जब कैमरा दर्ज करने से आगे बढ़कर कहानी कहने लगा

सन् 1902 में, जब फ्रांस में जॉर्ज मेल्यिए सिनेमा को कल्पना और भ्रम की एक नई कला में ढालने में जुटे थे, अमरीका में भी फिल्म-माध्यम की संभावनाओं की खोज समांतर रूप से जारी थी। लुमिएर की परंपरा का अनुसरण करते हुए अमरीका में सन् 1903 तक मात्र एक ही उल्लेखनीय फ़िल्म बन पाई थी — जॉन राइस और मे इर्विन की 'किस'। सिनेमा के इस दूसरे बड़े केंद्र में अभी तक कोई ऐसा फिल्मकार सामने नहीं आया था, जो कैमरे को केवल दर्ज करने वाले यंत्र से आगे ले जा सके। यह अवसर शीघ्र ही एक प्रतिभाशाली फिल्मकार, एडविन एस० पोर्टर, को एडिसन के कारख़ाने में मिला।

पोर्टर को सिनेमा-इतिहास में व्यवसायी थॉमस एडिसन और कलाकार डेविड वार्क ग्रिफ़िथ के बीच की एक निर्णायक कड़ी माना जाता है — यह पहचान अकारण नहीं है। पोर्टर ने सन् 1900 से 1909 तक एडिसन के प्रतिष्ठान में निर्माण-प्रबंधक के रूप में कार्य किया, और यह एक ऐतिहासिक संयोग ही था कि जब ग्रिफ़िथ अभिनेता बनने की इच्छा लेकर एडिसन के कारख़ाने में पहुँचे, तो उनकी पहली भेंट पोर्टर से ही हुई। इस प्रकार सिनेमा की एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से, मानो नियति द्वारा निर्धारित किसी सूत्र से, स्वतः जुड़ गई।

तर्कसंगत कथा की खोज: दो शॉटों के बीच का अदृश्य सेतु

पोर्टर एक कुशल मैकेनिक और दक्ष कैमरामैन थे, और यही तकनीकी सूझ-बूझ उन्हें एक ऐसे प्रयोग की ओर ले गई, जिसने सिनेमा की दिशा ही बदल दी — कैमरे के माध्यम से एक तर्कसंगत, सुसंबद्ध कथा कहने की पहली गंभीर कोशिश। इस प्रयोग में उन्हें पूर्ण सफलता मिली। सन् 1903 में पोर्टर ने दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण फ़िल्में बनाईं — 'लाइफ़ ऑफ़ एन अमेरिकन फ़ायरमैन' और 'द ग्रेट ट्रेन रॉबरी'। इन दोनों फ़िल्मों की मूल विशेषता यह थी कि इनमें एक शॉट को दूसरे शॉट से इस प्रकार जोड़ा गया कि चलचित्रों की एक शृंखला ही स्वयं एक कहानी कहने लगी — यही तकनीक आगे चलकर 'फ़िल्म-संपादन' (एडिटिंग) के नाम से सिनेमा-व्याकरण का आधारस्तंभ बनी।

'अमेरिकन फ़ायरमैन' में अग्निशामक दल को आग लगने की सूचना मिलने से लेकर, फ़ायर ब्रिगेड के रवाना होने और अंततः आग में फँसे लोगों को बचाए जाने तक की संपूर्ण कथा प्रस्तुत की गई है। इस फ़िल्म की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें कुछ शॉट वास्तविक, घटित हो रही घटना के हैं, जबकि कुछ अन्य शॉट बाद में अभिनय द्वारा फिल्माए गए थे — और पोर्टर ने इन दोनों भिन्न प्रकार के शॉटों को इतनी कुशलता से जोड़ा कि दर्शक के लिए यथार्थ और अभिनय के बीच की सीमा-रेखा लगभग अदृश्य हो गई। पोर्टर की सृजनात्मक बुद्धिमत्ता का एक और प्रमाण यह है कि यथार्थ घटना की वह फिल्मांकित पट्टी वर्षों से एडिसन के गोदाम में निष्क्रिय पड़ी थी — पोर्टर ने ही उस भूली हुई सामग्री को गोदाम से निकालकर उसमें नया सिनेमाई प्राण फूँका।

'द ग्रेट ट्रेन रॉबरी': कैमरे के लिए रची गई पहली कहानी

पोर्टर की अगली और अधिक महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'द ग्रेट ट्रेन रॉबरी' इस दृष्टि से विशिष्ट है कि यह किसी पूर्व-घटित यथार्थ पर आधारित नहीं, बल्कि पूर्णतः कैमरे के लिए, कैमरे की भाषा में ही रची गई थी। बारह दृश्यों में विभाजित इस फ़िल्म में, इन दृश्यों को क्रमबद्ध रूप से जोड़कर एक संपूर्ण कहानी कही गई — डकैती की योजना से लेकर उसके अंजाम और अंततः डाकुओं के पीछे किए गए पीछा तक।

आज जब हम 'द ग्रेट ट्रेन रॉबरी' को देखते हैं, तो यह फ़िल्म हमें विशेष रूप से प्रभावित नहीं करती — इसका कारण यह है कि प्रत्येक दृश्य में संपूर्ण घटना एक ही स्थिर शॉट में मंचित कर दी गई है, और कैमरा हर दृश्य में गतिहीन बना रहता है। यहाँ तक कि पहले और अंतिम दृश्य को छोड़कर, यदि बीच के शॉटों का क्रम भी बदल दिया जाए, तो कहानी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा — अर्थात् संपादन अभी भी दृश्यों के बीच किसी गहरे कारण-कार्य संबंध की बजाय, उन्हें केवल क्रमवार जोड़ने तक ही सीमित था। फिर भी, सन् 1903 के उस दौर में, गतिशील बिंबों की एक शृंखला द्वारा इतनी विस्तृत और सुसंगत कथा कह पाने का यह प्रयास अपने-आप में युगांतरकारी था, और यही कारण है कि यह फ़िल्म आज भी सिनेमा-इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखती है।

एक अधूरी यात्रा, और एक विरासत जो आगे बढ़ी

इस उपलब्धि के बाद पोर्टर कोई और उल्लेखनीय फ़िल्म नहीं बना सके — मानो उन्होंने वह द्वार तो खोल दिया था, जिससे आगे बढ़ने का सामर्थ्य किसी अन्य प्रतिभा को चाहिए था। यह सामर्थ्य आगे चलकर डेविड वार्क ग्रिफ़िथ में प्रकट हुआ, जिन्होंने पोर्टर द्वारा खोजी गई संपादन की इस प्रारंभिक तकनीक को आधार बनाकर उसे कहीं अधिक जटिल, भावनात्मक और सिनेमाई ऊँचाई तक पहुँचाया। इस अर्थ में पोर्टर का महत्त्व उनकी अपनी फ़िल्मों से भी बढ़कर उस मार्ग में है, जिसे उन्होंने अनजाने ही एक भविष्य के महानतम फिल्मकार के लिए प्रशस्त कर दिया — वही मार्ग, जिस पर लुमिएर बंधुओं का यथार्थवाद और जॉर्ज मेल्यिए की कल्पनाशीलता, दोनों मिलकर, सिनेमा को कहानी कहने की एक सर्वथा नई कला में रूपांतरित करने वाले थे।