जब एक जादूगर ने यथार्थ की मशीन में जादू ढूँढ लिया
सन् 1895 के दिसंबर माह में आयोजित लुमिएर बंधुओं के पहले ही फिल्म-प्रदर्शन में पेरिस के रॉबर्ट हूदिन थियेटर के स्वामी और प्रबंधक, तथा अपने समय के प्रख्यात जादूगर और कार्टूनिस्ट, जॉर्ज मेल्यिए भी उपस्थित थे। शो समाप्त होते ही मेल्यिए ने लुमिएर के इस सिनेमैटोग्राफ को दस हज़ार फ़्रांक में ख़रीदने का प्रस्ताव रख दिया , यह तत्परता स्वयं इस बात का संकेत थी कि मेल्यिए ने इस यंत्र में वह संभावना देख ली थी, जिसे लुमिएर बंधु स्वयं अभी पूरी तरह पहचान नहीं पाए थे। किंतु उस समय लुमिएर बंधुओं ने अपना उपकरण बेचने से इनकार कर दिया। एक वर्ष बाद जब उन्होंने अंततः अपना सिनेमैटोग्राफ बाज़ार में उतारा, तब मेल्यिए को उसकी दस गुनी क़ीमत चुकानी पड़ी , मानो नियति यह परीक्षा लेना चाहती थी कि क्या उनकी दृष्टि उस मूल्य के योग्य भी है।
सन् 1896 से ही मेल्यिए ने अपनी रुचि के अनुरूप फ़िल्में बनाना आरंभ कर दिया। किंतु मेल्यिए की राह लुमिएर द्वारा दिखाई गई राह से एकदम विपरीत दिशा में जाती थी , जहाँ लुमिएर की फ़िल्मों में यथार्थ पर बल था, वहाँ मेल्यिए की फ़िल्मों में कल्पना और चमत्कार का साम्राज्य था। यह अंतर आकस्मिक नहीं था; एक जादूगर के लिए कैमरा कोई दर्ज करने वाला यंत्र नहीं, बल्कि भ्रम रचने का एक नया औज़ार था। सन् 1896 में बनी उनकी आरंभिक फ़िल्में ही उनकी इस रुचि को स्पष्ट कर देती हैं। पहली फ़िल्म थी 'बाज़ीगरी', जिसमें एक बाज़ीगर दस सेकंड में दस हैट बना डालने का चमत्कार दिखाता था। एक अन्य फ़िल्म में एक स्त्री मंच पर प्रवेश करती है और अचानक विलीन हो जाती है। साठ फुट लंबी फ़िल्म 'जादुई बक्सा' में पाँच दृश्य-परिवर्तन थे , एक बालक बक्से से बाहर निकलता है, दो टुकड़ों में विभक्त हो जाता है, दोनों टुकड़े दो बालकों में परिवर्तित होकर आपस में कुश्ती लड़ने लगते हैं, फिर उनमें से एक विलीन हो जाता है और दूसरा दो ध्वजों में बदल जाता है।
भ्रम की प्रयोगशाला: सिनेमाई तरकीबों का जनक
मेल्यिए ने सिनेमाई संभावनाओं के साथ अत्यंत निर्भीकता से प्रयोग किए। उन्होंने एक बिंब पर दूसरा बिंब आरोपित करके दोहरे-बिंब की तकनीक विकसित की। कैमरे को बीच में रोककर और दृश्य-परिवर्तन के माध्यम से उन्होंने पात्रों के अचानक विलीन हो जाने और शून्य से पुनः प्रकट हो जाने की तरकीब खोज निकाली। इसके साथ ही उन्होंने फिल्म को अत्यंत तेज़ या अत्यंत धीमी गति से चलाने पर उत्पन्न होने वाले प्रभावों का भी सफल प्रयोग किया , ये सभी तकनीकें आगे चलकर सिनेमा की व्याकरण-पुस्तक का अनिवार्य अंग बन गईं, भले ही उस समय ये केवल एक जादूगर के हाथों की चमत्कारिक क्रीड़ा भर प्रतीत होती थीं।
सन् 1897 में ही मेल्यिए ने अपनी भूमि पर बीस फुट चौड़ा और पचास फुट लंबा एक स्टूडियो बनवा लिया था , यह उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण था कि वे सिनेमा को एक स्थायी, संस्थागत रूप देने की दिशा में विश्व के अग्रणी लोगों में से एक थे। सन् 1898 में उन्होंने 'कई सिर वाला आदमी' नामक फ़िल्म बनाई, तथा एक अन्य फ़िल्म में एक ही व्यक्ति संपूर्ण ऑर्केस्ट्रा बजाता दिखाया गया (यह स्मरणीय है कि हमारे यहाँ रावण के दस सिरों को पर्दे पर विश्वसनीय ढंग से दिखा पाने में भारतीय फिल्मकारों को इसके बहुत वर्षों बाद सफलता मिली)। सन् 1902 में उन्होंने 'इंडिया रबर से बने सिर वाला आदमी' नामक फ़िल्म बनाई, जिसमें एक पागल वैज्ञानिक अपना सिर उतार लेता है और उसे गुब्बारे की भाँति फुला देता है , उसका सहायक भी उस गुब्बारेनुमा सिर को फुलाने लगता है, अंततः अत्यंत ज़ोर से फूँक मारने पर वह गुब्बारा फट जाता है।
साहित्य से सिनेमा तक: कल्पना की एक नई भाषा
मेल्यिए ही वह पहला व्यक्ति थे, जिन्होंने साहित्यिक कृतियों पर आधारित फ़िल्में बनाने की शुरुआत की , यह अकेला योगदान ही उन्हें सिनेमा-इतिहास में विशिष्ट स्थान दिला देता है, क्योंकि इसने सिनेमा को केवल दृश्य-दस्तावेज़ीकरण के परे, कथा-वाचन की एक स्वतंत्र कला के रूप में स्थापित करने की दिशा में पहला ठोस क़दम उठाया। सन् 1899 में उन्होंने 'ड्रेफ़्यूस अफ़ेयर' पर आधारित फ़िल्म बनाई, जिसमें बारह दृश्य थे और साठ फुट लंबी तेरह फिल्म-पट्टियों का प्रयोग किया गया था; यह फ़िल्म पर्दे पर पंद्रह मिनट तक चलती थी , उस युग के लिए यह असाधारण रूप से दीर्घ रचना थी। इसके अतिरिक्त मेल्यिए ने 'गुलिवर की यात्राओं', 'रॉबिन्सन क्रूसो', 'फ़ॉस्ट का पतन' तथा 'परीलोक की कथाओं' पर भी फ़िल्में बनाईं, और इस प्रकार विश्व-साहित्य के कल्पना-लोक को सिनेमा के पर्दे पर उतारने वाले पहले फिल्मकार बने।
चंद्रलोक की यात्रा: कल्पना की सर्वोच्च उड़ान
सन् 1902 में मेल्यिए ने जूल्स वर्न की विज्ञान-कथा पर आधारित 'चंद्रलोक की यात्रा' (अ ट्रिप टू द मून) नामक फ़िल्म बनाई, जिसे उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। तीस दृश्यों में विभाजित इस फ़िल्म में हास्य और विस्मय, दोनों का सुंदर सामंजस्य था। इस फ़िल्म में मेल्यिए स्वयं एक पागल प्रोफ़ेसर की भूमिका में हैं, जो व्यर्थ की बहस में उलझे एक वैज्ञानिक को अचानक ग़ायब कर देता है। चंद्रमा की यात्रा पर निकला अंतरिक्ष-यान चंद्रमा पर बनी एक विशाल आँख में सीधे प्रवेश करते हुए उसकी सतह पर उतरता है , सिनेमा के इतिहास में यह दृश्य आज भी सर्वाधिक स्मरणीय बिंबों में गिना जाता है। पूरी फ़िल्म में अनेक प्रकार के तरकीब-प्रभाव (ट्रिक इफ़ेक्ट्स) दिखाए गए हैं , ख़तरा निकट आने पर चंद्रमा के मूल निवासी धुएँ में बदल जाते हैं, विभिन्न ग्रह और नक्षत्र निद्रा में डूबे वैज्ञानिकों के समीप से गुज़रते रहते हैं, और वैज्ञानिक तब आनंद से पागल हो उठते हैं जब वे पृथ्वी को, सूर्य की भाँति, चंद्रमा की सतह से उगते और धीरे-धीरे आकाश में ऊपर उठते देखते हैं।
अपने समय के वैज्ञानिकों को मूर्ख ठहराना और उनका उपहास उड़ाना मेल्यिए को विशेष रूप से प्रिय था , यह प्रवृत्ति उनकी बाद की फ़िल्मों 'डॉक्टरों का रहस्य' (1908) तथा 'खंभे की जीत' (1912) में भी स्पष्ट दिखाई देती है, जिनमें वैज्ञानिक बुद्धि को बार-बार परिहास का विषय बनाया गया।
एक कदम आगे, फिर भी मंच की सीमा में बँधा हुआ
जॉर्ज मेल्यिए अपने पूर्ववर्ती लुई लुमिएर से केवल एक ही क़दम आगे जा सके, किंतु वह क़दम निर्णायक था , उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कैमरा केवल यथार्थ के पुनर्प्रस्तुतीकरण का यंत्र नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक करने में सक्षम है। फिर भी मेल्यिए का कैमरा एक ही स्थान पर स्थिर बना रहा; सब कुछ एक मंच पर ही घटित होता था, जहाँ विविध प्रकार के सेट सजाए जाते थे। इसीलिए मेल्यिए की फिल्म-कला को कभी-कभी 'प्लास्टर, गरारियों (पुली) और रंग की कला' भी कहा जाता है। उन्होंने सिनेमाई समय के साथ खेलने की समस्त संभावनाओं का पता लगा लिया था, किंतु सिनेमाई अवकाश (स्पेस) को तोड़ने और जोड़ने की कला , अर्थात् एक दृश्य को दूसरे दृश्य से संपादित कर एक नया अर्थ रचने की कला , से वे सर्वथा अपरिचित ही रहे।
सन् 1902 मेल्यिए के जीवन का स्वर्णिम वर्ष था, जब उनकी फ़िल्में विश्वभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही थीं। लगभग एक दशक तक फिल्म-प्रेमियों के हृदय और मस्तिष्क पर छाए रहने के बाद, सन् 1914 में अपनी अंतिम फ़िल्म बनाकर, जॉर्ज मेल्यिए अपनी ही फ़िल्मों के पात्रों की भाँति, अचानक और रहस्यमय ढंग से दृश्य से ग़ायब हो गए।
पर्दे से गुमनामी तक, और फिर स्मृति में वापसी
सन् 1928 में एक पत्रकार ने उन्हें मोंपारनास के एक ढाबे (कियोस्क) पर खिलौने और आइसक्रीम बेचते हुए पाया , यह दृश्य स्वयं इतना नाटकीय है कि किसी मेल्यिए-निर्मित फ़िल्म का ही एक दृश्य प्रतीत होता है, जिसमें विश्व-प्रसिद्ध एक कलाकार समय के हाथों गुमनामी में विलीन हो जाता है। मेल्यिए के सहयोग से ही उनकी अनेक फ़िल्में पुनः खोज निकाली गईं, और उनके लिए एक पेंशन की व्यवस्था भी की गई। सिनेमा के इस प्रथम जादूगर का देहांत सन् 1938 में एक मनोरोग चिकित्सालय में हुआ , एक ऐसा अंत, जो उनके सिनेमाई जीवन के जादू और यथार्थ के बीच की खाई को और भी गहरा कर देता है।
लुमिएर बंधुओं ने कैमरे को सत्य दर्ज करने का यंत्र बनाया था; जॉर्ज मेल्यिए ने उसी यंत्र से सत्य को झुठलाने की कला सीखी। सिनेमा के इतिहास में यही वह पहला मोड़ था, जहाँ से यह माध्यम केवल दुनिया को दिखाने का साधन न रहकर, नई दुनियाएँ रचने की कला में बदल गया।
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