एक विरोधाभास से शुरुआत

एक ऐसा व्यक्ति, जिसने दादा साहेब फालके द्वारा अपनाए गए उस कठोर, एकाकी, वर्षों-लंबे साधना-मार्ग से सायास दूरी बना ली — न वह स्वयं कैमरा चलाना सीखना चाहता था, न किसी भारतीय प्रतिभा को वर्षों तक तराशने का धैर्य रखता था — फिर भी वही व्यक्ति आगे चलकर भारतीय व्यावसायिक सिनेमा का संस्थापक कहलाया। यह विरोधाभास ही जमशेदजी फ्रामजी मदन के संपूर्ण जीवन-कर्म की कुंजी है। क्या सिनेमा की पहली ठोस संरचना — उसके सिनेमाघर, उसकी वितरण-शृंखला, उसका औद्योगिक ढाँचा — कला से पहले व्यवसाय ने ही रची? और यदि ऐसा था, तो उस व्यवसाय की छाया में भारतीय सिनेमा की अपनी आवाज़ आख़िर कहाँ और कैसे जन्मी? मदन की कहानी का उत्तर इन दोनों प्रश्नों में छिपा है, और यह उत्तर उतना ही जटिल है, जितना स्वयं वह व्यक्ति था।

महाराष्ट्र से बंगाल तक: सिनेमा का भौगोलिक विस्तार

सन् 1913 से सन् 1918 तक भारत में फ़िल्म-निर्माण लगभग पूर्णतः महाराष्ट्र तक ही सीमित रहा था — फालके और पाटणकर जैसे फ़िल्मकार वहीं अपने प्रयोगों में संलग्न थे। इसी बीच, हीरालाल सेन की कर्मस्थली बंगाल में भी पहली कथा-फ़िल्म बनाने की गतिविधियाँ जोर-शोर से आरंभ हो चुकी थीं। सन् 1915 में देवी घोष ने एक संपूर्ण नाटक 'विष-वृक्ष' का फ़िल्मांकन किया — किंतु बंगाल की पूरी लंबाई की पहली सच्ची कथा-फ़िल्म, 'बिल्व-मंगल', अंततः जमशेदजी मदन के कुशल व्यावसायिक नियंत्रण में ही बन सकी। रुस्तमजी धोतीवाला द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म सन् 1919 में बनकर तैयार हुई, और नवंबर 1919 में इसका प्रथम प्रदर्शन हुआ। रुस्तमजी धोतीवाला ने जमशेदजी की पुत्री से विवाह किया था, और वे जमशेदजी के व्यापार में भागीदार भी थे — अर्थात् मदन की फ़िल्म-निर्माण परियोजना आरंभ से ही एक पारिवारिक-व्यावसायिक उद्यम के रूप में संरचित थी, न कि किसी व्यक्तिगत कलात्मक अभियान के रूप में।

अभिनेता से साम्राज्य-निर्माता तक: मदन की अपनी यात्रा

जमशेदजी फ्रामजी मदन (1856-1923) की अपनी यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं है। सन् 1870 से ही वे एलफिंस्टन नाटक-मंडली के नाटकों में अभिनय करने लगे थे — अर्थात् सिनेमा से उनका परिचय किसी तकनीकी कौतूहल से नहीं, बल्कि रंगमंच की समझ से हुआ। सन् 1902 से उन्होंने घुमंतू तंबू-थियेटरों में फ़िल्में दिखाना आरंभ कर दिया था, और सन् 1903 में वे पाथे कंपनी द्वारा निर्मित फ़िल्म-प्रक्षेपण-यंत्रों तथा कैमरों के भारतीय आयात-प्रतिनिधि बन गए — यह वही पाथे कंपनी थी, जिसका कैमरा आगे चलकर हीरालाल सेन ने भी ख़रीदा था। सन् 1904 से ही विदेशी फ़िल्मों के प्रदर्शन के साथ-साथ वे अपनी नाट्य-कंपनी के नाटकों के फ़िल्मांकित अंश भी दिखाने लगे थे। सन् 1907 में उन्होंने कलकत्ता का प्रथम स्थायी सिनेमाघर, 'एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस', निर्मित करवाया। सन् 1918 तक मदन का सिनेमा-साम्राज्य भारत, बर्मा और सिलोन तक विस्तृत हो चुका था, और उस समय तक वे एक सौ बहत्तर सिनेमाघरों के स्वामी बन चुके थे — यह संख्या स्वयं इस बात का प्रमाण है कि मदन किसी एक फ़िल्म के निर्माता भर नहीं, बल्कि एक समूचे औद्योगिक ढाँचे के वास्तुकार थे।

हॉलीवुड की छाया: एक समानांतर औद्योगिक क्रांति

एक अर्थ में, जमशेदजी मदन उन्हीं व्यावसायिक प्रवृत्तियों का भारत में प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो उसी दशक में हॉलीवुड को आकार दे रही थीं। सन् 1910 से ही डेविड वार्क ग्रिफ़िथ अपनी फ़िल्मों की शूटिंग के लिए सर्दियों के महीनों में न्यूयॉर्क से लॉस एंजेलेस जाने लगे थे, क्योंकि वहाँ न्यूयॉर्क की तुलना में अधिक अनुकूल धूप, बेहतर मौसम, तथा फ़िल्म-निर्माण के लिए आवश्यक विविध स्थानीय परिस्थितियाँ उपलब्ध थीं। सन् 1914 तक फ़िल्म-निर्माण का केंद्र न्यूयॉर्क से हटकर पूर्णतः लॉस एंजेलेस हो चुका था। किंतु निर्माण भले ही पश्चिमी तट पर हो, पूर्वी तट के प्रदर्शन-गृहों पर नियंत्रण बनाए रखना भी व्यावसायिक दृष्टि से उतना ही आवश्यक था — इसी आवश्यकता ने ऐसे उद्यमियों को तेज़ी से जन्म दिया, जो निर्माण, वितरण और प्रदर्शन — तीनों क्षेत्रों में एक साथ अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें।

सन् 1912 में ही एडोल्फ जुकोर ने अपनी निर्माण-कंपनी 'फ़ेमस प्लेयर्स इन फ़ेमस प्लेज़' की स्थापना की थी; इसके पश्चात् उन्होंने वितरण के क्षेत्र में भी विस्तार करना आरंभ किया, और सन् 1916 तक, 'पैरामाउंट पिक्चर्स' नामक वितरण-कंपनी के साथ अपनी निर्माण-कंपनी को जोड़कर, उन्होंने निर्माण और वितरण — दोनों पर एक साझा नियंत्रण स्थापित कर लिया, जो आगे चलकर आधुनिक पैरामाउंट स्टूडियो के रूप में विकसित हुआ। इसी दौर में प्रदर्शक और वितरक विलियम फॉक्स ने भी फ़िल्म-निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया, और सन् 1915 तक अपनी स्वतंत्र निर्माण-कंपनी स्थापित कर ली — यही कंपनी आगे चलकर ट्वेंटियथ-सेंचुरी-फॉक्स के नाम से विश्वविख्यात हुई। यह समांतरता उल्लेखनीय है — ठीक जैसे अमरीका में उद्यमी निर्माण-वितरण-प्रदर्शन के त्रिकोण पर एकाधिकार जमा रहे थे, वैसे ही भारत में मदन भी अपने सिनेमाघरों के जाल को पहले सुदृढ़ करके, उसके बाद ही निर्माण की ओर उन्मुख हुए थे।

अमरीका में एक और दिलचस्प व्यावसायिक प्रवृत्ति सन् 1919 में सामने आई — जब वहाँ के शीर्ष कलाकारों को इतना अधिक पारिश्रमिक मिलने लगा था कि उसे कराधान से बचाने के लिए उन्हें स्वयं व्यवसाय में उतरना पड़ा। चार्ल्स चैपलिन, मेरी पिकफ़ोर्ड, डगलस फ़ेयरबैंक्स तथा डेविड वार्क ग्रिफ़िथ ने मिलकर 'यूनाइटेड आर्टिस्ट्स' नामक वितरण-प्रदर्शन-कंपनी की स्थापना की, क्योंकि फ़िल्में तो वे चारों पहले से ही बना रहे थे — इस क़दम ने उनके व्यक्तिगत धन को एक संगठित व्यवसाय का रूप देकर उन्हें सामूहिक आर्थिक सुरक्षा प्रदान की। भारत में यह विशुद्ध व्यावसायिक समस्या — कि कलाकार और निर्माता स्वयं अपने उत्पाद पर कितना नियंत्रण रखें — बहुत बाद में पहुँची, किंतु इसकी मूल प्रेरणा वही थी, जो मदन को भी प्रेरित कर रही थी: सृजन पर नहीं, नियंत्रण पर आधारित सफलता।

यूरोप का भिन्न मार्ग, और युद्ध का व्यवधान

अमरीका की इस प्रबल व्यावसायिक प्रवृत्ति के ठीक विपरीत, यूरोप में सिनेमा को कला के विकास का एक प्रमुख अंग मानकर स्वीकार किया जाता रहा। फ़्रांस तथा इटली में 'फ़िल्म द आर्त' (Film d'Art) जैसे आंदोलन आरंभ हुए, जिनका उद्देश्य सिनेमा को साहित्य और नाट्य-कला की गरिमा के समकक्ष प्रतिष्ठित करना था। फ़्रांस में अवांगार्द आंदोलन भी सिनेमा के क्षेत्र में अपना स्वतंत्र, समांतर अस्तित्व सदैव बनाए रख सका। इन देशों में सन् 1915 से ही — अर्थात् ठीक उसी वर्ष, जब वैचेल लिंडसे की पुस्तक अमरीका में प्रकाशित हुई — सिनेमा को साहित्य और कला के समकक्ष मानकर बुद्धिजीवियों ने इस विधा को गंभीर सम्मान देना आरंभ कर दिया था।

किंतु प्रथम महायुद्ध ने यूरोप की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था पर इतना निर्णायक आघात किया कि अनेक फ़िल्मकार भी, विवशतावश, अमरीका के मार्ग पर चलने के लिए बाध्य हो गए। सन् 1920 के दशक के दौरान, जर्मन सिनेमा के कई प्रमुख निर्देशक — फ्रेडरिक विल्हेल्म मुरनाउ तथा पॉल लेनी, और स्वीडिश सिनेमा के मौरीत्ज़ स्टिलर तथा विक्टर सोज़ोस्ट्रॉम — क्रमशः हॉलीवुड पहुँचे और वहाँ अपना कार्य आरंभ किया। (यहाँ एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक भेद स्पष्ट करना आवश्यक है — फ्रिट्ज़ लांग, जो जर्मन अभिव्यंजनावादी सिनेमा के इसी दौर की उपज थे, इस प्रारंभिक प्रवासी-लहर का हिस्सा नहीं थे; उन्होंने वाइमर-युगीन जर्मनी में ही रहकर 'मेट्रोपोलिस' तथा 'एम' जैसी अपनी कालजयी कृतियाँ रचीं, और हॉलीवुड की ओर उनका प्रस्थान इसके डेढ़ दशक बाद, सन् 1934 में, नात्सी सत्ता से बचने के लिए हुआ — एक पूर्णतः भिन्न ऐतिहासिक परिस्थिति।) इसी दौर में कई द्वितीय-श्रेणी के इतालवी निर्देशक तथा अभिनयकर्मी भारत भी पहुँचे — और यहीं से मदन की कहानी का अगला, अत्यंत दिलचस्प अध्याय आरंभ होता है।

बिल्व-मंगल के बाद: सुरक्षित विषयों की सोच-समझी रणनीति

'बिल्व-मंगल' की सफलता के पश्चात् मदन थियेटर्स ने सन् 1920-21 में 'सती बेहुला', 'महाभारत', 'जय माँ जगदंबे', 'नल-दमयंती' तथा 'ध्रुव-चरित्र' जैसी अनेक फ़िल्में बनाईं। यह सूची स्वयं मदन की व्यावसायिक सोच को उजागर करती है — वे उन्हीं पौराणिक और भक्ति-प्रधान विषयों पर फ़िल्में बना रहे थे, जिनकी व्यावसायिक सफलता फालके के समय से ही सर्वमान्य और परीक्षित हो चुकी थी। जमशेदजी मदन ने निस्संदेह भारत में व्यावसायिक सिनेमा की ठोस नींव रखी, और वे दर्शक की रुचियों का सदैव सजग ध्यान रखते थे — किंतु यह सजगता जोखिम उठाने की नहीं, बल्कि जोखिम से बचने की कला थी।

आयातित नायिकाओं का रहस्य: जे० बी० एच० वाडिया की गवाही

मदन की व्यावसायिक रणनीति का एक अत्यंत रोचक पक्ष उनकी नायिकाओं के चयन में दिखाई देता है। उस समय महाराष्ट्र में बनने वाली फ़िल्मों में स्त्री-भूमिकाएँ प्रायः पुरुष कलाकार ही निभाया करते थे — जैसा कि दादा साहेब फालके के संघर्ष से हम पहले ही देख चुके हैं। जमशेदजी मदन इस परिपाटी का अनुसरण करके अपनी व्यावसायिक छवि को धूमिल नहीं करना चाहते थे, इसलिए उनकी फ़िल्मों में अनेक ऐंग्लो-इंडियन युवतियाँ अभिनय करती थीं, जिन्हें सुविचारित रूप से भारतीय फ़िल्मी नाम दे दिए गए थे — मिस रिनी स्मिथ 'सीता देवी' कहलाईं, मिस एफ़ी हिप्पोलेट 'इंदिरा देवी' बनीं, और मिस बॉनी बर्ड 'ललिता देवी' के नाम से जानी जाने लगीं। यह केवल एक सांयोगिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि दर्शकों की सांस्कृतिक अपेक्षाओं और उपलब्ध प्रतिभा-पूल की वास्तविक सीमाओं के बीच मदन द्वारा खोजा गया एक सुविचारित समझौता था।

प्रसिद्ध फ़िल्मकार जे० बी० एच० वाडिया ने अपने संस्मरणों में इस दौर की एक और उल्लेखनीय घटना दर्ज की है — "सन् 1922 में जमशेदजी मदन ने 'पति भक्ति' फ़िल्म बनाई। इसमें खलनायिका की भूमिका एक इतालवी अभिनेत्री सिन्योरा मिनैली ने निभाई थी। सिन्योरा मिनैली ने अपने गदराए हुए शरीर पर ऐसे वस्त्र पहन रखे थे, जिनका मुख्य उद्देश्य अंग-प्रदर्शन था।" फ़िल्म 'पति भक्ति' वस्तुतः आगा हश्र काश्मीरी के अत्यंत प्रसिद्ध नाटक पर आधारित थी, जिसमें ऐंग्लो-इंडियन अभिनेत्री पेशेंस कूपर नायिका बनी थीं, तथा उस दौर के नाटकों के विख्यात अभिनेता मास्टर मोहन नायक की भूमिका में थे। इस फ़िल्म का अंग्रेज़ी शीर्षक, दिलचस्प रूप से, 'ह्यूमन एवोल्यूशन' रखा गया था — मानो मदन अपनी भारतीय और अंग्रेज़ी-भाषी, दोनों ही तरह की दर्शक-मंडली को एक साथ साध रहे हों।

मदन थियेटर्स द्वारा निर्मित एक अन्य फ़िल्म 'नल-दमयंती' में नल की भूमिका भारतीय अभिनेता खुसरो अडजानी ने, और दमयंती की भूमिका पेशेंस कूपर ने निभाई थी। इस फ़िल्म का निर्देशन इतालवी फ़िल्मकार यूजेनियो डी लिगुओरो ने किया था, जिन्होंने स्वयं इसमें पुष्कर की भूमिका भी निभाई — यह तथ्य स्वयं इस बात का प्रमाण है कि मदन के सिनेमा-साम्राज्य में भारतीय और यूरोपीय प्रतिभा का यह सम्मिश्रण कितना गहरा था। सन् 1922 मदन थियेटर्स के लिए व्यावसायिक दृष्टि से सर्वोत्तम वर्ष सिद्ध हुआ, जब उनकी पंद्रह फ़िल्में प्रदर्शित हुईं; इसके पश्चात् के वर्षों में वे कभी सात-आठ फ़िल्मों की संख्या को पार नहीं कर पाए।

जमशेदजी के बाद: विरासत और उसके विद्रोही

जमशेदजी फ्रामजी मदन के देहांत के पश्चात् उनके पुत्र जमशेदजी जहाँगीर मदन ने भी कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, और मूक-फ़िल्म-युग के अंत तक मदन थियेटर्स की फ़िल्मों में इतालवी निर्देशकों और अभिनेत्रियों का महत्त्वपूर्ण स्थान बना रहा। सन् 1930 में बनी 'फ़ेटल मैरिज' को मदन की उत्तम मूक फ़िल्मों में गिना जाता है, जिसका छायांकन जतीन दास ने किया था।

किंतु मदन की शक्ति के विरुद्ध विद्रोह करने वालों की भी कमी नहीं थी। धीरेन गांगुली को स्वयं जमशेदजी मदन के कोप का भाजन बनना पड़ा था — सन् 1915 में वे मदन थियेटर्स के जनरल मैनेजर को ही अपने साथ ले उड़े थे, और इसी कारण अपनी पहली फ़िल्म 'बिलेत फेरत' उन्हें कलकत्ता के ऐसे थियेटर में प्रदर्शित करनी पड़ी, जिस पर मदन कंपनी का आधिपत्य नहीं था।

जमशेदजी मदन की कंपनी कितनी ही विशाल और शक्तिशाली क्यों न हो गई हो, वह कलकत्ता में चल रही फ़िल्म-निर्माण की समूची गतिविधि का मात्र एक अंश भर थी। आधुनिक कलाओं में सदैव अग्रणी रहने के लिए प्रयत्नशील बंगाली युवक फ़िल्म-निर्माण के प्रयत्नों में भी पूरे मनोयोग से जुटे हुए थे। सन् 1918 में अनादि बोस की 'आरोरा फ़िल्म कंपनी' ने 'रत्नाकर' नामक फ़िल्म का निर्माण आरंभ किया — इसके निर्माता अनादि बोस थे, निर्देशक सुरेंद्र नारायण राय, और छायाकार वही देवी घोष, जिनका उल्लेख इस निबंध के आरंभ में 'विष-वृक्ष' के संदर्भ में हो चुका है। सन् 1884 में जन्मे अनादि बोस ने हीरालाल सेन के वितरण-व्यवसाय से प्रेरणा पाकर सन् 1911 में ही अपनी वितरण-कंपनी की स्थापना कर ली थी, और देवी घोष के साथ मिलकर गाँव-गाँव में फ़िल्में दिखाने के व्यवसाय से इतना धन अर्जित कर लिया था कि वे सन् 1916 में अपना निजी कैमरा ख़रीद सकें। 'रत्नाकर' फ़िल्म सन् 1919 में ही बनकर तैयार हो गई थी, किंतु इसका प्रथम प्रदर्शन नवंबर 1921 तक टलता रहा — और इसी विलंब के कारण, धीरेन गांगुली की 'इंडो-ब्रिटिश फ़िल्म कंपनी' द्वारा निर्मित 'बिलेत फेरत', फ़रवरी 1921 में ही प्रदर्शित होकर, भारत की पहली सामाजिक फ़िल्म होने का ऐतिहासिक गौरव प्राप्त कर गई।

निष्कर्ष: भवन और उसकी खिड़की

यहीं पर इस निबंध के आरंभ में उठाया गया प्रश्न अपने पूर्ण अर्थ में प्रकट होता है। जमशेदजी मदन ने निस्संदेह भारतीय सिनेमा को उसका पहला ठोस, संस्थागत भवन दिया — सिनेमाघरों का जाल, वितरण का तंत्र, तथा व्यावसायिक निरंतरता की वह गारंटी, जिसके बिना कोई भी कला-माध्यम एक उद्योग का रूप नहीं ले सकता। किंतु यह भवन, अपनी समस्त भव्यता के बावजूद, एक सीमा से आगे नहीं जा सका — यह सुरक्षित पौराणिक विषयों, आयातित यूरोपीय चेहरों, तथा जोखिम-विहीन दोहराव की नींव पर खड़ा था। भारतीय सिनेमा की वह साहसी, मौलिक, सामाजिक आवाज़ — जो समकालीन भारतीय जीवन को सीधे संबोधित कर सके — इस विशाल भवन के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर, उसकी छाया में संघर्ष करते हुए धीरेन गांगुली जैसे विद्रोही फ़िल्मकारों की एक छोटी-सी खिड़की से फूटी। मदन ने सिनेमा को टिकने के लिए ज़मीन दी; किंतु उस ज़मीन पर अपनी शर्तों पर खड़े होने का साहस, अंततः, मदन-साम्राज्य से बाहर के फ़िल्मकारों को ही जुटाना पड़ा। भारतीय सिनेमा का यह आरंभिक द्वंद्व — व्यवसाय की सुरक्षा बनाम कला का जोखिम — आगे आने वाले एक समूचे शतक तक इस उद्योग का पीछा करता रहा।