भारतीय सिनेमा के इतिहास-लेखन में दादासाहेब फालके को "भारतीय सिनेमा का जनक" कहकर सम्मानित किया जाता है, और यह उपाधि सर्वथा उचित भी है, क्योंकि उन्होंने ही 1913 में "राजा हरिश्चन्द्र" के रूप में भारत का पहला पूर्ण-सुदीर्घ (feature-length) कथा-चलचित्र रचा। किन्तु फालके से लगभग डेढ़ दशक पूर्व, बम्बई के एक व्यावसायिक छायाकार ने अपने कैमरे की आँख से भारत की धरती पर पहली बार गतिशील दृश्यों को क़ैद किया था। यह व्यक्ति थे हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर, जिन्हें उनके समकालीन और परवर्ती पीढ़ियाँ स्नेह तथा आदरपूर्वक "सावे दादा" कहकर पुकारती रहीं। भारतीय चलचित्र-निर्माण की यह प्रारम्भिक कड़ी यद्यपि सिनेमा-इतिहास के सामान्य विमर्श में फालके जितनी चर्चित नहीं रही, तथापि गम्भीर फ़िल्म-अध्येताओं तथा राष्ट्रीय फ़िल्म पुरालेखों (National Film Archive of India) के अभिलेखों में सावे दादा को भारत में जीवन्त, गतिशील दृश्यों के प्रथम फिल्मांकनकर्ता के रूप में सुस्थापित स्थान प्राप्त है। उन्हें विशेष रूप से "भारतीय तथ्यपरक चलचित्र (factual film) के जनक" के रूप में स्मरण किया जाता है, क्योंकि उन्होंने कथा-प्रधान फिल्मों के स्थान पर वास्तविक घटनाओं तथा जन-जीवन के दृश्यों को अपने कैमरे में संजोया।
प्रारम्भिक जीवन और छायांकन का व्यवसाय
भाटवडेकर का जन्म 15 मार्च 1868 को बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में हुआ था। पेशे से वे एक प्रतिष्ठित पोर्ट्रेट-छायाकार (portrait photographer) थे, और उस युग में जब भारत में स्थिर-चित्र खिंचवाना भी आम जन के लिए विस्मयकारी तथा कुछ हद तक अविश्वसनीय अनुभव माना जाता था — यह लोक-धारणा भी प्रचलित थी कि यन्त्र द्वारा जीवित व्यक्ति का चित्र लेने से उसकी आयु घट जाती है — भाटवडेकर ने साहसपूर्वक छायांकन को अपना जीविकोपार्जन तथा जीवन-कर्म बना लिया था। सन् 1880 में उन्होंने बम्बई में अपना छायांकन स्टूडियो स्थापित किया, जो कैनेडी ब्रिज क्षेत्र में स्थित था। स्थिर-चित्र छायांकन की कला में उनकी दक्षता इतनी प्रौढ़ हो चुकी थी कि आगे चलकर जब चलचित्र-कैमरे जैसी सर्वथा नवीन तकनीक उनके हाथ में आई, तब उन्हें उसके संचालन में विशेष कठिनाई नहीं हुई — मानो वर्षों के अभ्यास ने उन्हें इस नए माध्यम के लिए पहले से ही सिद्धहस्त बना दिया हो।
लुमिएर बन्धुओं का प्रभाव और सिनेमैटोग्राफ की प्राप्ति
फ्रांस के लुमिएर बन्धुओं ने 1895 में पेरिस में अपने नवोन्मेषी उपकरण "सिनेमैटोग्राफ" का प्रदर्शन कर विश्व को गति-चित्रों से परिचित कराया था। इस चमत्कारी आविष्कार को उन्होंने शीघ्र ही विश्व के विभिन्न महानगरों में प्रदर्शित करना आरम्भ किया, और 7 जुलाई 1896 को बम्बई के वाटसन होटल में भारत की धरती पर पहली बार सिनेमैटोग्राफ के माध्यम से चलचित्रों का प्रदर्शन हुआ। उस समय के प्रतिष्ठित समाचार-पत्र टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने इस तकनीक को "सदी का चमत्कार" की संज्ञा दी थी। इस ऐतिहासिक प्रथम प्रदर्शन में उपस्थित लगभग दो सौ दर्शकों में हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर भी सम्मिलित थे। एक व्यावसायिक छायाकार होने के नाते उनकी दृष्टि सामान्य दर्शक से कहीं अधिक तीक्ष्ण थी; उन्होंने इस नवीन माध्यम की सम्भावनाओं को तत्काल भाँप लिया।
इसी आकर्षण और दूरदर्शिता का परिणाम था कि सन् 1898 में भाटवडेकर ने लन्दन से इक्कीस गिन्नी (guineas) की भारी क़ीमत चुकाकर लुमिएर का सिनेमैटोग्राफ मँगवाया। यह उपकरण त्रि-आयामी रूप से उपयोगी था — यह एक साथ कैमरा, प्रोजेक्टर तथा फिल्म-प्रोसेसिंग मशीन का कार्य करता था। इस प्रकार भाटवडेकर वह पहले भारतीय बने जिन्होंने अपने निजी स्वामित्व में चलचित्र-निर्माण का यन्त्र प्राप्त किया।
भारत का प्रथम चलचित्र: "द रेसलर्स"
कैमरा हाथ में आते ही भाटवडेकर ने विलम्ब नहीं किया। उन्होंने बम्बई के हैंगिंग गार्डन में एक कुश्ती-प्रतियोगिता का आयोजन करवाया और उसी अवसर पर इस मल्ल-युद्ध को अपने कैमरे में फिल्मांकित कर लिया। यह लघु वृत्तचित्र "द रेसलर्स" (The Wrestlers, 1899) के नाम से जाना जाता है, और इसे व्यापक रूप से भारत में किसी भारतीय द्वारा निर्मित प्रथम चलचित्र होने का गौरव प्राप्त है। इसमें उस समय के विख्यात पहलवानों — पुण्डलिक दादा तथा कृष्णा नावी — के बीच हुई कुश्ती को अंकित किया गया था। उल्लेखनीय है कि यह फालके की "राजा हरिश्चन्द्र" जैसी कथा-प्रधान, अभिनय-आधारित फिल्म नहीं थी, अपितु एक वास्तविक घटना का सीधा दस्तावेज़ीकरण था — अर्थात् यथार्थ के निकटतम सिनेमा का प्रारम्भिक भारतीय रूप।
भाटवडेकर की दूसरी उल्लेखनीय फिल्म सर्कस के प्रशिक्षित बन्दरों के विषय पर आधारित थी, जिसे "मैन एण्ड मंकी" (Man and Monkey, 1899) के नाम से जाना जाता है। इन दोनों प्रारम्भिक फिल्म-पट्टियों (film reels) को धुलाई और प्रोसेसिंग के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया था, और सन् 1899 में इन्हें भारत में प्रदर्शित हो रही विदेशी फिल्मों के साथ ही सार्वजनिक रूप से दिखाया गया।
वृत्तचित्र-निर्माता के रूप में विस्तार
भाटवडेकर मूलतः एक छायाकार थे, और उनका कार्य-स्वभाव इस बात से स्पष्ट झलकता है कि उन्होंने चलचित्र-कैमरे को स्थिर-चित्र कैमरे के स्वाभाविक विस्तार के रूप में अपनाया। जिन सार्वजनिक अवसरों पर पहले वे अपने स्थिर-चित्र कैमरे के साथ उपस्थित रहते थे, अब वहीं वे चलचित्र-कैमरे की सहायता से उन्हीं दृश्यों को उनकी सजीव गतिशीलता में अंकित करने लगे। इस प्रकार वे एक अर्थ में भारत के प्रथम "न्यूज़रील कैमरामैन" या समाचार-वृत्तचित्रकार भी कहे जा सकते हैं।
सन् 1901 में उन्होंने एक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण घटना को फिल्मांकित किया — कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की परीक्षा में गणित विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले भारतीय विद्यार्थी रैंगलर आर॰ पी॰ परांजपे के भारत-आगमन का दृश्य। हज़ारों की संख्या में लोग परांजपे के स्वागत हेतु बम्बई बन्दरगाह पर एकत्रित हुए थे, और पुष्प-वर्षा तथा फूल-मालाओं के मध्य हुए इस समारोह में भारतीय तथा अंग्रेज़ दोनों समुदाय समान उत्साह से सम्मिलित हुए थे। भाटवडेकर द्वारा फिल्मांकित यह दृश्य "सर रैंगलर मि॰ आर॰ पी॰ परांजपे" के नाम से जाना जाता है, और इसे भारत का प्रथम वृत्तचित्र (documentary) मानने की परम्परा भी विद्वानों में प्रचलित है।
इसी कालखण्ड में उन्होंने अन्य विषयों पर भी लघु मूक श्वेत-श्याम वृत्तचित्र बनाए, जिनमें पारसी अग्नि-मन्दिर के जीर्णोद्धार पर आधारित "आतश बहराम" (Atash Behram, 1901) तथा पारसी मूल के ब्रिटिश संसद-सदस्य सर एम॰ एम॰ भावनगरी के आगमन पर केन्द्रित "लैंडिंग ऑफ़ सर एम॰ एम॰ भावनगरी" (1901) उल्लेखनीय हैं।
दिल्ली दरबार का फिल्मांकन
सन् 1903 में सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में भारत में आयोजित भव्य दरबारी समारोह — जो इतिहास में "दिल्ली दरबार" के नाम से प्रसिद्ध है — के अवसर पर भाटवडेकर अपने कैमरे के साथ उपस्थित थे और उन्होंने इस राष्ट्रीय महत्त्व की ऐतिहासिक घटना को फिल्मांकित किया। कुश्ती के अखाड़े से आरम्भ हुई उनकी यात्रा अब राष्ट्रीय स्तर के औपचारिक राजकीय आयोजनों तक जा पहुँची थी, जो उनके कार्य के बढ़ते सार्वजनिक महत्त्व और विश्वसनीयता का परिचायक है।
जीवन का उत्तरार्ध और निधन
अपने जीवन के अन्तिम चरण में भाटवडेकर सक्रिय फिल्मांकन से हटकर बम्बई के गेयटी थिएटर (Gaiety Theatre) के प्रबन्धक के रूप में कार्यरत रहे। यह भूमिका भी सिनेमा तथा सार्वजनिक मनोरंजन जगत से उनके आजीवन जुड़ाव को ही दर्शाती है। हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर का निधन 20 फरवरी 1958 को हुआ, अर्थात् उन्होंने नब्बे वर्ष की दीर्घ आयु पाई और भारतीय सिनेमा के मूक युग से लेकर उसके स्वर्णिम कथा-प्रधान युग तक के विकास को अपनी आँखों से देखा।
ऐतिहासिक महत्त्व एवं विरासत
सावे दादा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान यह है कि उन्होंने सिद्ध किया कि चलचित्र-निर्माण केवल पश्चिमी विशेषज्ञों का ही विशेषाधिकार नहीं है — एक भारतीय भी, समुचित साधन तथा दृष्टि के साथ, इस नवीन माध्यम में मौलिक कार्य कर सकता है। यद्यपि उनकी फिल्में कथा-प्रधान नहीं थीं और उनमें फालके की भाँति कोई पौराणिक अथवा साहित्यिक आख्यान नहीं गढ़ा गया, तथापि तथ्यपरक तथा वृत्तचित्र-शैली के चलचित्र-निर्माण की जो परम्परा उन्होंने आरम्भ की, वह आगे चलकर भारतीय न्यूज़रील तथा वृत्तचित्र-निर्माण की सुदीर्घ परम्परा की आधारशिला सिद्ध हुई। राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम (NFDC) सहित अनेक आधिकारिक स्रोतों में उन्हें भारत में गतिशील दृश्य रचने वाले प्रथम भारतीय के रूप में सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता है।
फालके के नाम पर भारतीय सिनेमा के जन्म-दिवस का उत्सव मनाते समय हरिश्चन्द्र सखाराम भाटवडेकर जैसे अग्रदूतों को विस्मृत कर देना भारतीय फ़िल्म-इतिहास-लेखन की एक बड़ी चूक होगी। सावे दादा की कहानी यह स्मरण कराती है कि किसी भी सांस्कृतिक माध्यम का इतिहास केवल उसकी उत्कृष्ट कलात्मक कृतियों से नहीं, अपितु उन प्रारम्भिक, प्रयोगधर्मी तथा साहसिक प्रयासों से भी रचा जाता है जो नए मार्ग खोलते हैं। एक स्थिर-चित्र छायाकार से भारत के प्रथम गतिशील-दृश्य-निर्माता तक की उनकी यात्रा भारतीय सिनेमा के आदि-इतिहास का एक अनिवार्य तथा प्रेरणादायी अध्याय है।
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