनिक भी कम नहीं होता। इसमें कोई संदेह नहीं कि सेन ने कई पूर्व-मंचित नाटकों का फिल्मांकन सफलतापूर्वक किया था — इसकी ठोस गवाही कलकत्ता की 'अमृत बाज़ार पत्रिका' के फ़रवरी 1901 के अंक में प्रकाशित यह विज्ञापन देता है:
"हमारे विश्वविख्यात नाटकों — अलीबाबा, बुद्ध, सीताराम आदि — को अति उत्तम चलचित्रों के रूप में देखिए। ये चलचित्र हमारे मित्रों एवं संरक्षकों को चकित एवं मुग्ध कर देंगे।"
सन् 1912 में 'हिज़ मैजेस्टी किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी के आगमन' का फिल्मांकन भी हीरालाल सेन ने सफलतापूर्वक किया। किंतु उसी समय से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था, और अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे गले के कैंसर से पीड़ित रहे।
लुमिएर की राह, और एक जादूगर की प्रतीक्षा
भारत के दो महान छायाकार-प्रदर्शक — हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर और हीरालाल सेन — दोनों ही लुमिएर बंधुओं द्वारा दिखाई गई राह पर चले। दोनों ही यथार्थ घटनाओं को अपने कैमरे में क़ैद कर लेने की कला में निपुण थे। किंतु कैमरे के रचनात्मक उपयोग द्वारा एक मौलिक, गढ़ी हुई कहानी भी कही जा सकती है — इस संभावना से इन दोनों प्रतिभाशाली भारतीयों का साक्षात्कार कभी नहीं हो पाया।
इसी बीच सिनेमा ने एक दूसरी राह भी खोज ली थी, जो लुमिएर द्वारा दिखाई गई दिशा से ठीक विपरीत दिशा में ले जाती थी। इसीलिए लुमिएर की राह पर चलते हुए, उस दूसरी दिशा तक पहुँच पाना असंभव-सा ही था — उस राह पर चलने के लिए केवल एक कुशल छायाकार होना पर्याप्त नहीं था। सिनेमा की उस छिपी हुई संभावना का द्वार खोलने के लिए एक छायाकार नहीं, बल्कि एक जादूगर की आवश्यकता थी।
💬 Discussion
0 comments