किसी छोटे बच्चे को कहानी सुनाइए और बीच में रुक जाइए। वह तुरंत पूछेगा, "फिर क्या हुआ?"

किसी ने उसे यह सवाल सिखाया नहीं है। भाषा सीखने से पहले ही वह कहानी का ढाँचा पहचानने लगता है। उसे पता होता है कि कहानी में कुछ होता है, फिर कुछ और होता है, और अंत में कोई नतीजा निकलता है। यह पहचान इतनी गहरी है कि उसे मनुष्य की बुनियादी बनावट का हिस्सा मानना पड़ता है।

पिछली पोस्ट में हमने देखा कि कहानी क्या है। अब यह समझना जरूरी है कि मनुष्य को कहानी चाहिए ही क्यों। एक फिल्म लेखक के लिए यह कोई दार्शनिक विलास नहीं है। जिस दिन आप समझ जाते हैं कि दर्शक कहानी से क्या लेने आया है, उस दिन आपका लिखना बदल जाता है।

अरस्तू और भाव का शोधन

ईसा से लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पहले अरस्तू ने 'पोएटिक्स' में एक सवाल उठाया जो आज तक जिंदा है। उन्होंने पूछा कि लोग दुखांत नाटक देखने क्यों जाते हैं। जिस दृश्य को असल जिंदगी में कोई नहीं देखना चाहेगा, उसी को मंच पर देखने के लिए लोग पैसा और समय खर्च करते हैं।

उनका उत्तर था कि नाटक दर्शक के भीतर करुणा और भय जगाता है, और फिर उन भावों को बाहर निकलने का रास्ता देता है। इसी प्रक्रिया को उन्होंने कैथार्सिस कहा। दर्शक मंच पर दूसरे की पीड़ा देखता है, भीतर से हिलता है, और हल्का होकर लौटता है।

सिनेमाघर में यही होता है। अँधेरे में बैठा दर्शक जब पर्दे पर किसी को रोते देखकर खुद रोता है, तो वह पागलपन नहीं कर रहा। वह वही काम कर रहा है जो ढाई हजार साल पहले यूनान के रंगमंच में हो रहा था और जो रामलीला के मैदान में सदियों से होता आया है।

भरत मुनि और रस

भारतीय परंपरा ने इसी सवाल का उत्तर अलग रास्ते से दिया, और मेरी समझ में ज्यादा बारीकी से दिया।

भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में दर्शक केंद्र में है। वहाँ रचना का लक्ष्य केवल कहानी सुनाना नहीं है, दर्शक के भीतर स्थायी भाव को जगाकर उसे रस में बदलना है। शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और बाद में जुड़ा शांत, ये नौ रस दर्शक के अनुभव का नक्शा हैं।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारतीय परंपरा में लेखक पहले यह तय करता है कि दर्शक को क्या महसूस कराना है, और उसके बाद तय करता है कि कौन सी घटनाएँ लिखनी हैं। पश्चिमी पटकथा-सिद्धांत प्रायः उल्टा चलता है, पहले संरचना, फिर भाव।

हिंदी सिनेमा की जो चीज विदेशी समीक्षकों को अटपटी लगती है, यानी एक ही फिल्म में हास्य, करुणा, वीरता और शृंगार का साथ-साथ होना, वह असल में इसी परंपरा का सीधा वंशज है। वह दोष नहीं, एक अलग सौंदर्यशास्त्र है। हाँ, कमजोर फिल्मों में यह मेल बिखर जाता है, और अच्छी फिल्मों में यह एक ही धारा बना रहता है। फर्क कौशल का है, सिद्धांत का नहीं।

मिथक: समाज की स्मृति

जोसेफ कैंपबेल ने दुनिया भर के मिथकों का अध्ययन करके यह दिखाया कि अलग-अलग महाद्वीपों की, अलग-अलग भाषाओं की नायक-कथाओं में एक जैसा ढाँचा बार-बार लौटता है। नायक अपने जाने-पहचाने संसार से निकलता है, अनजान संसार में परीक्षा देता है, और बदला हुआ लौटता है।

कैंपबेल का यह ढाँचा आगे चलकर पटकथा-लेखन का लोकप्रिय औजार बन गया। उसका फायदा भी है और खतरा भी। फायदा यह कि वह लेखक को एक जाँची हुई रीढ़ देता है। खतरा यह कि उसे सूची की तरह भरने लगें तो कहानी यांत्रिक हो जाती है।

मिथक का असली काम इससे बड़ा है। मिथक समाज को बताता है कि क्या सही है, क्या गलत है, किसे नायक मानना है और किस कीमत पर। राम का वनवास केवल एक घटना नहीं है, वह कर्तव्य के बारे में एक पूरे समाज का उत्तर है। युधिष्ठिर का सत्य और अर्जुन का संशय, ये दोनों आज भी हमारी फिल्मों में किसी न किसी शक्ल में लौटते रहते हैं।

इसीलिए भारतीय दर्शक कुछ कथानकों पर बिना सोचे प्रतिक्रिया देता है। बड़े भाई का बलिदान, माँ का त्याग, मित्रता की परीक्षा, घर लौटना, ये सब हमारे भीतर पहले से रखे हुए साँचे हैं। समझदार लेखक इन साँचों को जानता है। कभी उन्हें भरता है, कभी जानबूझकर तोड़ता है। लेकिन अनजान नहीं रहता।

कहानी अनुभव का अभ्यास है

एक और उत्तर ज्यादा व्यावहारिक है। कहानी मनुष्य के लिए अनुभव का सस्ता विकल्प है।

आदमी हर चीज खुद झेलकर नहीं सीख सकता। वह हर युद्ध नहीं लड़ सकता, हर विश्वासघात नहीं भोग सकता, हर गलती करके नहीं देख सकता। कहानी उसे यह सुविधा देती है कि वह दूसरे की जिंदगी के भीतर से गुजर आए और अपनी जिंदगी बचाए रखे।

जब आप 'मसान' देखते हैं तो कुछ घंटों के लिए आप उस लड़की के डर के भीतर होते हैं जिसे उसका शहर माफ नहीं कर रहा। जब आप 'कोर्ट' देखते हैं तो आप उस व्यवस्था के भीतर होते हैं जो किसी से नफरत नहीं करती और फिर भी आदमी को पीस देती है। दोनों अनुभव आपके अपने नहीं हैं, लेकिन देखने के बाद आप वही आदमी नहीं रहते जो थे।

यही कारण है कि सबसे असरदार फिल्में वे नहीं होतीं जिनमें सबसे ज्यादा घटता है, बल्कि वे होती हैं जिनके भीतर दर्शक सबसे ज्यादा देर तक टिका रह पाता है।

फिल्म सबसे ताकतवर रूप क्यों है

कहानी के तमाम रूपों में फिल्म की स्थिति अलग है, और इसकी वजह तकनीक से ज्यादा परिस्थिति है।

किताब पाठक अपनी गति से पढ़ता है, बीच में रुकता है, लौटकर पन्ना दोबारा पढ़ता है। फिल्म यह छूट नहीं देती। सिनेमाघर में अँधेरा होता है, समय लेखक के हाथ में होता है, और दर्शक चारों ओर से दो सौ अजनबियों के साथ बैठा होता है जो उसी क्षण वही महसूस कर रहे होते हैं।

इस सामूहिकता की ताकत बहुत बड़ी है। हँसी भरे हॉल में ज्यादा तेज होती है, चुप्पी ज्यादा भारी होती है। भारत में यह अनुभव और भी प्रत्यक्ष रहा है, जहाँ दर्शक सीटी बजाता है, तालियाँ पीटता है, संवाद पहले से बोल देता है। घर के पर्दे पर वही फिल्म छोटी लगने लगती है, इसका कारण स्क्रीन का आकार जितना है, उतना ही अकेलापन भी है।

लेखक की जिम्मेदारी

यह सब समझ लेने के बाद एक असुविधाजनक बात सामने आती है।

अगर कहानी सचमुच लोगों को बदल देती है, तो लिखने वाला निर्दोष नहीं रह जाता। जो फिल्म पीछा करने को प्रेम कहकर दिखाती है, वह लाखों दर्शकों को यही सिखाती है। जो फिल्म हिंसा को नायकत्व बना देती है, वह भी कुछ सिखा रही होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि लेखक उपदेशक बन जाए। उपदेश देने वाली फिल्में प्रायः बुरी फिल्में होती हैं, और इस पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे। इसका अर्थ केवल इतना है कि लेखक को पता होना चाहिए कि वह क्या दिखा रहा है और उसे किस नजर से दिखा रहा है। ईमानदारी और उपदेश दो अलग चीजें हैं।

आम भूलें

  1. कैंपबेल के ढाँचे को चेकलिस्ट की तरह भरना। नायक की यात्रा एक निरीक्षण है, नुस्खा नहीं।
  2. रस को सजावट समझना। भाव कहानी के ऊपर चढ़ाया गया रंग नहीं, उसकी बुनियाद है।
  3. यह मान लेना कि दर्शक केवल मनोरंजन चाहता है। दर्शक अनुभव चाहता है। मनोरंजन उस अनुभव का एक रूप है, इकलौता रूप नहीं।
  4. संदेश को कहानी से पहले रख देना। तब पात्र बोलने लगते हैं और जीना बंद कर देते हैं।

अभ्यास

अपनी जिंदगी की तीन ऐसी फिल्में लिखिए जिन्होंने आपको सचमुच हिलाया हो। हर फिल्म के आगे एक वाक्य में लिखिए कि उसने आपके भीतर कौन सा भाव जगाया था। करुणा, भय, क्रोध, विस्मय, प्रेम, जो भी रहा हो।

अब चौथी पंक्ति में लिखिए कि तीनों में कोई भाव दोहरा तो नहीं रहा।

जो भाव दोहराता है, वही आपका भाव है। लेखक के रूप में आप जीवन भर घूम-फिरकर उसी के पास लौटेंगे। इसे जल्दी जान लेना बड़ी बचत है।

सार

  • कहानी की जरूरत मनुष्य में इतनी गहरी है कि वह भाषा से भी पहले पहचान में आ जाती है।
  • अरस्तू के अनुसार नाटक करुणा और भय जगाकर उन्हें बाहर निकलने का रास्ता देता है।
  • भारतीय परंपरा दर्शक के भाव से शुरू करती है और उसे रस तक ले जाती है, इसलिए हिंदी सिनेमा का मिश्रित स्वभाव एक अलग सौंदर्यशास्त्र है, दोष नहीं।
  • मिथक समाज को नायक और कर्तव्य की परिभाषा देता है, और भारतीय दर्शक के भीतर वे साँचे पहले से मौजूद हैं।
  • कहानी अनुभव का अभ्यास है, इसलिए असर उस फिल्म का ज्यादा होता है जिसके भीतर दर्शक ज्यादा देर टिकता है।

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संदर्भ पुस्तकें: अरस्तू, पोएटिक्स · भरत मुनि, नाट्यशास्त्र · जोसेफ कैंपबेल, द हीरो विद थाउज़ेंड फेसेज · जेनिफर ग्रिसांती, स्टोरी लाइन

संदर्भ फिल्में: मसान (2015) · कोर्ट (2014) · शोले (1975)