एक असफल नाटककार की अनिच्छुक शुरुआत

ग्रिफ़िथ (1875–1948) की चर्चा के बिना सिनेमा के इतिहास पर लिखी गई कोई भी पुस्तक अधूरी ही रह जाएगी। सन् 1907 में ग्रिफ़िथ एडिसन की कंपनी में एडविन एस० पोर्टर को अपनी लिखी एक कहानी बेचने के इरादे से पहुँचे थे। इससे पहले उनका एक नाटक 'एक मूर्ख और एक लड़की' मंचित होकर बुरी तरह असफल हो चुका था। एडिसन कंपनी में उन्हें अभिनेता का काम मिला, जिसे उन्होंने विवशता में स्वीकार किया , एक सफल नाट्य-लेखक और रंगमंच-अभिनेता बनने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले युवक के लिए फ़िल्मों में काम करना, स्वयं की दृष्टि में, असफलता स्वीकार कर लेने जैसा ही था। यह विडंबना ही है कि जिस माध्यम को ग्रिफ़िथ ने विवशतापूर्वक अपनाया, उसी माध्यम को आगे चलकर उन्होंने अपनी सर्वाधिक स्थायी पहचान दी।

एक वर्ष बाद जब ग्रिफ़िथ को निर्देशन का दायित्व सौंपा गया, तो उन्होंने इसे भी अनमने मन से ही स्वीकार किया। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ग्रिफ़िथ ने सिनेमा में क्लोज़-अप, संपादन या समांतर कटिंग जैसी किसी तकनीक का आविष्कार नहीं किया , यह कहना कहीं अधिक सटीक होगा। सन् 1907 तक यूरोप में उपन्यास और कथा-लेखन, संगीत तथा चित्रकला का पर्याप्त विकास हो चुका था, और बत्तीस वर्षीय ग्रिफ़िथ, जो स्वयं एक लेखक-नाटककार बनना चाहते थे, साहित्य की विभिन्न विधाओं में हो रही इस प्रगति से भली-भाँति परिचित थे। सिनेमा के क्षेत्र में ग्रिफ़िथ का वास्तविक योगदान यही है कि उन्होंने सबसे पहले यह पहचाना कि सिनेमा की मूलभूत इकाई, रंगमंच की तरह 'दृश्य' नहीं, बल्कि 'शॉट' है। इसी पहचान के आधार पर उन्होंने एक दृश्य को कई शॉटों में विभाजित करना, और फिर इन शॉटों को पुनः जोड़कर एक संपूर्ण दृश्य की रचना करना आरंभ किया , यह प्रतीत होने में सरल, किंतु वास्तव में सिनेमा की भाषा को समझने की दिशा में एक असाधारण उपलब्धि थी।

प्रयोगों का दशक, और निर्माताओं से टकराव

सन् 1909 से ही ग्रिफ़िथ ने साहित्यिक, ऐतिहासिक, हास्य, युद्ध तथा तत्कालीन सामाजिक समस्याओं पर आधारित एक-रील की फ़िल्में बनाना आरंभ कर दिया था। सन् 1909 में बनी 'शराबी का सुधार' में उन्होंने प्रकाश के संयोजन द्वारा नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया, तथा 'रामोना' (1910) में एक्स्ट्रीम लॉन्ग शॉट के माध्यम से फ़िल्म में परिवेश की स्थापना के महत्त्व को प्रदर्शित किया , यह दोनों प्रयोग बताते हैं कि ग्रिफ़िथ के लिए प्रत्येक तकनीकी चुनाव किसी भावनात्मक या कथात्मक उद्देश्य से जुड़ा हुआ था।

किंतु ग्रिफ़िथ को भी अपने निर्माताओं के कोप का भाजन बनना पड़ा। उनकी एक दीर्घ फ़िल्म को दो टुकड़ों में विभक्त कर 'हिज़ ट्रस्ट' और 'हिज़ ट्रस्ट फ़ुलफ़िल्ड' नामों से प्रदर्शित किया गया। उनकी अगली लंबी फ़िल्म टेनीसन की कविता पर आधारित 'इनॉक आर्डेन' थी। और जब उन्होंने चार-रील की 'जुडिथ ऑफ़ बेथुलिया' बनाई, तो निर्माता इतने क्षुब्ध हुए कि ग्रिफ़िथ को इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा , यह घटना इस बात का प्रमाण है कि उस दौर के व्यावसायिक फ़िल्म-प्रतिष्ठान अभी उस कलात्मक महत्त्वाकांक्षा के लिए तैयार नहीं थे, जो ग्रिफ़िथ के भीतर पल रही थी।

'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन': कीर्ति और कलंक का सह-अस्तित्व

सन् 1915 में ग्रिफ़िथ ने अपने जीवन की सबसे महत्त्वाकांक्षी फ़िल्म 'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन' बनाई। बारह रील की यह फ़िल्म एक लाख डॉलर की भारी लागत से बनी थी, और व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत सफल रही , ग्रिफ़िथ का निवेश कई गुना होकर उन्हें वापस लौटा। इस अर्जित धन को उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म 'इंटॉलरेंस' में निवेश किया, जो दुर्भाग्यवश व्यावसायिक दृष्टि से असफल सिद्ध हुई।

'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन' की कहानी आज अत्यंत विवादास्पद मानी जाती है, और इस विवाद को छिपाना या हल्के में लेना उचित नहीं होगा। इस फ़िल्म में मुख्य निग्रो भूमिका के लिए एक श्वेत अभिनेता का चुनाव किया गया था। मालिक के प्रति वफ़ादार और सेवाभावी निग्रो पात्रों को हृदय से भला और सच्चा दिखाया गया, जबकि विद्रोही निग्रो चरित्रों को क्रूर और अत्याचारी के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस फ़िल्म में कू-क्लक्स-क्लैन द्वारा चलाए गए 'निग्रो लोगों को सुधारने' के अभियान की भी खुले तौर पर सराहना की गई थी। इस प्रकार, सिनेमाई तकनीक की दृष्टि से जो फ़िल्म एक मील का पत्थर मानी जाती है, वही फ़िल्म वैचारिक दृष्टि से नस्लवादी पूर्वाग्रहों की स्थायी छाप भी छोड़ जाती है , और यह दोहरापन ग्रिफ़िथ के संपूर्ण मूल्यांकन को जटिल बना देता है।

पुनर्मूल्यांकन: क्या शिखर वास्तव में 1915-16 में ही आ गया था?

यह धारणा अब पुरानी पड़ चुकी है कि 'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन' (1915) और 'इंटॉलरेंस' (1916) ग्रिफ़िथ की सर्वोत्तम कृतियाँ हैं, और इस शिखर तक पहुँचने के बाद उनके लिए केवल नीचे उतरना ही शेष रह गया था। ग्रिफ़िथ द्वारा निर्मित-निर्देशित समस्त फ़िल्में आज भी उपलब्ध होने के कारण, नई पीढ़ी को इस प्रथम रचनाकार के संपूर्ण कार्य को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर मिल सका है, और इस पुनरावलोकन ने उपरोक्त धारणा को चुनौती दी है। आज ग्रिफ़िथ की श्रेष्ठतम फ़िल्में थॉमस बर्क की कहानी 'द चिंक एंड द चाइल्ड' पर आधारित 'ब्रोकन ब्लॉसम्स' (1919), तथा सन् 1920 में बनी 'वे डाउन ईस्ट' मानी जाती हैं।

'ब्रोकन ब्लॉसम्स' एक चीनी बौद्ध युवक च्यांग हुआ और लंदन के मलिन बस्तियों में रहने वाली लूसी के बीच पल्लवित होने वाली एक दुखांत प्रेम-कथा है। 'वे डाउन ईस्ट' के अंतिम दृश्य में नायिका आत्महत्या के प्रयास में एक नाव पर बैठकर एक विशालकाय जल-प्रपात की ओर बढ़ती है , स्पष्टतः यह अमरीका का नियाग्रा प्रपात है, जबकि नायिका वास्तव में किसी बहुत दूर की नदी में नाव खे रही होती है। ग्रिफ़िथ ने प्रपात के पूर्वनिर्मित (स्टॉक) शॉट को नायिका के नाव खेने वाले शॉटों के साथ इंटर-कट कर एक ऐसा प्रभाव रचा, जिसे बाद में सिनेमा-सिद्धांत में 'रचनात्मक भूगोल' (क्रिएटिव जियोग्रफ़ी) कहा गया , यह अवधारणा जिसे आगे चलकर रूसी फिल्मकारों ने विस्तार से विश्लेषित और परिभाषित किया।

ग्रिफ़िथ सन् 1926 तक उल्लेखनीय फ़िल्में बनाते रहे। किंतु सन् 1930 में बनी 'अब्राहम लिंकन' उनकी एक अत्यंत कमज़ोर रचना थी, और सन् 1931 में बनी 'द स्ट्रगल' ने यह सिद्ध कर दिया कि सिनेमा-माध्यम पर ग्रिफ़िथ की पकड़ अब छूट चुकी थी। सन् 1948 में हॉलीवुड में उनका देहांत हुआ , एक ऐसे कलाकार का अंत, जो अपने समय के शिखर से गुमनामी तक की पूरी यात्रा जी चुका था।

ग्रिफ़िथ बनाम आइज़ेंस्टीन: एक बहस जो कभी समाप्त नहीं हुई

किंतु ग्रिफ़िथ पर चलने वाली बहस उनकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हुई। रूस के महान फिल्मकार सर्गेई मिखाइलोविच आइज़ेंस्टीन की ख्याति ने ग्रिफ़िथ के प्रशंसकों को एक नई शब्दावली अपनाने के लिए विवश किया, और आगे चलकर ग्रिफ़िथ तथा आइज़ेंस्टीन की फ़िल्मों को सिनेमा-सिद्धांत में 'थीसिस' और 'एंटीथीसिस' के रूप में विश्लेषित किया जाने लगा। इसी कारण ग्रिफ़िथ की फ़िल्मों को नए परिप्रेक्ष्य में देखने के प्रयास, सिनेमा की भाषा को समझने की हमारी संपूर्ण परियोजना में सदैव कुछ नया जोड़ते रहे हैं।

फ़िल्म-आलोचक लुइस जेकब के शब्दों में:

"सन् 1908 में बनी 'आफ़्टर मैनी इयर्समें ग्रिफ़िथ ने पहली बार क्लोज़-अप का प्रयोग किया। इस दृश्य में नायिका अपने पति के विषय में सोच रही है। इस विचारमग्न पत्नी के मन में पैठने के लिए ग्रिफ़िथ उसके चेहरे का एक विशाल क्लोज़-अप पर्दे पर दिखाते हैं। अगले दृश्य में हम देखते हैं कि उसका पति दूर रेगिस्तान में किस स्थिति में है। इस प्रकार ग्रिफ़िथ छायांकन के माध्यम से दर्शकों को नायिका के निकट लाते गएऔर फिर संपादन के सहारे उन्हें नायिका की भीतरी सोच तक ले गए।"¹³

लुइस जेकब आगे लिखते हैं:

"ग्रिफ़िथ द्वारा लिया गया दूसरा उल्लेखनीय क्लोज़-अप 'इंटॉलरेंसकी नायिका मे मार्श के आपस में गुँथे हाथों का है। इसमें पर्दे पर दो बड़े हाथों की काँपती-थरथराती उँगलियाँ दिखाई देती हैंमानो नायिका की उद्विग्नता को व्यक्त करने की समस्त अन्य संभावनाएँ समाप्त हो गई हों।"

सिगफ़्रीड क्राकाउअर अपनी पुस्तक 'थियरी ऑफ़ फ़िल्म' में लुइस जेकब की इसी थीसिस को और आगे विस्तार देते हैं:

"जैसे ही हम मे मार्श के गुँथे हाथों के बड़े क्लोज़-अप को देखते हैंहमारे भीतर एक परिवर्तन घटित होता हैहम भूल जाते हैं कि यह मात्र साधारण हाथ हैंजिन्हें शरीर से अलग करकेअत्यंत बड़ा करके दिखाया गया है। बल्कि वे एक स्वतंत्र सत्ता का रूप ले लेते हैंजिनमें जीवन स्वयं स्पंदित हो रहा प्रतीत होता है। प्रत्येक बड़ा क्लोज़-अप पदार्थ की संरचना के अनपहचाने पहलुओं को उद्घाटित करता हैयह हमें वस्तुओं के उस मूल उत्स तक ले जाता हैजहाँ से उनका निर्मित होना और आकार ग्रहण करना आरंभ हुआ था। उस क्षण ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम किसी वायुयान से धरती को देख रहे होंआँखें विशाल झीलों और अतल गहराइयों में परिवर्तित हो जाती हैं। ऐसे बिंब हमारे परिवेश को दो प्रकार से बृहद बना देते हैंएक ओरबिंब का आकार वस्तु के वास्तविक आकार से कई गुना बड़ा हो जाने के कारण पारंपरिक यथार्थ की धज्जियाँ उड़ जाती हैंदूसरी ओरहमारे सामने एक ऐसा संसार खुल जाता हैजिसे हम प्रायः केवल स्वप्न में ही खोज पाते हैं। जिस प्रकार ग्रिफ़िथ हमें क्लोज़-अप तक ले जाते हैंउससे यह प्रमाणित होता है कि उनकी दृढ़ मान्यता थी कि सिनेमा हमें वस्तुओं के उत्स तक पहुँचाता हैक्योंकि कोई भी फ़िल्म अंततः भावनात्मक और बौद्धिक घटनाओं के मेल से ही रची जाती है।

यह ध्यान देने योग्य है कि यह समस्त विचार-सामग्री और यह शब्दावली, ग्रिफ़िथ से बहुत बाद की पीढ़ी की उपज है। ग्रिफ़िथ स्वयं सिनेमाई संप्रेषण के विषय में इतना ही कह सके थे: "अमरीकी पद्धति यह प्रयत्न करती है कि फ़िल्म की गति मानव के हृदय की धड़कन के अनुरूप हो, जो वास्तव में उत्तेजना के क्षणों में तीव्र हो जाती है और रहस्यात्मक क्षणों में बिल्कुल ठहर-सी जाती है।"

किंतु किसी भी फ़िल्म को संपूर्णतः व्याख्यायित कर पाने का प्रयास सदैव मैक्सिम गोर्की के उन शब्दों में अंतर्निहित भाव से जुड़ा रहता है , 'इन बिंबों का प्रभाव विलक्षण, जटिल और बहुआयामी है' , क्योंकि सिनेमा को समग्रतः व्याख्यायित करने के प्रयासों को यदि पूर्णतः तिलांजलि दे दी जाए, तो सिनेमा स्वयं एक अनियंत्रित, फ़ासीवादी शक्ति में बदल जाने का जोखिम उठा लेता है।

भारत में लुमिएर की परंपरा, और एक बेरोज़गार व्यक्ति का दृढ़ संकल्प

इस बीच, भारत में भी सिनेमा अपनी राह पर आगे बढ़ रहा था। सन् 1912 तक हम लुमिएर की परंपरा का अनुसरण करते हुए कई उत्तम फ़िल्में बना चुके थे। इनमें प्रमुख थीं , 'सीनियर रैंगलर की उपाधि से सम्मानित आर० पी० परांजपे का बंबई बंदरगाह पर स्वागत' (1902), 'बंगाल विभाजन विरोधी जुलूस' (1905), 'बाल गंगाधर तिलक का कलकत्ता आने पर स्वागत' (1906), 'हैदराबाद में आई बाढ़ के दृश्य' (1908), 'शरणार्थी लामा का दार्जिलिंग पहुँचने पर स्वागत' (1910), 'सम्राट जॉर्ज पंचम और साम्राज्ञी मेरी का बंबई आगमन' (1911), 'दिल्ली दरबार तथा समारोह' (1911), तथा राजनीतिक कारणों से प्रतिबंधित कर दी गई 'बंबई के रुई गोदाम में लगी भयंकर आग' (1912) (सूची: जे० बी० एच० वाडिया)।

सन् 1911 में बंबई शहर में एक व्यक्ति भारत की पहली कथा-फ़िल्म बनाने के दृढ़ संकल्प के साथ अपने प्रयोगों में जुटा हुआ था। वह अपनी आयु के चालीस वर्ष पार कर चुका था, बेरोज़गार और अस्वस्थ था, और उसके परिवार का जीवन-यापन घर की छोटी-छोटी वस्तुएँ बेचकर ही चल पा रहा था। इस अनाम व्यक्ति की कहानी में ही भारतीय सिनेमा की वास्तविक शुरुआत की कुंजी छिपी है।