"मुझे अपनी फ़िल्म 'सेतु बंधन' (निर्माण-काल 1931) में सीता की भूमिका के लिए एक अभिनेत्री चुननी थी। कई अभिनेत्रियाँ रिहर्सल में आईं। उनमें से एक को चुनकर मैं एक घंटे तक भूमिका समझाता रहा। इसके बाद उसने कहा, 'आप चिंतित न हों, मैं बहुत अच्छा काम करूँगी। लेकिन मुझे एक जरी की साड़ी ला देना।' मैंने अपना सिर पकड़ लिया , वन में विचरण करते समय राम-सीता की कौन-सी छवि उसके मन में है! इसके बाद उसने कहा , 'मेरी एक बहन है, वह घुड़सवारी करना और तैरना जानती है। आप चाहें तो उसे हनुमान की पत्नी की भूमिका दे दें।'"
— दादा साहेब फालके
यह छोटा-सा प्रसंग ही यह बता देने के लिए पर्याप्त है कि भारत में सिनेमा को जन्म देने वाला व्यक्ति किन परिस्थितियों से गुज़रा , जहाँ अभिनेत्रियों को यह पता ही नहीं था कि 'हनुमान की पत्नी' नाम का कोई पात्र रामायण में अस्तित्व ही नहीं रखता। दादा साहेब फालके की संपूर्ण जीवन-यात्रा इसी प्रकार के असंख्य असंभव-से प्रतीत होने वाले अवरोधों को पार करने की कथा है।
संस्कृत के पुरोहित-पुत्र से चित्रकार तक
धुंडिराज गोविंद फालके का जन्म 30 अप्रैल 1870 को नासिक ज़िले के त्र्यंबकेश्वर गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। परिवार की परंपरा के अनुरूप उन्हें संस्कृत और पुरोहिताई की शिक्षा दी गई, किंतु शीघ्र ही धुंडिराज की रुचि चित्रकला, नाट्य-अभिनय और जादूगरी की ओर मुड़ गई , यह प्रारंभिक भटकाव ही आगे चलकर उनके भीतर के बहुमुखी कलाकार की पहली झलक थी। किशोर धुंडिराज की इन रुचियों को विकसित होने का सुनहरा अवसर तब मिला, जब उनके पिता बंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में अध्यापक नियुक्त होकर वहाँ आ गए। दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद धुंडिराज ने बंबई के सुप्रसिद्ध जे० जे० स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लिया, जहाँ ललित कलाओं का प्रशिक्षण लेते हुए ही छायांकन की कला ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित करना शुरू कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने बड़ौदा के कला भवन से विधिवत् छायांकन का प्रशिक्षण प्राप्त किया, और फ़िल्म-प्रोसेसिंग की तकनीक से भी भली-भाँति परिचित हो गए।
कला भवन के उन्मुक्त वातावरण में फालके ने ललित कलाएँ सीखने का कोई भी अवसर व्यर्थ नहीं जाने दिया। उनकी असाधारण रुचि को देखते हुए, छायांकन का औपचारिक प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद, कला भवन के प्रधानाचार्य ने छायांकन विभाग को संभालने का दायित्व स्वयं उन्हें सौंप दिया। इस अवसर का लाभ उठाकर फालके ने वहाँ की छायांकन प्रयोगशाला और पुस्तकालय में उपलब्ध आधुनिकतम सूचना-सामग्री का भरपूर अध्ययन किया। सन् 1890 में ही उन्होंने अपनी छात्रवृत्ति की राशि से एक कैमरा भी ख़रीद लिया था। छायांकन की कला सीख लेने के बाद उन्होंने मॉडलिंग और वास्तुकला (आर्किटेक्चर) का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया , मानो वे स्वयं को हर संभव दृश्य-कला में सिद्धहस्त बनाना चाहते थे। उनके छायाचित्रों से प्रसन्न होकर प्राचार्य ने उन्हें रतलाम भेजा, जहाँ उन्होंने रंगीन छपाई की तकनीक तथा फ़ोटो-लिथो प्रेस का कार्य भी सीखा।
एक असंतुष्ट सरकारी नौकरी, और एक साहसिक इस्तीफ़ा
सन् 1893-94 में फालके बंबई लौट आए, जहाँ उन्होंने स्वतंत्र छायांकन तथा रंगमंच के पर्दों पर भू-दृश्य (लैंडस्केप) चित्रित करना आरंभ किया , उस दौर में रंगमंच के पर्दे बनाने वाले कलाकारों को समाज में अत्यंत सम्मानित स्थान प्राप्त था। सन् 1903 में वे सरकार के पुरातत्व विभाग में छायाकार नियुक्त हुए, और इसी दौरान बंबई की एक प्रदर्शनी में उन्हें राजा रवि वर्मा के एक चित्र पर आधारित सर्वोत्तम हाफ़टोन ब्लॉक का पुरस्कार भी मिला। किंतु फालके पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों का गहरा प्रभाव था, और वे अपनी सरकारी नौकरी से सदैव असंतुष्ट रहते थे। अंततः उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, और राजा रवि वर्मा द्वारा स्थापित लोणावला की लिथोग्राफी प्रेस में काम करने लगे , उस समय भारत में रंगीन छपाई की कला व्यावसायिक लोकप्रियता की ऊँचाई पर पहुँच चुकी थी। शीघ्र ही फालके के कुछ रिश्तेदारों ने उन्हें स्वयं की एक प्रेस स्थापित करने का प्रस्ताव दिया।
सन् 1909 में फालके छापेखाने के प्रमुख तकनीशियन और एक भागीदार की हैसियत से जर्मनी गए, जहाँ उन्होंने नई मशीनों के संचालन की जानकारी प्राप्त की, और तीन-रंगीय छपाई के लिए एक आधुनिक मशीन भी ख़रीदकर लौटे। उनके कुशल निर्देशन में यह छापाखाना मात्र एक वर्ष में ही सुचारु रूप से चल निकला , किंतु इसी दौरान भागीदारों के साथ उनके गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। उनकी पत्नी सरस्वती बाई फालके ने अपने संस्मरणों में लिखा है:
"इसके बाद फालके का मन छापेखाने के काम में नहीं लगा। अनेक गुजराती परिवारों से उनके पास प्रस्ताव आए कि वे 'लक्ष्मी आर्ट' प्रेस छूट जाने से निराश न हों, और नई पूँजी से 'सरस्वती' प्रेस लगाएँ। लेकिन फालके का उत्तर था , 'लक्ष्मी आर्ट मेरे द्वारा किया गया स्वयं का निर्माण-कार्य था, मैं उस प्रेस को कोई क्षति नहीं पहुँचाना चाहता। मैं छपाई का काम अब और नहीं करना चाहता।'"
सरस्वती बाई आगे लिखती हैं कि उन दिनों अपने पुत्र भालचंद्र के साथ समुद्र-तट पर घूमना-फिरना फालके का नित्य-कर्म बन गया था , जेब में मात्र चार आने रखकर वे सुबह निकल जाते और शाम को देर से घर लौटते। नाटकों के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि एलफिंस्टन थियेटर में गुजराती या मराठी नाटक देखते हुए ही उनके पूरे-पूरे रविवार बीत जाते थे।
एक तंबू-सिनेमाघर में जागा एक बेचैन सपना
सन् 1910 में क्रिसमस के आस-पास बंबई के एक तंबू-सिनेमाघर में 'क्राइस्ट का जीवन' नामक फ़िल्म दिखाई जा रही थी। फालके ने यह फ़िल्म देखी, और यह फ़िल्म उन्हें ऐसा बाँध गई कि वे सारी रात बेचैन रहे। पत्नी द्वारा बेचैनी का कारण पूछने पर उन्होंने उसे भी सिनेमा देखने के लिए कह दिया। सरस्वती काकी के ही शब्दों में:
"दूसरे दिन हम दोनों सिनेमा गए। सैंडहर्स्ट रोड पर एक शामियाना लगा था, जिसका नाम 'दि अमेरिका इंडिया सिनेमैटोग्राफ़' रखा गया था। फ़िल्म शुरू होने पर पाथे कंपनी का प्रतीक-चिह्न, एक मुर्गा, दिखाया गया, और एक लघु फ़िल्म के बाद मुख्य चित्र आरंभ हुआ। फ़िल्म की समाप्ति पर मैंने पूछा , 'ये तस्वीरें चल कैसे रही थीं?' वे मुझे प्रक्षेपण-कक्ष के पास ले गए और बताया कि इस मशीन द्वारा ही यह सब कुछ संभव होता है।"
किंतु इसी बीच फालके अपने मनोसंसार में बहुत दूर तक यात्रा कर आए थे। 'क्राइस्ट का जीवन' को दोबारा देखते समय उनके मस्तिष्क में यह प्रश्न घूम रहा था कि यदि भगवान कृष्ण के जीवन पर फ़िल्म बनाई जाए, तो कृष्ण का बचपन, राधा और गोपियों के प्रसंग, कालिया-मर्दन या कंस-वध जैसे प्रसंग किस प्रकार फिल्माए जाएँगे। यह उल्लेखनीय है कि फालके का यह सपना कोई कपोल-कल्पना मात्र नहीं था , यह उनकी युवावस्था में पढ़ी गई पुस्तकों, नाटकों के अनुभव, तथा छायांकन के ठोस व्यावहारिक-तकनीकी प्रशिक्षण की ठोस नींव पर खड़ा था।
फालके ने 'नवयुग' पत्रिका में सन् 1917-18 में लिखे अपने लेखों में इस दौर को याद करते हुए लिखा:
"अगले दो माह तक मेरी यह हालत रही कि मैं तब तक चैन से नहीं बैठ सकता था, जब तक बंबई के सिनेमाघरों में लगी सभी फ़िल्में नहीं देख लेता था। मैं उन सभी फ़िल्मों का विश्लेषण करता, और यह सोचता कि क्या ऐसी फ़िल्में हमारे यहाँ भी बनाई जा सकती हैं। हमारे देश में भी यह उद्योग पूरी तरह फल-फूल सकता था , लेकिन समस्या यही थी कि इसे व्यावहारिक रूप कैसे दिया जाए।" (उस समय 'स्टूडियो' शब्द प्रचलन में नहीं आया था; सन् 1925 तक सभी स्टूडियोज़ को 'कारखाना' ही कहा जाता था।)
अनिद्रा, अंधता और एक मटर के पौधे का चमत्कार
अपने जीवन के कठिनतम दिनों में भी फालके इस नई तलाश में जुटे रहे। उन्होंने स्वयं लिखा है:
"धीरे-धीरे हमारे घर की चीज़ें बिकती जा रही थीं। मैंने सिनेमा-उपकरणों की मूल्य-सूचियाँ, सिनेमा-संबंधी पुस्तकें और अपने प्रयोगों की सामग्री एकत्रित की, और अपने प्रयोगों में जुटा रहा। अगले छह महीनों तक मैं केवल दिन में तीन घंटे ही सो पाता था। लगातार फ़िल्में देखने, अनिद्रा और प्रयोगों में जुटे रहने से मेरी आँखें थकने लगीं, और मुझे दिखना बंद हो गया , मेरी आँखों के कॉर्निया में अल्सर हो गया था। एक वर्ष तक डॉक्टर प्रभाकर के इलाज के बाद मुझे दृष्टि वापस मिली।"
यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने भारत को दृश्य-कला का एक नया माध्यम दिया, उसे उस माध्यम की खोज में स्वयं अपनी आँखों की रोशनी दाँव पर लगानी पड़ी। बीमारी के दौरान ही उन्होंने अपनी कला के प्रदर्शन का सही तरीक़ा खोज लिया था। स्वस्थ होने के बाद उन्होंने एक मटर का दाना खुले गमले में बो दिया, और धैर्यपूर्वक उसके अंकुरण तथा विकसित होने के चित्र लेते रहे। एक दिन जब पौधा पूरी तरह उग आया, तो दादा साहेब फालके की पहली फ़िल्म , 'मटर के पौधे का विकास' , भी बनकर तैयार हो गई। इस फ़िल्म को देखने के बाद उनके एक व्यापारी मित्र, नाडकर्णी, उन्हें लंदन जाकर उपकरण लाने के लिए बाज़ार-दर पर ब्याज लेकर धन उधार देने को तैयार हो गए।
लंदन की यात्रा: ठगे जाने के डर से एक अप्रत्याशित मित्रता तक
लंदन के सिनेमा-उपकरण विक्रेताओं के पते, मूल्य-सूचियाँ, तथा 'ए बी सी ऑफ़ सिनेमैटोग्राफ़ी' नामक पुस्तक के साथ, दादा साहेब फालके 1 फ़रवरी 1912 को लंदन के लिए रवाना हुए। लंदन पहुँचकर जब उन्होंने ख़रीदारी आरंभ की, तो उन्हें पता चला कि प्रत्येक कंपनी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रही है , ठगे जाने के भय से वे घबरा उठे। संयोगवश फालके डाक से 'बायस्कोप' पत्रिका मँगवाते थे, और उसके संपादक कैबोर्न ने उपकरणों की ख़रीदारी में उनकी सहायता की, तथा उन्हें 'ए बी सी ऑफ़ सिनेमैटोग्राफ़ी' के लेखक सेसिल हेपवर्थ से भी मिलवाया , जो स्वयं वाल्टन फ़िल्म कंपनी में फ़िल्में बनाने का काम करते थे। हेपवर्थ ने फालके को फ़िल्म-निर्माण का प्रशिक्षण दिया, और अपनी कंपनी के सभी विभाग देखने का अवसर भी दिया। फालके एक विलियमसन कैमरा, फ़िल्म धोने और मुद्रित करने के उपकरण, कच्ची फ़िल्म तथा एक परफ़ोरेटर लेकर भारत वापस लौटे, और 1 अप्रैल 1912 को बंबई पहुँचे।
इस उद्योग में फालके के सबसे पहले सहायक उनके अपने परिवार के सदस्य ही थे। फ़िल्म-परफ़ोरेटर का काम सरस्वती काकी ने संभाला , उस समय मिलने वाली फ़िल्म-पट्टी में एक ओर छेद स्वयं करने होते थे, और आधे इंच की इस पट्टी को घुप्प अंधेरे में रखकर छेद करना कोई सरल काम नहीं था; प्रकाश की एक भी किरण फ़िल्म को नष्ट कर सकती थी, और एक भी छेद गलत हो जाने से फ़िल्म कैमरे या प्रोजेक्टर में फँस सकती थी। दिन में रसोई का काम निपटाने के बाद, रात को वही रसोई डार्करूम में बदल जाती थी , यह दृश्य स्वयं इस बात का प्रतीक है कि भारतीय सिनेमा का जन्म किसी भव्य स्टूडियो में नहीं, बल्कि एक साधारण घर की रसोई में हुआ था।
स्त्री-भूमिकाओं की खोज: एक असंभव जैसी चुनौती
फालके अपने अनुभव से यह जान चुके थे कि कृष्ण के जीवन पर सबसे पहली फ़िल्म बनाना व्यावहारिक नहीं होगा; बेहतर होगा कि पहले एक छोटे बजट की फ़िल्म बनाई जाए। बंबई में उन दिनों 'राजा हरिश्चंद्र' विषय पर आधारित एक नाटक हिट हो रहा था, और यही निश्चय हुआ कि इसी कथा पर पहली फ़िल्म बनाई जाए।
सन् 1912 में फ़िल्म-निर्माण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। उस समय के नाटकों में स्त्री-पात्रों की भूमिकाएँ भी पुरुष ही निभाया करते थे , महाराष्ट्र में बाल गंधर्व जैसे उच्चकोटि के अभिनेताओं की एक समृद्ध परंपरा विकसित हो चुकी थी, जो स्त्री-पात्रों को अत्यंत सफलतापूर्वक जीवंत करते थे, और नाट्य-कला के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। किंतु फालके अपनी फ़िल्म में स्त्री-पात्रों की भूमिकाएँ स्वयं स्त्रियों से ही निभवाना चाहते थे , उस दौर में यह लगभग असंभव इच्छा थी, क्योंकि किसी भी सम्मानित परिवार की महिला से फ़िल्म में अभिनय करने के लिए पूछना ही अत्यंत कठिन कार्य था। इस विवशता में फालके वेश्याओं के बाज़ारों के चक्कर काटने लगे। उन्होंने स्वयं लिखा है, "मैंने वेश्या बाज़ार से आने वाला कोई आमंत्रण कभी अस्वीकार नहीं किया।" किंतु फिर भी एक भी वेश्या फ़िल्म में अभिनय करने के लिए सहमत नहीं हुई।
निराश फालके जब एक रेस्तराँ में बैठे थे, तब उन्हें एक युवक दिखाई दिया, जो एक बावर्ची का सहायक था। उसके कोमल अंगों और नाज़ुक-पतली उँगलियों को देखकर फालके ने उसे ही अभिनेत्री बनाने का निर्णय लिया। आगे चलकर 'लंका दहन' में इसी युवक , सालुंके , ने एक साथ दोनों भूमिकाएँ निभाईं: अशोक-वाटिका में चिंतित बैठी सीता की, और वन-वन भटकते, रावण से युद्ध के लिए सेना एकत्र करते राम की। उस समय सालुंके देश के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री, दोनों ही एक साथ थे।
'राजा हरिश्चंद्र' के लिए नायक की भूमिका रंगमंच के अभिनेता दबके को, और तारामति की भूमिका सालुंके को सौंपी गई। किंतु कठिनाइयाँ अभी समाप्त नहीं हुई थीं। कथा में रोहिताश्व की मृत्यु सर्पदंश से होती है, और कोई भी माँ अपने सात-आठ वर्ष के पुत्र को इस भूमिका के लिए देने को तैयार नहीं थी। दादा साहेब ने धन का प्रलोभन दिया, यश का मोह दिखाया, यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल एक फ़िल्म है , किंतु अंततः उन्होंने स्वयं अपने ही पुत्र, रोहिताश्व, को इस भूमिका में उतार दिया। सरस्वती काकी को इस प्रकार के अंधविश्वास कभी छू भी नहीं गए थे।
सन् 1912 में मानसून के बाद बंबई के दादर क्षेत्र में 'राजा हरिश्चंद्र' का फिल्मांकन आरंभ हुआ। दिन में शूटिंग चलती और सभी कर्मचारियों के लिए भोजन बनता; रात में फ़िल्म को प्रोसेस करने और संपादित करने का काम होता। इस प्रकार, रात-दिन एक करते हुए, पति-पत्नी ने मिलकर छह महीनों में यह फ़िल्म तैयार कर दी।
पहला प्रदर्शन, और तेईस दिनों का अभूतपूर्व रिकॉर्ड
फालके भली-भाँति जानते थे कि निर्माण के बाद अभी आधी लड़ाई ही जीती गई है। इसीलिए 21 अप्रैल 1913 को बंबई के ओलिंपिया सिनेमा में 'राजा हरिश्चंद्र' का पहला शो विशेष रूप से गणमान्य नागरिकों और प्रेस के प्रतिनिधियों को दिखाया गया , यह वह परिपाटी है, जिसका पालन भारतीय सिनेमा आज तक करता आ रहा है। 3 मई 1913 को कोरोनेशन थियेटर में फ़िल्म का नियमित प्रदर्शन आरंभ हुआ, और यह लगातार तेईस दिनों तक चली , उस युग के लिए यह एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड था, जब कोई भी फ़िल्म सामान्यतः चार से छह दिनों से अधिक नहीं चल पाती थी।
नासिक की ओर, और परिवार में फैलती सिनेमाई प्रतिभा
अब तक फालके के मित्र भी उनकी प्रतिभा के प्रति पूर्णतः आश्वस्त हो चुके थे। बंबई में बरसात के महीने गुज़ारने के बाद, 3 अक्टूबर 1913 को दादा साहेब अपना स्टूडियो बंबई से नासिक ले गए, जहाँ उन्होंने 'मोहिनी भस्मासुर' नामक फ़िल्म बनाई, तथा साथ ही एक लघु हास्य-फ़िल्म 'पीठाचे पंजे' भी बनाई। दोनों फ़िल्में जनवरी 1914 में एक साथ प्रदर्शित हुईं। फालके की तीसरी फ़िल्म 'सावित्री-सत्यवान' थी , इस प्रकार उन्होंने हाथ से चलने वाली साधारण मशीनों के सहारे केवल आठ महीनों में तीन फ़िल्में तैयार कर दी थीं। फालके ने 'नवयुग' में लिखा:
"मैंने अपनी सारी आय स्टूडियो को सुधारने में लगाई। मेरा संपन्न मित्र भी आश्वस्त होकर आर्थिक सहायता देने लगा। अब तक हमारी फ़िल्मों का केवल एक-एक प्रिंट ही बना था, जबकि मेरी प्रत्येक फ़िल्म की बीस-बीस प्रतियों की माँग आ रही थी। मैंने सोचा कि अब पच्चीस-तीस हज़ार रुपए लगाकर विद्युत से चलने वाली मशीनें ख़रीद लेनी चाहिए। अतः मैं फिर विदेश गया, ताकि नए उपकरण देखकर ख़रीद लूँ। मेरे साथ 'मोहिनी-भस्मासुर' और 'सावित्री-सत्यवान' जैसी फ़िल्में भी थीं, और मैं इनके ज़रिए विदेश में अपनी भावी सफलता को परखना चाहता था। यह मेरी तीसरी विदेश-यात्रा थी।"
जून 1914 में फालके लंदन के लिए रवाना हुए, जहाँ उनकी फ़िल्मों की भरपूर सराहना हुई , ब्रिटिश समाचार-पत्रों में यह छपा कि तकनीकी दृष्टि से ये फ़िल्में उच्चकोटि की हैं, और फालके को इंग्लैंड में ही रहकर फ़िल्में बनाने का आमंत्रण भी मिला।
राजा रवि वर्मा: वह चित्रकार जिसने भारतीय सिनेमा की आँख को आकार दिया
यहीं उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के अत्यंत लोकप्रिय चित्रकार राजा रवि वर्मा का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि उनके बिना भारतीय सिनेमा के दृश्य-सौंदर्यशास्त्र को समझना असंभव है। रवि वर्मा (29 अप्रैल 1848 – 2 अक्टूबर 1906) का जन्म त्रावणकोर के किलिमन्नूर ज़िले में हुआ था, और सन् 1866 में त्रावणकोर के राजा की बड़ी बहन से उनका विवाह हुआ। सन् 1868 में त्रिवेंद्रम के राज-दरबार में तैल-चित्रकला में प्रवीण रामस्वामी नायकर तथा विदेशी चित्रकार थियोडोर जॉनसन, दोनों ने ही रवि वर्मा को चित्रकला सिखाने से इनकार कर दिया था , किंतु जॉनसन ने उन्हें चित्रांकन के समय पास बैठकर देखने की अनुमति अवश्य दी, और रवि वर्मा उनके चित्रों की प्रतिकृतियाँ बनाने लगे। इस प्रकार, स्वाध्याय ही उनकी प्रथम और सबसे प्रभावी पाठशाला बनी।
सन् 1873 में मद्रास की एक प्रदर्शनी में उनके चित्र को सर्वोत्तम मानकर स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। सन् 1876 में उन्होंने 'शकुंतला द्वारा पत्र-लेखन' नामक चित्र बनाया, जिसे ड्यूक ऑफ़ बकिंघम ने प्रदर्शनी में देखकर ख़रीद लिया, और सन् 1878 में रवि वर्मा ने ड्यूक का पोर्ट्रेट भी बनाया। सन् 1893 में शिकागो की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में उनकी दस पेंटिंग्स , भारत के विभिन्न भागों की स्त्रियों पर आधारित , प्रदर्शित हुईं और उन्हें दो पदक प्राप्त हुए। यह उल्लेखनीय है कि उस समय तक रवि वर्मा अपने चित्रों की रचना में कैमरे का सहारा लेने लगे थे , सन् 1880 में उन्होंने अपने आँगन में गेंद से खेलते एक बालक का फ़ोटोग्राफ़ लेकर, उसी आधार पर बालक राम का चित्र बनाया था।
सन् 1881 में बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़ के निमंत्रण पर वे चार माह तक बड़ौदा में रहे, जहाँ उन्होंने नल-दमयंती, द्रौपदी-वस्त्र-हरण, भरत, कंस-माया, शांतनु-गंगा, अर्जुन-सुभद्रा, हरिश्चंद्र-तारामति, कृष्ण-जन्म आदि अनेक चित्र बनाए। इस प्रकार राजा रवि वर्मा ने भारत में लोकप्रिय कला की एक नई परंपरा को जन्म दिया। उनके ही एक समकालीन कला-समालोचक आनंद कुमारस्वामी (1870-1947) ने उनकी आलोचना करते हुए लिखा था:
"अतिनाटकीय धारणाएँ, कल्पना-शून्यता, और भारतीय महाकाव्यों तथा पवित्र ग्रंथों की विषय-वस्तु के निरूपण में भारतीय मन का अभाव , यही रवि वर्मा की कमियाँ हैं। उनके चित्र इस तरह के हैं कि कोई भी यूरोपीय छात्र इन्हें साहित्य के परिशीलन और भारतीय जीवन के सतही अध्ययन के बाद बना सकता है।"
इसके विपरीत, सर टी० माधव राव ने सन् 1884 में उनसे अनुरोध किया था:
"मेरे अनेक ऐसे मित्र हैं जो आपकी पेंटिंग प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन एक जोड़ी हाथों के स्वामी होने के कारण आप इतनी बड़ी माँग शायद ही पूरी कर सकें। इसलिए अपनी कुछ चुनिंदा कृतियों को यूरोप भेजकर रंगीन ओलियोग्राफ़ निकलवा लीजिए। इससे आपकी प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी, और वास्तविक अर्थों में देश-सेवा भी हो सकेगी।"
सन् 1894 में रवि वर्मा ने सत्तर हज़ार रुपए लगाकर लोणावला में एक लिथोग्राफ़िक प्रेस स्थापित की, और सन् 1895 से ही छत्तीस गुणा चौंतीस इंच आकार के बहुरंगी चित्र, जिनका मूल्य चार से छह रुपए तक था, बाज़ार में आने लगे , इनकी माँग अत्यधिक थी। औंध के राजा बालासाहेब पंत प्रतिनिधि ने रवि वर्मा की रचना-प्रक्रिया का वर्णन करते हुए लिखा है:
"रवि वर्मा सुबह छह बजे से साढ़े दस बजे तक, फिर दो बजे से छह बजे तक, और कभी-कभी रात को भी काम करते रहते थे। उनकी चित्रकला का मुख्य रहस्य यही निरंतर अभ्यास था , वरना उनकी चित्रकला में विशेष कुछ भी नहीं था। एक्सप्रेशन के संबंध में और चेहरे पर रंग लगाते समय वे विशेष सावधान रहते थे; इस कारण उनकी कई पेंटिंग्स में चेहरे अत्यंत सुंदर हैं। उन्होंने मुझे कई बार बताया था कि 'हम केवल एक्सप्रेशन बनाते हैं, बाक़ी काम हमारा भाई करता है'" , अर्थात् उनके चित्रों की पृष्ठभूमि उनके भाई राजा वर्मा द्वारा तैयार की जाती थी।
इसी दुविधा को कृष्ण चैतन्य के इस विश्लेषण में देखा जा सकता है:
"रवि वर्मा ने भी नल द्वारा दमयंती को त्याग देने के क्षणों को चित्रित किया है, और घटनात्मकता तथा कथात्मकता में अधिक रुचि दिखाई है। लेकिन पृष्ठभूमि के वनों में आशंका का चिह्न लेशमात्र भी नहीं है , संभवतः कलाकार की प्रतिभा इतनी सक्षम नहीं थी कि वह दमयंती के एकाकीपन और आतंक के क्षणों का सच्चा चित्रण कर सके।"
रवि वर्मा की पेंटिंग्स में कथात्मक तत्वों के उदाहरण भी अनेक हैं , 'सैरंध्री-सुदेषणा' में सुदेषणा अपने भाई कीचक के आदेश का पालन करते हुए सैरंध्री को मदिरा और फल देकर कीचक के पास भेज रही है, जबकि सैरंध्री अपने शील की रक्षा हेतु विनती कर रही है, और सुदेषणा के मुख पर तिरस्कार का भाव है। इसी प्रकार हरिश्चंद्र-कथा पर आधारित एक चित्र में, जब हरिश्चंद्र अपने पुत्र को ब्राह्मण को बेचने को विवश होते हैं, तो बच्चा अपनी माँ के पास जाने को छटपटाता है, और माँ अपना चेहरा हाथों से ढक लेती है , जबकि पृष्ठभूमि में एक अन्य स्त्री अपने शिशु को प्यार से सहला रही है।
सन् 1880-1900 के दशकों में भारतीय मध्यम वर्ग का त्रि-आयामी संरचना के भ्रम-युक्त, प्रकाश-छाया के संयोजन से युक्त कला के साथ पहला साक्षात्कार रवि वर्मा की इन्हीं पेंटिंग्स के माध्यम से हुआ। जिस समय धुंडिराज गोविंद फालके बड़ौदा के कला भवन में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, उस समय तक बड़ौदा के राजभवन में रवि वर्मा के तैलचित्र सुशोभित हो चुके थे, और इन चित्रों की तब बड़ी धूम थी। स्वयं फालके ने रवि वर्मा के कुछ चित्रों के उन्नत हाफ़टोन ब्लॉक बनाए थे, जिनकी भरपूर सराहना भी हुई थी।
आगे चलकर, नासिक में 'राजा हरिश्चंद्र' बनाते समय फालके ने, कोल्हापुर में 'सैरंध्री' बनाते समय बाबूराव पेंटर ने, और मद्रास में 'कीचक वध' बनाते समय नटराज मुदलियार ने , सिनेमा की शैशवावस्था में ही रवि वर्मा के इस स्थूल यथार्थवाद को जिस निर्द्वंद्व भाव से स्वीकार किया, उस एक निर्णायक क़दम ने पहाड़ी, राजस्थानी, कांगड़ा या बंगाल शैली में चित्रित सौंदर्य-मूल्यों का सिनेमा के क्षेत्र में प्रवेश ही असंभव कर दिया। इन फिल्मकारों ने रवि वर्मा द्वारा सरलीकृत बिंबों की भाषा में प्रस्तुत हाव-भावों, पोशाकों और अलंकारों को अपनाकर उन्हें हमेशा के लिए रूढ़ बना दिया। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक से ही भारतीय सिनेमा रवि वर्मा की चित्रकला और हॉलीवुड की फ़िल्मों के दोहरे प्रभाव में आ गया था , और बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक भी वह इस प्रभाव से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया है। भारतीय सिनेमा-इतिहास में वे क्षण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, जब किसी फिल्मकार ने इन दो प्रभावों की जकड़ से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने, या सिनेमा के माध्यम से भारतीय मूल्यों से प्रत्यक्षतः जुड़ने का साहसिक प्रयास किया।
युद्ध, आर्थिक संकट, और स्वदेशी की एक ललकार
प्रथम महायुद्ध जिस समय यूरोप में चल रहा था, उसकी विनाशकारी छाया भारत पर भी गहरे रूप से पड़ रही थी। फालके के ही शब्दों में:
"प्रथम महायुद्ध इंग्लैंड की अपेक्षा भारत के लिए, जो कमीशन-एजेंटों का देश था, कहीं अधिक दुखदायी था। इंग्लैंड में सूचना दी जा रही थी कि सभी काम नियमित रूप से हो रहे हैं, वहीं भारत में लोग आतंकित होकर अपने घरों और संपत्ति को छोड़कर भाग रहे थे। युद्ध-क्षेत्रों के समाचार सुनकर बंबई की आधी जनसंख्या शहर से बाहर चली गई थी। भारत में अब अपेक्षाकृत कम उपकरणों और सामग्री का आयात हो पा रहा था। मेरे साहूकार ने भी फ़िल्म-व्यवसाय में अधिक पूँजी लगाने से इनकार कर दिया, जब वह कारखाने के नियमित कर्मचारियों को आधी तनख़्वाह ही दे पा रहा था।"
तीन वर्षों तक फालके पूँजी जुटाने का प्रयास करते रहे। उन्होंने लोगों के भीतर स्वदेशी की भावना को ललकारते हुए यह प्रस्ताव रखा कि लोग पाँच-पाँच रुपए इकट्ठा करके पूँजी एकत्र करें, और कंपनी को अपने अधिकार में लें। इस प्रयास पर उन्होंने स्वयं लिखा:
"अंततः बिल्कुल निर्लिप्त भाव से दो-तीन लोग मुझ पर दया करने को राज़ी हुए... मैं दो लंबे कार्यक्रम बनाने के अपने निर्णय को छोटी-सी पूँजी और थोड़े-से कलाकारों के सहयोग से कायम रख सका , उनमें से एक 'राजा हरिश्चंद्र' का नया संस्करण था, और दूसरा 'लंका दहन'। 'लंका दहन' बनाकर मैंने अपनी सभी शंकाओं का दहन कर दिया।"
इस दौर में फालके को सहायता देने वालों में मायाशंकर मूलशंकर भट्ट अग्रणी थे। सन् 1870 में राजकोट में जन्मे भट्ट ने भारतीय फ़िल्म-उद्योग के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया , सन् 1904 में वे कपड़े के व्यापार में आए, सन् 1917 में वामन राव आप्टे तथा फालके के साथ मिलकर 'हिंदुस्तान फ़िल्म कंपनी' की स्थापना की, 1917 से 1921 तक इसकी फ़िल्मों के वितरण में सक्रिय सहयोग दिया, सन् 1924 में आगफ़ा और गेवर्ट की कच्ची फ़िल्म मँगवाने की एजेंसी ली, और सन् 1925 में शारदा फ़िल्म कंपनी में हिस्सेदार बनकर 1930 में उसके स्वामी भी बन गए।
'लंका दहन' की अभूतपूर्व सफलता, और एक कलाकार की गहरी आशंका
'लंका दहन' के निर्णय के समय ही फालके अपने हिस्सेदारों के उद्देश्यों के प्रति आशंकित हो गए थे, क्योंकि वे केवल पैसा कमाने के लिए फ़िल्में नहीं बनाना चाहते थे। उन्होंने 'नवयुग' में लिखा:
"तो क्या 'लंका दहन' मेरा अंतिम काम होगा? या क्या इससे भी बेहतर उपलब्धि फालके को मिलेगी, और वह विश्वविख्यात होगा? लेकिन भारतवर्ष में मौजूदा गंदगी और भ्रष्टाचार को देखते हुए, पहली संभावना ही अधिक प्रबल लगती है।"
फालके के सहयोगी और उनकी कला के प्रशंसक श्री हड़प के अनुसार, "लंका दहन सन् 1917 में बनकर तैयार हुई , हनुमान की समुद्र पर उड़ान इस फ़िल्म का मुख्य आकर्षण थी, जिसमें हनुमान उड़ते हुए पहले बहुत ऊँचाई तक जाते हैं और फिर धीरे-धीरे छोटा-छोटा होते जाते हैं; यह एक देखने योग्य दृश्य था।" इस फ़िल्म की व्यावसायिक सफलता अभूतपूर्व रही , फालके स्वयं लिखते हैं, "'लंका दहन' से केवल दस दिनों में बंबई के वेस्ट एंड सिनेमा में बत्तीस हज़ार रुपए की आय हुई। मद्रास में इस फ़िल्म की टिकटों से जमा हुए सिक्कों को बैलगाड़ी में लादकर लाना पड़ा।"
'लंका दहन' के पश्चात् हिंदुस्तान कंपनी की 'कृष्ण जन्म' आई, जिसमें कंस को जल-थल, हर स्थान पर कृष्ण ही दिखाई देते हैं। 'कृष्ण जन्म' और 'कालिया मर्दन' , दोनों ही फ़िल्मों में कृष्ण की भूमिका फालके की अपनी बेटी मंदाकिनी ने निभाई, जो उस समय मात्र सात वर्ष की थीं। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि 'कालिया मर्दन' में नाग के फन से नदी में कूदते समय मंदाकिनी साहस नहीं जुटा पाती थीं, किंतु फालके निर्भीकतापूर्वक उनका उत्साह बढ़ाते रहते थे। फ़िल्म बनाने से पहले वे निर्माण में जुटे सभी लोगों को बुलाकर पूरी कहानी और प्रत्येक पात्र के विषय में विस्तार से तथा रोचक ढंग से समझाते थे, जिससे शूटिंग के समय किसी प्रकार का व्यवधान न आए।
एक प्रयोगशील मन: लघु फ़िल्मों की समांतर दुनिया
फालके की गहरी रुचि सिनेमा के रचनात्मक पक्ष में थी, और वे इन कथा-फ़िल्मों के साथ-साथ लघु फ़िल्में भी बनाते रहते थे , 'लंका दहन' के साथ प्रदर्शित 'पीठाचे पंजे' इसका एक उदाहरण थी। 'लक्ष्मी का गलीचा' में उन्होंने ट्रिक-फ़ोटोग्राफ़ी के माध्यम से सिक्के बनने की मनोरंजक विधि दिखाई, 'माचिस की तीलियों का खेल' में तीलियों से बनने वाली विभिन्न आकृतियाँ दर्शायी गईं, और 'प्रोफ़ेसर केलफ़ा के जादुई चमत्कार' में फालके ने स्वयं जादूगर की भूमिका निभाई। इन फ़िल्मों की प्रयोगात्मकता स्वयं फालके के मस्तिष्क की उर्वरता का प्रमाण है। सन् 1918 में ही उन्होंने 'फ़िल्में कैसे बनाएँ' नामक एक शिक्षाप्रद फ़िल्म बना डाली, जिसका कोई व्यावसायिक महत्व नहीं था , और उस दौर में, जब फ़िल्म-निर्माण की तकनीकों को कोई कैमरामैन अपने शिष्यों को भी नहीं बताता था, ऐसी फ़िल्म बनाना उनके निर्माताओं को स्वाभाविक रूप से अप्रिय ही लगा होगा। इन अव्यावहारिक और घाटे में चलने वाली फ़िल्मों के परिणामस्वरूप 'हिंदुस्तान फ़िल्म कंपनी' के साझीदारों से फालके की अनबन हो गई, और सन् 1919 में वे नासिक छोड़कर बनारस चले गए।
बनारस में एक नाटक, और एक भारी घाटा
सन् 1919 से 1921 के दो-ढाई वर्षों के बनारस-प्रवास में फालके ने एक लंबा नाटक 'रंगभूमि' लिखा, जिसमें उनका शोधार्थी और अध्यापकीय पक्ष ही प्रमुखता से उभरकर सामने आता है , इसमें उन्होंने तत्कालीन मराठी रंगमंच की आलोचना करते हुए सुधार के सुझाव दिए, और युगीन मानसिकता पर तीखे व्यंग्य भी किए। किंतु समस्या यह थी कि इन सभी विश्लेषणों को मंच पर संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जिससे नाटक अत्यंत दीर्घ हो गया और उसे दो भागों में मंचित करने का निर्णय लेना पड़ा। इस लंबाई की आलोचना का उत्तर देते हुए तत्कालीन आलोचक कृष्ण कुमार ने 'नवयुग' के फ़रवरी-मार्च 1922 के अंक में लिखा था:
"फालके अपने नाटक 'रंगभूमि' में समाज-सुधार पर बल देते हैं, जबकि हमारे नाटकों में तो केवल इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दर्शक नाटक देखते समय अपने-आपको भूल सकें। यदि इस नाटक में कही बातों को केवल लेखों के माध्यम से कहा जाता, तो ये विचार बहुत सीमित लोगों तक ही पहुँच पाते , रंगमंच के माध्यम से ये कहीं अधिक लोगों तक पहुँच सके हैं।"
किंतु फालके स्वयं इस नाटक के परिणामों से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा, "यह सही है कि लोगों ने इस नाटक को दो बजे तक एकाग्रचित्त होकर देखा, और हॉल भी तालियों से गूँजता रहा। लेकिन यह भी सही है कि इस नाटक को मंचित करने पर हज़ारों रुपए का घाटा उठाना पड़ा।" नाटक लिखने, मंचित करने और अंततः बीस हज़ार रुपए का घाटा उठाने के बाद, फालके कुछ शर्तों और समझौतों के साथ पुनः 'हिंदुस्तान फ़िल्म कंपनी' में वापस लौट आए।
अंतिम पारी: एक कलाकार से एक प्रबंधक तक
अब फालके का कार्य एक कुशल प्रबंधक जैसा हो गया था, ताकि कारखाने में नियमित रूप से फ़िल्में बनती रहें और प्रदर्शनार्थ भेजी जाती रहें। इस दौर में फालके के साथ-साथ उनके सहायकों ने भी कई फ़िल्में निर्देशित कीं। 'फालके एंड कंपनी' तथा 'हिंदुस्तान फ़िल्म कंपनी' ने, फालके के निर्माण और निर्देशकीय सहयोग से, कुल सौ कथा-फ़िल्में और तीस लघु फ़िल्में बनाईं। इतनी अधिक तथा विविधतापूर्ण फ़िल्में उनके समकालीन फ्रांसीसी लुई लुमिएर और जॉर्ज मेल्यिए, या अमरीकी थॉमस अल्वा एडिसन तक ने नहीं बनाई थीं। किंतु डेविड वार्क ग्रिफ़िथ ने सन् 1908 से 1913 के बीच अकेले चार सौ फ़िल्में बना ली थीं , यह विशाल अंतर स्वयं इस बात का संकेत है कि यदि फालके को भी वैसा ही उन्मुक्त वातावरण मिला होता (ग्रिफ़िथ को भी अपने निर्माताओं की संकीर्ण मानसिकता से जूझना पड़ा था, किंतु धन उनके लिए कभी बाधा नहीं रहा), तो वे भी कहीं अधिक संख्या में फ़िल्में बना सकते थे।
एक दृष्टिवान का सिनेमाई घोषणापत्र
दादा साहेब फालके अपने समय से बहुत आगे थे, और वे भारतीय रंगमंच व सिनेमा को एक सार्थक कला के स्तर तक पहुँचाना चाहते थे। सन् 1934 में उन्होंने लिखा था:
"फ़िल्मों में गाने बिल्कुल नहीं होने चाहिए। यदि गानों का इस्तेमाल करना ही हो, तो वे भक्ति-गीत के रूप में ही आ सकते हैं। जब फ़िल्मों के पात्र स्वयं गाने गाएँ, तो इन गानों की संख्या सात-आठ से अधिक नहीं होनी चाहिए (उस समय फ़िल्मों में तीस से पचास तक गाने होना सामान्य बात थी)। गाने सदैव फ़िल्म की कथा से संबंधित हों, और दो-तीन पंक्तियों से अधिक लंबे न हों। इन्हें शास्त्रीय संगीत की शैली में नहीं, बल्कि उस तरह गाया जाना चाहिए जैसे हम दैनिक जीवन में कविता की पंक्तियों के उद्धरण देते हैं।"
सन् 1927-28 में रंगाचारियर फ़िल्म इन्क्वायरी कमेटी के समक्ष उन्होंने जो उत्तर दिए, उनमें से कुछ अंश उद्धृत करना यहाँ आवश्यक है:
प्रश्न: आपने भारतवर्ष में फ़िल्म-उद्योग कब आरंभ किया?
उत्तर: हाँ, मैंने सन् 1913 में भारतवर्ष में फ़िल्म-उद्योग आरंभ किया।
प्रश्न: आपने अपनी फ़िल्मों में क्या कमियाँ पाई हैं?
उत्तर: भारतवर्ष में लगभग सभी फ़िल्मों का तकनीकी एवं कलात्मक पक्ष कमज़ोर है। अभिनय भी अच्छा नहीं होता। फ़ोटोग्राफ़ी एकदम बेकार होती है। कला के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है।
प्रश्न: स्थिति में सुधार के लिए आपके क्या सुझाव हैं?
उत्तर: मेरे विचार से भारतवर्ष में किसी एक स्थान पर सिनेमा-व्यवसाय, फ़ोटोग्राफ़ी, अभिनय और पटकथा-लेखन सिखाने के लिए एक स्कूल खोला जाए।
प्रश्न: क्या पूरे भारत के लिए एक स्कूल पर्याप्त होगा?
उत्तर: कह नहीं सकता, लेकिन इस देश में फ़िल्म-निर्माण पर कुछ पाबंदियाँ लगाना आवश्यक है।
ध्वनि का युग, गुमनामी, और एक अधूरा अंत
मायाशंकर भट्ट के प्रोत्साहन पर सन् 1931 में दादा साहेब फालके ने 'सेतु बंधन' नामक फ़िल्म बनाई, किंतु सन् 1930 में ध्वनि (साउंड) के आगमन के बाद मूक फ़िल्म बनाना व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त निर्णय नहीं था। बाद में उन्होंने 'गंगावतरण' नामक एक बोलती फ़िल्म भी बनाई।
16 फ़रवरी 1944 को जब दादा साहेब फालके का नासिक में देहांत हुआ, तब तक लोग भारतीय सिनेमा के इस पितामह को लगभग भूल ही चुके थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष गुमनामी और अकेलेपन में व्यतीत किए। वर्षों बाद जब कुछ शोधकर्ता नासिक पहुँचे, तो उन्हें फालके के घर से फ़िल्मों के जंग खाए डिब्बे मिले , जिनमें रखी बहुत-सी फ़िल्में तब तक मिट्टी में बदल चुकी थीं। फालके की फ़िल्मों के इन बचे हुए टुकड़ों को सहेजने और जोड़ने का काम आगे चलकर आरंभ हुआ , एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति को बचाने का प्रयास, जिसने भारत को उसकी अपनी पहली कहानी दिखाई थी, किंतु जिसे भारत ने ही, उसके जीवनकाल में, विस्मृत कर दिया था।
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