जब कैमरे को सिरहाने रखकर सोने वाला एक किशोर न्यू थियेटर्स की आँख बना, और फिर उसने भारतीय सिनेमा के स्वर को देह के बंधन से मुक्त कर दिया
सन् 1924 तक कलकत्ता के फ़िल्मी हलक़ों में एक युवा छायाकार की सफलता के क़िस्से चारों ओर फैलने लगे थे। यह युवक थे नितिन बोस — वह व्यक्ति, जो आगे चलकर न्यू थियेटर्स जैसे प्रतिष्ठित स्टूडियो की दृश्य-दृष्टि को आकार देने वाले थे, भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की परंपरा का सूत्रपात करने वाले थे, और लगभग पाँच दशकों तक बांग्ला तथा हिंदी, दोनों सिनेमाओं में सक्रिय रहकर कुंदनलाल सहगल से लेकर दिलीप कुमार तक, अनेक प्रतिभाओं के रचनात्मक सहयात्री बनने वाले थे। मूक युग के एक न्यूज़रील-छायाकार से लेकर 'गंगा जमना' (1961) जैसी कालजयी फ़िल्म के निर्देशक तक की उनकी यात्रा, वस्तुतः, भारतीय सिनेमा के शैशव से उसके यौवन तक की यात्रा है।
26 अप्रैल 1897 को कलकत्ता में जन्मे नितिन बोस एक ऐसे परिवार से आते थे, जिसके आँगन में बंगाल का नवजागरण, स्वदेशी उद्यमशीलता और आधुनिक तकनीक — तीनों एक साथ फल-फूल रहे थे। उनके पिता हेमेन्द्रमोहन बोस (एच. बोस) स्वदेशी आंदोलन के अग्रणी उद्यमी थे: 'कुंतलीन' केश-तेल और 'देलखोश' इत्र के निर्माता, 'कुंतलीन प्रेस' के स्वामी, और ग्रामोफ़ोन-रिकॉर्ड बनाने तथा बेचने वाले पहले भारतीय। उनके 'एच. बोस'ज़ रिकॉर्ड्स' ने रवीन्द्रनाथ टैगोर, जगदीशचंद्र बसु और प्रफुल्लचंद्र राय जैसी विभूतियों की आवाज़ों को सदा के लिए सुरक्षित कर दिया। फ़ोटोग्राफ़ी, विशेषकर भारत में रंगीन छायांकन के आरंभिक प्रयोगों, से भी हेमेन्द्रमोहन का गहरा जुड़ाव था — और यही रुचि आगे चलकर बेटे की नियति बनी।
नितिन बोस की माता मृणालिनी, प्रसिद्ध बाल-साहित्यकार और चित्रकार उपेन्द्रकिशोर रायचौधुरी की बहन थीं; इस नाते सुकुमार राय उनके ममेरे भाई थे और सत्यजित राय रिश्ते में उनके भतीजे लगते थे। तेरह भाई-बहनों के इस परिवार में कला की कई धाराएँ एक साथ बहती थीं: छोटे भाई मुकुल बोस आगे चलकर न्यू थियेटर्स के अग्रणी ध्वनि-अभियंता (साउंड रिकॉर्डिस्ट) बने, बहन मालती घोषाल रवीन्द्र-संगीत की प्रतिष्ठित गायिका हुईं, और भाई कार्तिक बोस बंगाल के क्रिकेट-जगत का जाना-पहचाना नाम बने। ऐसे वातावरण में पले नितिन ग्यारह वर्ष की अवस्था से ही पिता द्वारा खींचे गए छायाचित्रों को स्वयं डार्करूम में विकसित (प्रोसेस) करने लगे थे।
सिनेमा से इस परिवार का संबंध नितिन के कैमरा थामने से बहुत पहले ही जुड़ चुका था। हेमेन्द्रमोहन का 'टॉकिंग मशीन हॉल' फ़्रांसीसी कंपनी पाथे के 'पाथेफ़ोन' ध्वनि-यंत्रों का वितरक था, और प्रचलित वृत्तांतों के अनुसार सन् 1906 में वे पाथे फ़्रेर (Pathé Frères) की फ़िल्में मँगाकर फ़िल्म-प्रदर्शन के व्यवसाय में भी उतरना चाहते थे। किंतु कलकत्ता में बायस्कोप-प्रदर्शन के अग्रदूत जमशेदजी फ़्रामजी मदन — जिन्होंने 1902 में पाथे कंपनी के एजेंट से उपकरण ख़रीदकर अपने तंबू-प्रदर्शन शुरू किए थे और आगे चलकर पाथे की फ़िल्मों के प्रदर्शन-अधिकार भी हासिल किए — तथा उनके सहयोगी रुस्तमजी धोतीवाला के अनुरोध पर हेमेन्द्रमोहन ने यह योजना स्थगित कर दी। (यही धोतीवाला आगे चलकर, 1917 में, मदन के लिए बंगाल की पहली मूक कथा-फ़िल्म 'सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र' का निर्देशन करने वाले थे।) इतिहास में 'यदि' का कोई स्थान नहीं होता, फिर भी यह प्रसंग इतना तो बता ही देता है कि जिस घर में नितिन बोस बड़े हो रहे थे, वहाँ चलती-फिरती छवियों का स्वप्न पहले से ही दस्तक दे रहा था।
"मैं ही कैमरा हूँ": एक किशोर और उसका यंत्र
सन् 1914 में, अपने सत्रहवें जन्मदिन पर, नितिन को पिता से एक ऐसा उपहार मिला जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। स्वयं नितिन बोस के शब्दों में:
"मेरे सत्रहवें जन्मदिन पर, सन् 1914 में, पिताजी ने मुझे एक फ़िल्म-कैमरा भेंट किया था। मेरा कमरा दूसरी मंज़िल पर था। रात को सबके सो जाने के बाद मैं चुपके से नीचे जाता और कैमरा उठा लाता। उसे सिरहाने रखकर, उस पर अपना हाथ टिकाए हुए ही मुझे नींद आती थी। मुझे लगता था कि यह कैमरा मेरा ही प्रतिरूप है — कि मैं ही कैमरा हूँ।"
यह स्मृति किसी किशोर की भावुकता भर नहीं है; इसमें एक कलाकार का आत्म-परिचय छिपा है। जिस व्यक्ति के लिए कैमरा एक बाहरी उपकरण न रहकर उसकी अपनी आँख, उसकी अपनी चेतना का विस्तार बन जाए, वही आगे चलकर प्रकाश और छाया से अर्थ रचने का साहस कर सकता है। लगभग एक दशक बाद, सन् 1923 में, सोवियत फ़िल्मकार ज़िगा वेर्तोव ने अपने प्रसिद्ध घोषणापत्र में स्वयं को 'सिने-आँख' (किनो-ग्लाज़) कहकर मनुष्य और कैमरे की दृष्टि के इसी तादात्म्य को एक सिद्धांत का रूप दिया था। कलकत्ता का यह किशोर उस अनुभूति को किसी सिद्धांत के बिना, सहज आत्मीयता में, पहले ही जी चुका था।
यह कैमरा पिता की ओर से मिली सबसे स्थायी विरासत सिद्ध हुआ, क्योंकि दो वर्ष बाद, सन् 1916 में, हेमेन्द्रमोहन बोस का देहांत हो गया। आगे के वर्षों में नितिन ने इसी कैमरे से घरेलू फ़िल्में बनाईं, उन्हें स्वयं विकसित किया, और धीरे-धीरे वह तकनीकी दक्षता अर्जित की, जो उस दौर में किसी प्रशिक्षण-संस्थान से नहीं, केवल स्वाध्याय, धैर्य और निरंतर प्रयोग से ही पाई जा सकती थी।
न्यूज़रील के दिन: जब भारत की छवियाँ न्यूयॉर्क तक पहुँचीं
1920 के दशक के आरंभ में नितिन बोस ने समाचार-चित्रों (न्यूज़रील) की दुनिया में प्रवेश किया। सन् 1921–22 में उन्होंने पुरी की रथयात्रा और त्रिपुरा के महाराजा द्वारा आयोजित हाथियों के शिकार जैसे दृश्यों को फ़िल्माया, और इन्हें अमेरिका की दो न्यूज़रील कंपनियों — न्यूयॉर्क की इंटरनेशनल न्यूज़रील कॉरपोरेशन तथा फ़ॉक्स किनोग्राम — को बेचा। कोडक कंपनी के तकनीकी प्रबंधक की सलाह पर जब उन्होंने अपनी फ़िल्म न्यूयॉर्क भेजी, तो उत्तर में एक सौ एक डॉलर का ड्राफ़्ट आया। नितिन ने अपनी यह पहली कमाई माँ के हाथों में रखी, तो माँ ने आशीर्वाद दिया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वह इसी पेशे को अपना सकता है। बताया जाता है कि त्रिपुरा के वनों में किए गए फ़िल्मांकन की लगभग तीन सौ फ़ुट फ़िल्म बेचकर उन्होंने डेढ़ हज़ार डॉलर अर्जित किए — उस युग के किसी भारतीय युवक के लिए यह असाधारण राशि थी।
संदर्भ-ग्रंथों में उनकी आरंभिक कृतियों के बीच 'बेल्जियम सम्राट की भारत-यात्रा' नामक एक वृत्तचित्र का भी उल्लेख मिलता है, जिसका वर्ष प्रायः 1921 बताया जाता है। किंतु ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार बेल्जियम-नरेश अल्बर्ट प्रथम और महारानी एलिज़ाबेथ की भारत-यात्रा नवंबर 1925 में हुई थी; अतः यह फ़िल्मांकन संभवतः उसी यात्रा का है, और 1921 की प्रचलित तिथि पुनर्परीक्षण की माँग करती है।
एक नए प्रकार के भारतीय छायाकार का जन्म हो चुका था। बंगाल में सिनेमा के पहले उद्यमियों — 'रॉयल बायस्कोप' वाले हीरालाल सेन और 'ऑरोरा फ़िल्म कंपनी' के अनादिनाथ बोस — की आजीविका का बड़ा आधार बायस्कोप-प्रदर्शन था, और उन प्रदर्शनों में प्रायः विदेशी फ़िल्मों का बोलबाला रहता था। नितिन बोस ने इस प्रवाह की दिशा ही उलट दी: वे अपने कैमरे से रची गई भारत की छवियाँ विदेशी बाज़ार में बेच रहे थे। यह छोटा-सा व्यावसायिक तथ्य एक बड़ा सांस्कृतिक संकेत था — भारत अब केवल दूसरों की फ़िल्मों का दर्शक नहीं, अपनी छवियों का निर्माता भी बनने लगा था।
इसी दौर का एक प्रसंग नितिन बोस के स्वभाव को बड़ी स्पष्टता से उजागर करता है। सन् 1921 में वे मदन थियेटर्स के दफ़्तर पहुँचे। जमशेदजी फ़्रामजी मदन ने हेमेन्द्रमोहन बोस के पुत्र को मिलने का समय तो दे दिया, किंतु जब चौबीस वर्ष के इस युवक ने स्वयं को छायाकार बताया, तो अपनी फ़िल्मों के लिए इतालवी निर्देशकों और छायाकारों की सेवाएँ लेने वाले मदन को सहसा विश्वास नहीं हुआ। अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए नितिन ने मदन द्वारा निर्मित सभी फ़िल्मों का विस्तार से विश्लेषण कर डाला — उनकी ख़ूबियाँ भी गिनाईं और ख़ामियाँ भी। अपनी फ़िल्मों की आलोचना सुनकर मदन क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने नितिन को तत्काल दफ़्तर से निकल जाने का आदेश दे दिया।
इतिहास की विडंबना देखिए: जिस मदन साम्राज्य ने इस युवक को दरवाज़े से लौटा दिया था, वह सवाक युग की तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों के आगे लड़खड़ाता चला गया और 1937 में उसका फ़िल्म-निर्माण थम गया; जबकि उसी दशक में कलकत्ता के सिनेमा का नेतृत्व जिस न्यू थियेटर्स के हाथ आया, उसकी आँख स्वयं नितिन बोस थे।
मूक युग का छायाकार: 'पुनर्जन्म' से 'देवदास' तक
सन् 1924 में जयगोपाल पिल्लै एक फ़िल्म बनाने का प्रस्ताव लेकर नितिन बोस के पास आए। पिल्लै ने पूछा कि क्या वे कथा-फ़िल्म की तकनीक से परिचित हैं। नितिन बोस का उत्तर उनकी सहज ईमानदारी और आत्मविश्वास, दोनों का परिचायक था: "नहीं, बिल्कुल नहीं; लेकिन आप जो भी कहेंगे, वह मैं कर दूँगा।"
यह परियोजना कलकत्ता के फ़िल्म-प्रदर्शक घनश्यामदास चोखानी द्वारा स्थापित 'इंडियन किनेमा आर्ट्स' की पहली फ़िल्म 'पुनर्जन्म' (1927) के रूप में साकार हुई। इसका निर्देशन जयगोपाल पिल्लै ने किया, पटकथा प्रेमांकुर आतर्थी ने लिखी और छायांकन नितिन बोस ने किया; प्राप्त विवरणों के अनुसार इसकी शूटिंग सन् 1926 में जयपुर में आरंभ हुई थी। 'पुनर्जन्म' पति-पत्नी के संबंधों की एक रोचक कथा थी: आपसी कलह के बाद एक दंपती अलग हो जाते हैं और पत्नी मायके जाकर रहने लगती है। कुछ समय बाद पति को समाचार मिलता है कि उसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है। शोक-संतप्त पति विदेश-यात्रा पर निकल जाता है, जहाँ उसकी भेंट एक ऐसी स्त्री से होती है जो उसकी पत्नी की प्रतिमूर्ति है, और दोनों एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो जाते हैं। किंतु स्वदेश लौटने पर पति अपनी पत्नी को घर में सकुशल उपस्थित पाता है। मृत्यु, स्मृति और पुनर्प्राप्ति के इस त्रिकोण में वह मनोवैज्ञानिक संवेदना पहले से झलकती है, जो आगे चलकर न्यू थियेटर्स की सामाजिक फ़िल्मों की पहचान बनी।
'पुनर्जन्म' का महत्त्व केवल नितिन बोस के पहले कथाचित्र के रूप में नहीं है। इसी फ़िल्म में प्रेमांकुर आतर्थी और नितिन बोस की वह जोड़ी बनी, जिसने चार वर्ष बाद न्यू थियेटर्स की पहली सवाक फ़िल्म रची। सिनेमा-इतिहासकार इंडियन किनेमा आर्ट्स को — प्रमथेश बरुआ के 'बरुआ पिक्चर्स' और धीरेन गांगुली के 'ब्रिटिश डोमिनियन फ़िल्म्स' के साथ — न्यू थियेटर्स का प्रत्यक्ष पूर्वज मानते हैं।
इसके बाद नितिन बोस ने ऑरोरा सहित कलकत्ता की कई कंपनियों के लिए छायांकन किया। इनमें सबसे उल्लेखनीय था शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवदास' का पहला फ़िल्म-रूपांतरण — ईस्टर्न फ़िल्म्स सिंडिकेट की मूक फ़िल्म 'देवदास' (1928), जिसका निर्देशन रंगमंच के प्रख्यात अभिनेता नरेश मित्र ने किया और जिसमें फणी बर्मा देवदास बने। इतिहास का यह संयोग स्मरणीय है कि सात वर्ष बाद, 1935 में, प्रमथेश बरुआ की कालजयी सवाक 'देवदास' के छायाकारों में नितिन बोस के ही शिष्य बिमल राय थे — मानो देवदास की छवि एक पीढ़ी के कैमरे से दूसरी पीढ़ी के कैमरे को सौंपी गई हो।
तत्पश्चात् नितिन बोस ने बांग्ला रंगमंच के महानायक शिशिर कुमार भादुड़ी के निर्देशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित मूक फ़िल्म 'बिचारक' (1929) का छायांकन किया। रंगमंच की वाचिक परंपरा से आए निर्देशकों और कैमरे की दृश्य-भाषा के बीच सेतु बनना — यही इस दौर में नितिन बोस की सबसे बड़ी भूमिका थी।
न्यू थियेटर्स का जन्म: एक स्टूडियो, एक स्वप्न
1920 के दशक के अंतिम वर्षों में, चारु राय के निर्देशन में बन रही एक फ़िल्म के दौरान, नितिन बोस का परिचय वीरेन्द्रनाथ सरकार (बी.एन. सरकार) से हुआ। बंगाल के महाधिवक्ता सर नृपेन्द्रनाथ सरकार के पुत्र बी.एन. सरकार ने पहले 'इंटरनेशनल फ़िल्मक्राफ़्ट' नामक कंपनी बनाई, जिसकी दोनों मूक फ़िल्मों — 'चोरकाँटा' और 'चाषार मेये' (1931) — का छायांकन नितिन बोस ने किया। नितिन बोस, चारु राय और बी.एन. सरकार की इन बैठकों से ही उस संस्था की परिकल्पना ने आकार लेना शुरू किया, जिसने अगले डेढ़ दशक तक भारतीय सिनेमा की कलात्मक दिशा तय की।
10 फ़रवरी 1931 को 'न्यू थियेटर्स लिमिटेड' की स्थापना हुई, और हाथी के प्रतीक-चिह्न वाला यह स्टूडियो शीघ्र ही गुणवत्ता का पर्याय बन गया। नितिन बोस इसके मुख्य तकनीकी सलाहकार और कैमरा-विभाग के प्रमुख बने। न्यू थियेटर्स की पहली सवाक फ़िल्म — शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित, प्रेमांकुर आतर्थी द्वारा निर्देशित 'देना पावना' (1931) — का छायांकन उन्होंने ही किया। सन् 1932 में उन्हें एक अद्वितीय अवसर मिला: स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने नृत्य-नाट्य 'नटीर पूजा' को फ़िल्म के रूप में निर्देशित किया, और उसका कैमरा नितिन बोस के हाथ में था, जबकि ध्वनि-अंकन उनके भाई मुकुल बोस ने किया। टैगोर द्वारा निर्देशित यह एकमात्र फ़िल्म थी।
इसी दौर में नितिन बोस ने देवकी बोस की 'चंडीदास' (1932) और 'राजरानी मीरा' (1933) तथा प्रेमांकुर आतर्थी की 'मोहब्बत के आँसू' और 'सुबह का सितारा' (दोनों 1932) जैसी फ़िल्मों का छायांकन किया। इनमें 'मोहब्बत के आँसू' इसलिए भी ऐतिहासिक है कि यह कुंदनलाल सहगल की पहली फ़िल्म थी — अर्थात् जिस अभिनेता-गायक को भारतीय सिनेमा का पहला 'सुपरस्टार' कहा गया, उसकी पहली सिनेमाई छवि नितिन बोस के कैमरे ने ही गढ़ी।
कलकत्ता में जब न्यू थियेटर्स की परिकल्पना आकार ले रही थी, लगभग उसी समय कोल्हापुर में बाबूराव पेंटर की छत्रछाया में प्रशिक्षित वी. शांताराम, विष्णुपंत दामले, एस. फत्तेलाल और उनके साथी 1929 में 'प्रभात फ़िल्म कंपनी' की नींव रख चुके थे। पूर्व में न्यू थियेटर्स और पश्चिम में प्रभात — और कुछ वर्ष बाद बंबई में बॉम्बे टॉकीज़ — इन स्टूडियो के बीच की रचनात्मक प्रतिस्पर्धा ने 1930 के दशक को सवाक भारतीय सिनेमा का पहला स्वर्णिम दशक बना दिया।
छायाकार से निर्देशक, और पार्श्वगायन की क्रांति
सन् 1933–34 में जब देवकी बोस 'सीता' (1934) बनाने के लिए अस्थायी रूप से न्यू थियेटर्स से अलग हुए, तो बी.एन. सरकार ने नितिन बोस से निर्देशन की बागडोर सँभालने का आग्रह किया। निर्देशक के रूप में नितिन बोस ने शुरुआत देवकी बोस की ही बांग्ला 'चंडीदास' (1932) के हिंदी रूपांतरण से की। के.एल. सहगल और उमा शशि अभिनीत हिंदी 'चंडीदास' (1934) बड़ी सफलता सिद्ध हुई, और इसी वर्ष उन्होंने 'डाकू मंसूर' का भी निर्देशन किया। छायाकार की आँख और निर्देशक की कथा-दृष्टि का यह मेल नितिन बोस की विशिष्टता बना; आने वाले वर्षों में वे अपनी कई फ़िल्मों के निर्देशक, पटकथाकार और छायाकार — तीनों एक साथ रहे।
किंतु नितिन बोस का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में जिस योगदान के लिए अमिट है, वह है पार्श्वगायन (प्लेबैक सिंगिंग)। सवाक सिनेमा के आरंभिक वर्षों में गीतों को शूटिंग के समय ही, कैमरे के सामने, सीधे रिकॉर्ड करना पड़ता था। वादक सेट के पीछे या दृश्य की ओट में छिपकर बजाते, माइक्रोफ़ोन को फ्रेम से बचाकर कहीं छिपाया जाता, और अभिनेता को अभिनय के साथ-साथ गाना भी पड़ता था। परिणाम यह था कि कैमरा बँधा रहता, एक भी चूक पर पूरा दृश्य दोबारा शूट करना पड़ता, और गा न सकने वाले अभिनेताओं के लिए नायक बनने का रास्ता लगभग बंद था।
पार्श्वगायन का विचार नितिन बोस के मन में एक लगभग हास्यास्पद क्षण में आया। संगीत-इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक 'धुनों की यात्रा' में यह प्रसंग दर्ज किया है: एक दिन नितिन बोस संगीतकार पंकज मलिक के घर के बाहर कार में बैठे उनकी प्रतीक्षा करते हुए देर तक हॉर्न बजाते रहे, पर पंकज बाबू बाहर नहीं आए — वे ग्रामोफ़ोन पर बजते अपने प्रिय अंग्रेज़ी गीत के साथ-साथ गाने में इतने डूबे थे कि उन्हें हॉर्न सुनाई ही नहीं दिया। रिकॉर्ड के साथ गाते उस स्वर ने नितिन बोस के भीतर एक प्रश्न जगा दिया: यदि गीत पहले रिकॉर्ड कर लिया जाए, तो क्या शूटिंग के समय अभिनेता केवल उसके साथ होंठ नहीं हिला सकता? उन्होंने यह विचार संगीत-निर्देशक रायचंद बोराल (आर.सी. बोराल) के सामने रखा, और न्यू थियेटर्स के ध्वनि-अभियंता मुकुल बोस — नितिन के छोटे भाई — ने इसे तकनीकी रूप से साकार किया।
सन् 1935 में यह प्रयोग पहली बार बांग्ला फ़िल्म 'भाग्यचक्र' में किया गया, और उसी वर्ष उसके हिंदी रूपांतरण 'धूप छाँव' में, जिसकी कहानी पंडित सुदर्शन ने लिखी थी। 'धूप छाँव' का समूह-गीत 'मैं ख़ुश होना चाहूँ' — जिसे सुप्रभा सरकार, पारुल घोष, हरिमती और के.सी. डे ने स्वर दिया — हिंदी सिनेमा का पहला पार्श्वगीत माना जाता है।
यह केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, सिनेमाई सौंदर्यशास्त्र की एक मौन क्रांति थी। पार्श्वगायन ने पहली बार स्वर को देह से अलग किया: अब पर्दे पर जो चेहरा दिखता, ज़रूरी नहीं कि स्वर भी उसी का हो। इस विभाजन के तीन दूरगामी परिणाम हुए। पहला, कैमरा मुक्त हुआ — गीतों का फ़िल्मांकन अब बाहरी स्थलों पर, गति के साथ और अनेक कोणों से संभव हो गया। दूसरा, अभिनय और गायन दो अलग विधाएँ बन गईं — गा न सकने वाले अभिनेता भी नायक बन सकते थे, और पर्दे पर न दिखने वाले गायक भी लाखों दिलों तक पहुँच सकते थे। तीसरा, गीत अलग से रिकॉर्ड होकर फ़िल्म की रिलीज़ से पहले ही जनता तक पहुँचने लगे — और यहीं से हिंदी फ़िल्म-संगीत का वह स्वतंत्र संसार बना, जिसमें आगे चलकर लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार जैसे पार्श्वगायक स्वयं सितारे बने।
यह परिवर्तन धीरे-धीरे पूरा हुआ — 1949 की 'महल' के बाद ही रिकॉर्डों पर पार्श्वगायकों के नाम देना चलन बना — किंतु उसका बीज 1935 में नितिन बोस ने ही बोया था। यह संयोग नहीं कि भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, लगातार दो वर्षों में इस प्रयोग के दोनों सूत्रधारों को मिला — 1977 के लिए नितिन बोस को और 1978 के लिए रायचंद बोराल को।
यथार्थ की ओर: 'प्रेसिडेंट', 'धरती माता' और 'दुश्मन'
1930 के दशक के उत्तरार्ध में नितिन बोस का सिनेमा भक्ति-कथाओं और भावुक प्रेम-कहानियों की परिधि से निकलकर समकालीन समाज के प्रश्नों की ओर मुड़ा। सिनेमा-इतिहासकारों ने उनकी इस दौर की फ़िल्मों में एक नए 'यथार्थवादी' तत्व को रेखांकित किया है, जिसकी पूर्ण परिणति आगे चलकर उनके ही शिष्य बिमल राय के सिनेमा में हुई।
'दीदी' (बांग्ला) और उसका हिंदी रूप 'प्रेसिडेंट' (1937) इस मोड़ की पहली स्पष्ट घोषणा थे। फ़िल्म के निर्देशन, पटकथा और छायांकन — तीनों का दायित्व स्वयं नितिन बोस ने निभाया। इसकी केंद्रीय पात्र प्रभावती (कमलेश कुमारी) एक मिल की संचालिका है — फ़िल्म की 'प्रेसिडेंट' — और नायक प्रकाश (के.एल. सहगल) उसी मिल का एक प्रतिभाशाली कर्मचारी; साथ में लीला देसाई और पृथ्वीराज कपूर भी थे। उद्योग, श्रम, वर्ग और स्त्री-नेतृत्व जैसे विषयों को 1937 में मुख्यधारा की फ़िल्म के केंद्र में रखना अपने आप में साहसिक था। सहगल का अमर गीत 'इक बंगला बने न्यारा' इसी फ़िल्म की देन है।
'देशेर माटी' (बांग्ला) और 'धरती माता' (हिंदी, 1938) में नितिन बोस ने गाँव, किसान और धरती से मनुष्य के संबंध को कथा के केंद्र में रखा — उस समय, जब भारतीय सिनेमा का बड़ा हिस्सा या तो पौराणिक आख्यानों में रमा था या शहरी रोमांस में।
'जीबन मरण' (बांग्ला) और 'दुश्मन' (हिंदी, 1938–39) की कहानी अपने आप में सिनेमा और समाज के संबंध का एक दिलचस्प अध्याय है। उस समय क्षयरोग (टी.बी.) भारत में एक भयावह महामारी था, और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो — जो किंग जॉर्ज क्षयरोग-निधि के अध्यक्ष भी थे — ने इस विषय पर जन-जागरूकता के लिए एक फ़िल्म का सुझाव दिया। नितिन बोस ने इस 'प्रायोजित' विषय को उपदेश बनने से बचाते हुए एक मार्मिक प्रेम-त्रिकोण में ढाल दिया, जिसके केंद्र में है रेडियो-गायक मोहन (सहगल), जिसका जीवन और प्रेम दोनों इस रोग की छाया में आ जाते हैं। कहानी, निर्देशन और छायांकन, तीनों नितिन बोस के थे, और प्रामाणिकता के लिए उन्होंने उस समय के एक प्रख्यात क्षयरोग-विशेषज्ञ का परामर्श लिया था। पंकज मलिक के संगीत में सहगल का गाया 'करूँ क्या आस निरास भई' आज भी उस दौर की वेदना का स्वर बना हुआ है।
इसके बाद 'परिचय' (बांग्ला) और 'लगन' (हिंदी, 1941) में उन्होंने सहगल और कानन देवी की लोकप्रिय जोड़ी को निर्देशित किया, और फिर शरतचंद्र की कथा पर आधारित 'काशीनाथ' (1943) बनाई।
नितिन बोस की एक बड़ी देन वे लोग भी हैं, जिन्हें उन्होंने गढ़ा। बिमल राय ने न्यू थियेटर्स में नितिन बोस के शिष्य और सहायक छायाकार के रूप में कैमरा थामना सीखा, आगे चलकर बरुआ की 'देवदास' (1935) के छायांकन में भागीदार बने, और 1944 में 'उदयेर पथे' से निर्देशक के रूप में उभरे। 'उदयेर पथे' का सामाजिक यथार्थवाद, और आगे 'दो बीघा ज़मीन' (1953) की करुणा — इन सबके बीज 'प्रेसिडेंट' और 'धरती माता' के उस प्रयोगशील दौर में देखे जा सकते हैं, जहाँ गुरु ने पहली बार कैमरे को मिल, खेत और अस्पताल की ओर मोड़ा था।
बंबई का दूसरा अध्याय: 'मिलन' से 'गंगा जमना' तक
'काशीनाथ' (1943) के निर्माण के दौरान बी.एन. सरकार से हुए मतभेद के बाद नितिन बोस उस न्यू थियेटर्स में नहीं लौटे, जिससे वे उसकी स्थापना के दिन से जुड़े थे। 1940 के दशक में कलकत्ता से बंबई की ओर प्रतिभाओं का जो बड़ा पलायन हुआ, नितिन बोस भी उसका हिस्सा बने और बॉम्बे टॉकीज़ तथा फ़िल्मिस्तान जैसे बैनरों के लिए फ़िल्में निर्देशित कीं।
बॉम्बे टॉकीज़ के लिए उनकी पहली फ़िल्म थी 'मिलन' (1946), जो टैगोर के उपन्यास 'नौकाडूबी' पर आधारित थी और जिसका बांग्ला संस्करण 'नौकाडूबी' नाम से ही बना। हिंदी संस्करण में नायक रमेश की भूमिका दिलीप कुमार ने निभाई और बांग्ला में अभि भट्टाचार्य ने; छायांकन राधु कर्मकार का था और संगीत अनिल बिस्वास का। समीक्षकों ने फ़िल्म की धीमी गति की आलोचना तो की, पर रात्रि-दृश्यों के व्यापक और कलात्मक फ़िल्मांकन की खुलकर सराहना की। इस फ़िल्म का एक स्थायी महत्त्व दिलीप कुमार के अभिनय-विकास से जुड़ा है: 1944 में 'ज्वार भाटा' से शुरुआत करने वाले इस युवा अभिनेता ने बाद में स्वीकार किया कि 'मिलन' के बाद नितिन बोस उनके मित्र बन गए और उन्होंने पटकथा तथा भूमिका को पढ़ने-समझने का उनका ढंग ही बदल दिया।
टैगोर की कहानी पर आधारित बांग्ला फ़िल्म 'दृष्टिदान' (1948) आज मुख्यतः इस कारण याद की जाती है कि इसी से अरुण कुमार चट्टोपाध्याय नामक एक युवक ने पर्दे पर पहला क़दम रखा — वही युवक, जो आगे चलकर उत्तम कुमार के नाम से बांग्ला सिनेमा का 'महानायक' बना। फ़िल्म असफल रही, और उत्तम कुमार को कुछ समय तक 'फ़्लॉप मास्टर' जैसे ताने भी सुनने पड़े; पर बांग्ला सिनेमा के सबसे बड़े सितारे की पहली झलक नितिन बोस की ही फ़िल्म में दिखी थी।
बॉम्बे टॉकीज़ की 'मशाल' (1950; बांग्ला में 'समर') में अशोक कुमार प्रमुख भूमिका में थे, और सचिन देव बर्मन के संगीत में मन्ना डे का गाया 'ऊपर गगन विशाल' उस दौर के सबसे यादगार गीतों में गिना जाता है। अगले वर्ष आई 'दीदार' (1951) — दिलीप कुमार, नरगिस, अशोक कुमार और निम्मी अभिनीत, नौशाद के संगीत से सजी — दृष्टि खो चुके एक गायक की त्रासद प्रेम-कथा थी, जिसने 'ट्रेजडी किंग' के रूप में दिलीप कुमार की छवि को और गहरा किया; 'बचपन के दिन भुला न देना' जैसे गीत आज भी उसकी स्मृति को जीवित रखे हुए हैं। इसके बाद उन्होंने सुरैया और तलत महमूद अभिनीत 'वारिस' (1954) बनाई, अपने पुराने सहयोगी को श्रद्धांजलि-स्वरूप 'अमर सहगल' (1955) नामक वृत्तचित्र रचा, और अमिय चक्रवर्ती के आकस्मिक निधन के बाद उनकी अधूरी फ़िल्म 'कठपुतली' (1957) को पूरा किया।
नितिन बोस के निर्देशकीय जीवन का शिखर, और हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक प्रभावशाली फ़िल्मों में से एक, थी 'गंगा जमना' (1961)। दिलीप कुमार द्वारा निर्मित और लिखित इस टेक्नीकलर फ़िल्म में स्वयं दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला और उनके वास्तविक जीवन के भाई नासिर ख़ान ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। अवध के एक गाँव की पृष्ठभूमि में दो भाइयों — ज़मींदारी अन्याय के विरुद्ध हथियार उठाकर डाकू बने गंगा और पढ़-लिखकर पुलिस अधिकारी बने जमना — की यह त्रासद कथा भोजपुरी रंगत वाली ग्रामीण बोली के साहसिक प्रयोग के लिए भी याद की जाती है। नौवें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में फ़िल्म को सात नामांकन मिले, जिनमें नितिन बोस का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नामांकन भी था, और वैजयंतीमाला ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता।
इस फ़िल्म के निर्देशन-श्रेय पर एक बहस भी रही है। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में 'गंगा जमना' को अपनी संतान जैसी रचना बताया और कहा कि इसके निर्देशन तथा संपादन में उनकी भी गहरी भूमिका थी; कहा जाता है कि स्वयं नितिन बोस ने भी स्वीकार किया था कि शूटिंग के दौरान वे कई बार कुर्सी पर बैठे, असहाय-से, दिलीप कुमार को निर्देशक का काम करते देखते रहे। फिर भी, आधिकारिक श्रेय में यह फ़िल्म नितिन बोस की है — और उस पीढ़ीगत सेतु का प्रतीक भी, जिस पर 1920 के दशक का एक न्यूज़रील-छायाकार 1960 के दशक के सबसे बड़े सितारे के साथ खड़ा था। आगे चलकर अमिताभ बच्चन ने इसमें दिलीप कुमार के अभिनय को अभिनय का चरम कहा, और भाई-बनाम-भाई तथा क़ानून-बनाम-विद्रोह की जिस कथा-संरचना ने 1970 के दशक में 'दीवार' (1975) जैसी फ़िल्में दीं, उसकी जड़ें प्रायः 'गंगा जमना' में ही खोजी जाती हैं।
इसके बाद भी नितिन बोस सक्रिय रहे — 'उम्मीद' (1962), 'नर्तकी' (1963), 'दूज का चाँद' (1964) और 'हम कहाँ जा रहे हैं' (1966) के बाद 'समानता' (1972) उनकी अंतिम फ़िल्म रही।
सम्मान, विरासत और एक स्वप्न की पूर्णता
सन् 1977 के लिए नितिन बोस को भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, प्रदान किया गया। पच्चीसवें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार-समारोह में 27 अप्रैल 1978 को उन्हें यह सम्मान दिया गया — उनके इक्यासीवें जन्मदिन के ठीक अगले दिन। 14 अप्रैल 1986 को, अपने नवासीवें जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले, कलकत्ता में उनका देहांत हुआ — उसी शहर में, जहाँ उनका जन्म हुआ था और जहाँ उन्होंने कैमरे को सिरहाने रखकर पहली बार सिनेमा का स्वप्न देखा था। भारतीय सिनेमा के शताब्दी-वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक-टिकट जारी किया।
नितिन बोस की विरासत को किसी एक फ़िल्म में नहीं समेटा जा सकता। वे एक साथ कई भूमिकाओं में भारतीय सिनेमा के निर्माता थे: एक छायाकार, जिसने मूक युग से सवाक युग तक कैमरे की भाषा को परिष्कृत किया; एक तकनीकविद्, जिसने न्यू थियेटर्स की दृश्य-पहचान गढ़ी और पार्श्वगायन जैसी युगांतरकारी पद्धति को जन्म दिया; एक निर्देशक, जिसने भक्ति-कथाओं से लेकर मिल, खेत और महामारी तक के प्रश्नों को पर्दे पर उतारा; और एक गुरु, जिसकी छाया में बिमल राय का कैमरा सधा और दिलीप कुमार का अभिनय निखरा।
हीरालाल सेन ने बंगाल को चलती-फिरती छवियाँ दीं, दादासाहेब फाल्के ने 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) के साथ उन छवियों को कथा दी, और 'आलम आरा' (1931) ने उन्हें आवाज़ दी। नितिन बोस ने उस आवाज़ को देह के बंधन से मुक्त कर दिया। भारतीय सिनेमा का गीत आज जिस स्वच्छंदता से पहाड़ों, समुद्र-तटों और महानगरों के बीच उड़ान भरता है, उसकी पहली उड़ान कलकत्ता के उस किशोर के स्वप्न से निकली थी, जो अपने कैमरे पर हाथ रखकर ही सो पाता था — और जिसे लगता था कि वह स्वयं कैमरा है।
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