पुस्तक का विवरण
| पुस्तक | सिनेमा से संवाद |
| लेखक | मनमोहन चड्ढा |
| प्रकाशक | समय साक्ष्य, देहरादून |
| संस्करण | प्रथम, 2021 |
| पृष्ठ | 135 |
| मूल्य | जन संस्करण ₹150; पुस्तकालय संस्करण ₹250 |
| ISBN | 978-93-90743-07-0 |
| विधा | सिनेमा पर निबंध |
| आवरण | हितेन्द्र तिवारी; आवरण पर पी.के. नायर, सतीश बहादुर और श्रीराम ताम्रकर के चित्र |
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आठ निबंध, एक बेचैनी
पुस्तक में आठ निबंध हैं और उनका फैलाव काफ़ी बड़ा है। एक ओर हिंदी की प्रगतिशील फ़िल्म-परंपरा और बिमल राय हैं, दूसरी ओर ओज़ू, त्रूफ़ो और आँद्रे बाज़ाँ। एक निबंध 'पाथेर पांचाली' के उपन्यास और फ़िल्म को आमने-सामने रखता है, एक भारतीय सिनेमा के अभिलेखपालों और कोशकारों को याद करता है, और अंतिम निबंध भारतीय भाषाओं के पाँच फ़िल्मकारों पर है।
| क्रम | निबंध | पृष्ठ | मुख्य सामग्री |
|---|---|---|---|
| 1 | हिन्दी फ़िल्मों की प्रगतिशील लहर | 13 | फाल्के, इप्टा, ख़्वाजा अहमद अब्बास, 'नीचा नगर', मृणाल सेन का 'खंडहर', श्याम बेनेगल, सुधीर मिश्रा, अमोल पालेकर, 'कोर्ट' |
| 2 | बिमल राय का रचना संसार | 29 | 'हमराही' से 'बंदिनी' तक; 'बंदिनी' के अंतिम दृश्य का दृश्य-दर-दृश्य पाठ |
| 3 | 'पाथेर पांचाली': उपन्यास और फ़िल्म | 48 | विभूतिभूषण के उपन्यास और सत्यजित राय की फ़िल्म की प्रसंगवार तुलना |
| 4 | जापानी फ़िल्मकार यासुजिरो ओज़ू | 58 | 'टोकियो स्टोरी' और 'द एंड ऑफ़ समर' का विस्तृत पाठ |
| 5 | 'सॉफ़्ट स्किन' निर्देशक फ़्रांस्वा त्रूफ़ो | 85 | त्रूफ़ो का जीवन, 'ले मिस्तो' और 'द सॉफ़्ट स्किन' |
| 6 | महान फ़िल्म समीक्षक आँद्रे बाज़ाँ | 93 | बाज़ाँ का जीवन और विचार; 'बाइसिकल थीव्स' और 'सिटिज़न केन' का पाठ |
| 7 | सिनेमा के अनाम कोशकार | 112 | बागेश्वर झा, बी.डी. गर्गा, वीरचंद धरमसी, श्रीराम ताम्रकर, पी.के. नायर, सतीश बहादुर आदि |
| 8 | क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमा | 124 | अडूर गोपालकृष्णन, गिरीश कासरवल्ली, जाह्नु बरुआ, अपर्णा सेन, अमोल पालेकर |
यह क्रम किसी योजनाबद्ध ग्रंथ का नहीं लगता। निबंध अलग-अलग समय पर लिखे गए जान पड़ते हैं: कहीं "आज सन् 2018 में" लिखा है, कहीं 2017 का वर्तमान है और कहीं 2020 का। पुस्तक में कोई भूमिका भी नहीं है जो बताए कि ये निबंध कब और किस अवसर पर लिखे गए, या इन्हें एक जिल्द में क्यों रखा गया। फिर भी एक सूत्र सबको बाँधे रखता है, और वह है हिंदी-भाषी समाज में सिनेमा की समझ के अभाव पर लेखक की बेचैनी। पहला निबंध पूछता है, "क्यों सिनेमा हिन्दी भाषा पढ़ने-बोलने-लिखने वालों का अपना नहीं बन पाया?", और अंतिम निबंध का आख़िरी वाक्य जैसे उसी प्रश्न का उत्तर देता है: "सही रास्ता यह है कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में, सिनेमा की सही समझ को विकसित करने का कोई कार्यक्रम कारगर ढंग से चलाया जाए।"
आभार-कथन अपने आप में पढ़ने लायक़ है। लेखक साफ़ कहते हैं कि "पुस्तक छपवाना तो एक बहाना है। मूल उद्देश्य है मित्रों के प्रति आभार व्यक्त कर पाना।" इस सूची में पी.के. नायर, सतीश बहादुर, श्रीराम ताम्रकर, जयप्रकाश चौकसे और समर नखाते जैसे नाम हैं, और गुलज़ार की 'आँधी' के एक संवाद पर ख़त्म होने वाला यह गद्य बताता है कि लेखक के लिए सिनेमा एक बिरादरी है, केवल अध्ययन का विषय नहीं। आवरण पर नायर, बहादुर और ताम्रकर के चित्र इसी बिरादरी को प्रणाम हैं, और सातवाँ निबंध इस प्रणाम को विस्तार देता है।
निबंधों से गुज़रते हुए
प्रगतिशील परंपरा: 'नीचा नगर' से 'कोर्ट' तक
पहला निबंध फाल्के से शुरू होकर सात दशकों का फासला तय करता है और इस क्रम में कहीं-कहीं डायरी की तरह फैल जाता है। इप्टा, ख़्वाजा अहमद अब्बास और 'धरती के लाल' के बाद लेखक चेतन आनंद की 'नीचा नगर' (1946) पर ठहरते हैं और उसकी एक सूक्ष्म बात पकड़ते हैं: निर्देशक ने दर्पणों के सहारे दिखाया है कि सरकारजी "छायामात्र रह गया है", अपने किलेनुमा मकान की दीवारों से भी डरता हुआ। यहीं लेखक 'नीचा नगर' की 'मैक्रो' दृष्टि की तुलना 'पाथेर पांचाली' के 'माइक्रो' संसार से करते हैं, जहाँ पूरा कथानक एक माँ की इस चिंता में सिमट आता है कि परिवार के लिए दो मुट्ठी भात कहाँ से आएगा।
इसके बाद मृणाल सेन की 'खंडहर' (1984), श्याम बेनेगल की आरंभिक फ़िल्मों की स्त्रियाँ, सुधीर मिश्रा की 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' और अमोल पालेकर की 'बनगरवाड़ी' आती हैं। इन पर टिप्पणियाँ छोटी हैं, पर निबंध का सबसे जीवंत हिस्सा चैतन्य ताम्हणे की 'कोर्ट' (2014) पर है। लेखक लोक-शाहीर नारायण कांबले के मुकदमे को कदम-कदम पर खोलते हैं और अंत में एक ऐसी बात कहते हैं जो फ़िल्म के मर्म तक जाती है: इस फ़िल्म में कोई ख़लनायक नहीं है; जज, सरकारी वकील और पुलिस, सब अपनी नौकरी कर रहे हैं, और "इनकी नौकरी चलती रहे, इसलिए इस व्यवस्था को नारायण कांबले जैसे लोगों की बहुत ज़रूरत है।" निबंध का अंत किसी निष्कर्ष पर नहीं, एक प्रस्ताव पर होता है: पाँच-सात-दस लोग मिलकर फ़िल्म-समाज बनाएँ, जिसमें "एक आलमारी हो, जिसमें उत्तम फ़िल्मों की डीवीडी तथा हिन्दी में सिनेमा पर लिखी गयी पुस्तकों का संग्रह हो।" यह सुझाव साधारण लग सकता है, पर पूरी किताब का कार्यक्रम यही है।
बिमल राय: 'बंदिनी' का अंतिम दृश्य
बिमल राय वाला निबंध पुस्तक का सबसे संतुलित निबंध है। वह 'हमराही', 'परिणीता', 'दो बीघा ज़मीन', 'बिराज बहू', 'देवदास', 'यहूदी', 'सुजाता' और 'परख' से होते हुए 'बंदिनी' (1963) तक पहुँचता है। 'दो बीघा ज़मीन' पर लेखक की टिप्पणी सारगर्भित है: इस फ़िल्म में पहली बार एक शहर कथा को आगे बढ़ाने का बहाना भर न रहकर "अपनी अस्मिता के साथ" पर्दे पर आता है, और इस बात की पुष्टि के लिए वे इक़बाल मसूद का यह कथन उद्धृत करते हैं कि यह कलकत्ता "उजड़े हुए ग़ैर-बंगाली किसान की आँखों से देखा गया" कलकत्ता है। 'बिराज बहू' पर उनका एक वाक्य रूपांतरण की पूरी समस्या को समेट लेता है: "उपन्यासकार शरतचन्द्र की सोच इस फ़िल्म को शक्ति भी प्रदान करती है और कमज़ोर भी बनाती है।"
पर निबंध का केंद्र 'बंदिनी' का अंतिम दृश्य है, और यहीं यह पुस्तक सचमुच वह कर दिखाती है जिसका वह वादा करती है। मनिहारी घाट, एक ओर रेलवे स्टेशन, सामने स्टीमर; खाँसते हुए विकास बाबू; सहायक का कल्याणी से कहना कि तपेदिक के मरीज़ को छूने के बाद वह फिनायल से हाथ धो ले, और कल्याणी का हाथ न धोना। फिर वह फ्रेम, जिसे लेखक तीन शब्दों में पकड़ते हैं: "एक ही फ्रेम में तीन कथा बिंदू।" स्टीमर तक जाने के तीन फ़ट्टों में से एक-एक करके उठाए जाना, रेलगाड़ी की सीटी को अनसुना करके कल्याणी का दौड़ना, और आख़िरी बचे फ़ट्टे पर चलकर डेक तक पहुँचना। लेखक इस क्रम को आइज़ेंस्टाइन की मोंताज-पद्धति का उदाहरण मानते हैं, और उसी साँस में अपनी सीमा भी मान लेते हैं: "बिंबों के जादू को शब्दों में बाँधना मेरे लिए कठिन है। उद्देश्य यही है कि सजग दर्शक दृश्य को ध्यान से देखें और बुनावट का आनन्द लें।"
इसी दृश्य से लेखक दो और धागे निकालते हैं। एक, कल्याणी का चरित्र राधा-भाव में बुना गया है: वैष्णव पिता की संतान, गुलज़ार का गीत 'मोरा गोरा अंग लइले' और सचिन देव बर्मन का स्वर इस भाव को चरम तक ले जाते हैं। दूसरा, गुलज़ार की 'इजाज़त' का वेटिंग रूम, पूर्व पति की खाँसी और अटैची से निकली दवाई 'बंदिनी' से ही उठाया गया तार है, जिसे नए रंग में रंगकर नया अंत दिया गया। निबंध का अंतिम आग्रह हिंदी के अध्यापक-समाज से है: बिमल राय की फ़िल्मों पर "उसी स्तर का या बेहतर समीक्षाकर्म सम्भव है, जैसा कि 'शेखर: एक जीवनी' और 'कामायनी' पर हुआ है।" हिंदी के पाठ्यक्रमों में सिनेमा की जगह का प्रश्न इससे अधिक सीधे शब्दों में शायद ही कभी उठाया गया हो।
'पाथेर पांचाली': पन्ने और पर्दे के बीच
साहित्य के विद्यार्थियों के लिए यह निबंध सबसे उपयोगी है। लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास का मन्मथनाथ गुप्त कृत हिंदी अनुवाद सामने रखकर सत्यजित राय की फ़िल्म से उसका मिलान करते हैं, और हर प्रसंग के साथ अनुवाद का पृष्ठ भी देते हैं। इस मिलान से कुछ बड़े अंतर सामने आते हैं। उपन्यास इंदिर ठाकरुन को पृष्ठ 34 पर ही विदा कर देता है, जबकि फ़िल्म में वे देर तक जीवित रहती हैं। विभूतिभूषण हरिहर के प्रति कठोर हैं और उसे लापरवाह गृहस्थ की तरह देखते हैं, जबकि राय का हरिहर परिस्थितियों से बंधा हुआ कर्तव्यपरायण आदमी है। उपन्यास में दुर्गा की मृत्यु के बाद भी परिवार गाँव में रहता है और दीवाली मनाकर बनारस जाता है; फ़िल्म में यह मृत्यु ही गाँव छोड़ने का कारण बनती है। इस अंतर पर लेखक का निष्कर्ष पूरे निबंध का सबसे मूल्यवान वाक्य है: "उपन्यासकार के अनुसार मानव जीवन सहज प्रवाह है। कोई मरे या जिए, जीवन सतत् चलता रहता है। लेकिन फ़िल्मकार एक छोटे से परिवार की कथा कह रहा है, जहाँ परिवार के सदस्य की मृत्यु जीवन की दिशा को पूरी तरह बदल देती है।"
लेखक यह भी दर्ज करते हैं कि राय ने उपन्यास के रोमांटिक संकेतों को लगभग पूरी तरह छोड़ दिया, और वनभोज वाले प्रसंग से दिखाते हैं कि ग़रीब दुर्गा की सामाजिक हैसियत भी उस गाँव के जाति-क्रम में बीनी से ऊँची है। अंत में श्याम बेनेगल के वृत्तचित्र में राय की बातचीत का अंश आता है, जिसमें राय अपू त्रयी के बारीक ब्यौरों का श्रेय विभूति बाबू के लेखन को देते हैं। यह अकेला निबंध है जिसके अंत में स्रोतों की बाक़ायदा सूची दी गई है, और हिंदी में रूपांतरण-अध्ययन की पद्धति सिखाने के लिए इसे कक्षा में सीधे पढ़ाया जा सकता है।
ओज़ू: बल्ब, घुटने और खाली गलियारे
ओज़ू पर लिखा निबंध पुस्तक का सबसे लंबा निबंध है, लगभग सत्ताइस पृष्ठों का, और मेरी दृष्टि में सबसे मौलिक भी। 'टोकियो स्टोरी' (1953) और 'द एंड ऑफ़ समर' (1961) की कथा लेखक लगभग दृश्य-दर-दृश्य दोहराते हैं, पर इस दोहराव के बीच वे ऐसी चीज़ें देखते हैं जिनकी ओर हिंदी के फ़िल्म-लेखन का ध्यान शायद ही कभी गया हो। वे पहले कैमरे की गति का व्याकरण समझाते हैं (पैन, टिल्ट, ट्रैकिंग शॉट), फिर बताते हैं कि ओज़ू का कैमरा इनमें से कुछ भी नहीं करता, और इस स्थिरता को एक सूत्र में बाँधते हैं: "जगहें पात्र हैं।" (पृ. 68) 'द एंड ऑफ़ समर' में जब बूढ़े पिता को दिल का दौरा पड़ता है, ओज़ू घबराए हुए चेहरों के बजाय खाली क्लीनिक, बजता टेलीफ़ोन, दीवार-घड़ी, सूना गलियारा और मच्छर-अगरबत्ती का धुआँ दिखाते हैं। लेखक गिनकर बताते हैं, "ये पाँच शॉट पच्चीस सेकेंड लेते हैं।" , और इसके पास 'आनंद' (1970) के मृत्यु-दृश्य की नाटकीयता को रख देते हैं। तुलना का फ़ैसला वे पाठक पर छोड़ देते हैं।
इस निबंध की सबसे अनूठी बात है रोज़मर्रा की वस्तुओं पर लेखक की नज़र। वे याद दिलाते हैं कि 1970-80 के दशक तक भारत के लगभग हर घर में छत से तार के सहारे लटकता पच्चीस या चालीस वॉट का एक बल्ब होता था, और पूछते हैं, "क्या आपने भारत की किसी फ़िल्म में वह बल्ब देखा है?" (पृ. 70) फिर वे 'टोकियो स्टोरी' के तीन घरों के बल्ब गिनाते हैं: डॉक्टर बेटे के घर शेड वाला बल्ब, बेटी के सैलून में दूधिया शेड, और नोरीको के कमरे में नंगा बल्ब, जिसका स्विच उसी के ऊपर लगा है। इसी तरह वे घुटनों की बात करते हैं: हमारे यहाँ डाइनिंग टेबल और कमोड आने के बाद घुटने बदलवाने वालों की संख्या बढ़ी है, पर किस फ़िल्म में इसका ज़िक्र है? भोजन की आदतों पर वे 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' (2019) का उदाहरण देते हैं। यह किसी सिद्धांतकार की नहीं, एक ध्यानी दर्शक की आलोचना है, और इसका निष्कर्ष साफ़ है: "फ़िल्म में कहानी से कहीं अधिक परिवेश, पात्र, जीने का तरीक़ा और फ़िल्मांकन का ढंग महत्त्वपूर्ण होता है।"
इसी कसौटी पर 'बाग़बान' (2003) के बारे में लेखक का फ़ैसला दो-टूक है: वह "इसलिए बुरी फ़िल्म है क्योंकि इसमें काला-सफ़ेद है" । माँ-बाप पूरी तरह उजले हैं और बच्चे पूरी तरह क्रूर, जबकि ओज़ू किसी को दोषी नहीं ठहराते। इसी तुलना में 'बधाई हो' भी आती है, जिसने अधेड़ उम्र में गर्भधारण को तमाशा बना दिया, जबकि 'टोकियो स्टोरी' में यह तथ्य इतनी सहजता से रखा गया है कि हम उसे देख भी नहीं पाते। ओज़ू के जेन-बोध को हिंदी पाठक तक पहुँचाने के लिए लेखक कबीर का सहारा लेते हैं: "जीवन जैसा है, वैसा ही, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।" एक जापानी फ़िल्मकार की सौंदर्य-दृष्टि का इससे सार्थक हिंदी अनुवाद कम ही होगा।
त्रूफ़ो और बाज़ाँ: फ़्रांसीसी समीक्षा का हिंदी परिचय
त्रूफ़ो वाला निबंध उनके जीवन, पहली लघु फ़िल्म 'ले मिस्तो' और 'द सॉफ़्ट स्किन' (1964) तक सीमित है। इसमें कथा-सार अधिक है, विश्लेषण कम; पर कुंवर नारायण की पुस्तक 'लेखक का सिनेमा' के सहारे लेखक अंत में एक साफ़ निष्कर्ष तक पहुँचते हैं कि यह "दो मज़बूत औरतों और एक कमज़ोर पुरुष की कहानी है" , एक बुद्धिजीवी नायक की, जो किताबों की दुनिया में ख़ुश रहता है और वास्तविक दुनिया में आते ही बिखर जाता है।
आँद्रे बाज़ाँ वाला निबंध कहीं अधिक महत्त्वाकांक्षी है। वह फ़्रांस से नहीं, हिंदी से शुरू होता है। लेखक कहते हैं कि हिंदी साहित्य को भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल जैसे चिंतक मिले, पर हिंदी सिनेमा इतना भाग्यशाली नहीं रहा। विष्णु खरे और कुंवर नारायण के लिए फ़िल्म-समीक्षा "अतिरिक्त काम" थी, "मूल धर्म तो कविता ही था" , और विनोद भारद्वाज तथा मंगलेश डबराल का फ़िल्म-लेखन उनकी पत्रकारिता का विस्तार भर था। इसके उलट बाज़ाँ ने फ़िल्म-चिंतन को स्वयं चुना था। यह निदान कठोर है और इस पर बहस हो सकती है, पर इसमें हिंदी की एक वास्तविक कमी की पहचान है।
इस निबंध की बड़ी उपलब्धि यह है कि वह मीज़-आँ-सें और मोंताज के अंतर को बिना किसी शास्त्रीय आडंबर के समझा देता है: समय और स्थान की अन्विति दृश्य को प्रामाणिकता देती है, जबकि समय और स्थान की कलात्मक जोड़-तोड़ कथा को संभव बनाती है । इसके बाद 'बाइसिकल थीव्स' का पाठ आता है, जिसमें चर्च वाला दृश्य खास तौर पर याद रहता है: चर्च को केवल शांति से मतलब है और यूनियन को केवल भविष्य के समाज से; रीची के दुख को आत्मसात् करने का काम केवल कलाकार करता है। बाज़ाँ के सहारे लेखक यह भी दिखाते हैं कि बेटे ब्रूनो का कहानी में होना ज़रूरी नहीं था, "लेकिन वही इस फ़िल्म ... को अर्थवान बना देता है"। 'सिटिज़न केन' के उस शॉट का वर्णन भी साफ़ है जिसमें अग्रभाग में नींद की गोलियों की शीशी, बीच में बिस्तर पर सूसन, और दूर दरवाज़े से आता नन्हा-सा केन दिखाई देता है। लेखक ईमानदारी से मानते हैं कि "यह आलेख फ़िल्म समीक्षक आँद्रे बाज़ाँ की स्तुति है" , और स्तुति होने के बावजूद यह निबंध हिंदी पाठक के लिए बाज़ाँ का सबसे सुगम प्रवेश-द्वार है।
अनाम कोशकार: स्मृति बचाने वाले लोग
मेरी दृष्टि में इस पुस्तक का सबसे ज़रूरी निबंध यही है, क्योंकि इसका विषय हिंदी में लगभग अनछुआ है। लेखक उन लोगों को याद करते हैं जिन्होंने फ़िल्में नहीं बनाईं, पर फ़िल्मों की स्मृति बचाई: 'मोशन पिक्चर एलमानक' के संपादक बागेश्वर झा, 'सो मैनी सिनेमाज़' के लेखक बी.डी. गर्गा, मूक फ़िल्मों की पहली सूची बनाने वाले वीरचंद धरमसी, फ़िल्मोग्राफ़ी तैयार करने वाले डी.पी. धारप, फ़िल्म-संगीत के संग्रहकर्ता वी.ए.के. रंगाराव और सुमन चौरसिया, 'हिंदी फ़िल्म गीत कोश' के हरमंदिर सिंह 'हमराज़', और 'नई दुनिया' के दीपावली फ़िल्म-विशेषांकों के संपादक श्रीराम ताम्रकर। इनके साथ पी.के. नायर और सतीश बहादुर का योगदान आता है, जिन्होंने मिलकर फ़िल्म-अनुशंसा का ग्रीष्म पाठ्यक्रम शुरू किया।
इस निबंध का पृष्ठभूमि-स्वर शोक का है। नाइट्रेट फ़िल्मों को चाँदी निकालने के लिए जला दिया गया, और लेखक के आकलन में मूक युग की "पांच सौ घंटे की मौलिक फुटेज में से हम केवल तीन घंटे से भी कम की फ़िल्म बचा पाए हैं।" दोष वे फ़िल्मकारों को नहीं, बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों और अध्यापकों को देते हैं, और एक वाक्य में पूरी स्थिति कह देते हैं: "आज अपने सिनेमा के इतिहास के नाम पर हम कोरी किताब हैं।" निबंध का सबसे सजीव अंश अरुण खोपकर की मराठी पुस्तक 'चलत-चित्रव्यूह' के सहारे सतीश बहादुर की कक्षा का वर्णन है: वे फ़िल्म दिखाने से पहले उसकी कहानी बता देते थे ताकि 'आगे क्या होगा' की उत्सुकता ख़त्म हो जाए, आधी बत्तियाँ जलाकर फ़िल्म रोक-रोककर समझाते थे, और कभी ध्वनि बंद करके केवल चित्रीकरण दिखाते थे। खोपकर के शब्दों में, वे उसी सावधानी से "फ़िल्म का अंग-प्रत्यंग खोलते थे" जिस सावधानी से शरीर-विज्ञान का अध्यापक शरीर का। यह निबंध कहीं-कहीं नामों की सूची जैसा लगता है, पर यह वह सूची है जिसकी हिंदी को सचमुच ज़रूरत थी, और इसके हर नाम पर अलग अध्ययन किया जा सकता है।
भारतीय भाषाओं का सिनेमा: पाँच फ़िल्मकार
अंतिम निबंध 'मुख्यधारा का सिनेमा' के मुहावरे पर सवाल से शुरू होता है। लेखक के अनुसार यह पी.आर. का गढ़ा हुआ शब्द है, और इसी प्रचार का नतीजा है कि दो बड़े प्रकाशन-घरानों के पुरस्कार 'वास्तविक सम्मान' माने जाते हैं और राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 'सरकारी' कहकर टाल दिए जाते हैं। इसके बाद वे पाँच फ़िल्मकारों के सहारे बात आगे बढ़ाते हैं: मलयालम के अडूर गोपालकृष्णन, कन्नड़ के गिरीश कासरवल्ली, असमिया के जाह्नु बरुआ, बांग्ला की अपर्णा सेन और मराठी के अमोल पालेकर। यहाँ लेखक का फ़िल्म संस्थान का भीतरी अनुभव काम आता है। वे बताते हैं कि अडूर की 'स्वयंवरम' (1972) को दक्षिणी क्षेत्रीय पैनल ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि ऐसी फ़िल्में भारत की ग़रीबी का प्रचार करती हैं, और वही फ़िल्म अंततः राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुनी गई; और यह भी कि 'घटश्राद्ध' की पटकथा से कासरवल्ली का संस्थान के साथ कैसा उलझा हुआ रिश्ता रहा। अडूर के सिनेमा से निकाला गया उनका निष्कर्ष याद रह जाता है: "फ़िल्म आपकी नींद उड़ाने में सक्षम होनी चाहिए, हालांकि नींद बहुत बड़ी चीज़ है, अक्सर लोग जागना पसंद नहीं करते।"
निबंध का अंत एक तीखी चेतावनी से होता है। लेखक के अनुसार अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों पर 'क्षेत्रीय सिनेमा' का बिल्ला लगाकर संतुष्ट हो जाना भूल होगी; जब तक हिंदी में मुंबइया सिनेमा से अलग एक स्वतंत्र सिनेमा विकसित नहीं होता, तब तक हिंदी सिनेमा का भला नहीं हो सकता। सुमित्रा भावे की उपेक्षा पर लेखक की टिप्पणी छोटी है, पर सही जगह लगती है।
चड्ढा की पद्धति: दृश्य को शब्दों में दोबारा रचना
इस पुस्तक की आलोचना-पद्धति किसी घोषित सिद्धांत से नहीं निकलती; वह कक्षा की आदतों से निकलती है। सबसे पहली आदत है दृश्य का पुनर्निर्माण। लेखक अक्सर पूरे वाक्य छोड़कर शॉट-सूची की तरह लिखते हैं: "टोकियो शहर। धुआँ उगलती चिमनियाँ/सन् 1952/स्टेशन पर बेटा और बेटी..." । स्लैश से जुड़े ये टुकड़े पटकथा के दृश्य-शीर्षकों जैसे हैं, और इनमें पटकथा-लेखन का प्रशिक्षण साफ़ दिखता है। पाठक को लगता है कि वह फ़िल्म की समीक्षा नहीं, उसकी पटकथा उलटी दिशा में पढ़ रहा है।
दूसरी आदत है तुलना। चड्ढा किसी फ़िल्म को अकेले कभी नहीं देखते: ओज़ू के पास 'बाग़बान' और 'आनंद' रखे जाते हैं, 'बंदिनी' के पास 'इजाज़त', 'नीचा नगर' के पास 'पाथेर पांचाली', और विभूतिभूषण के पन्नों के पास राय के शॉट। एक स्थान पर वे पाठक को एक काल्पनिक अभ्यास भी देते हैं: 'टोकियो स्टोरी' की कहानी को इलाहाबाद के पास के गाँव और कोलकाता में रखकर सोचिए, और फिर देखिए कि कहानी वही रहते हुए फ़िल्म कितनी बदल जाएगी। इसी बात को वे दूसरे निबंध में सिद्धांत की तरह कहते हैं: "सिनेमा में अभिव्यक्ति बिम्ब के माध्यम से होती है। एक बिम्ब दूसरे बिम्ब से जुड़कर अर्थ की निर्मिति करता है। ... इसलिए अक्सर फ़िल्मों की कहानियाँ तो एक जैसी होती हैं, लेकिन फ़िल्में बिल्कुल अलग होती हैं।"
तीसरी आदत, और शायद सबसे अनूठी, है भौतिक ब्यौरों को प्रमाण की तरह पढ़ना। छत से लटका बल्ब, तातामी पर बैठने का ढंग, डॉक्टर के घर की अकेली कुर्सी, मिठाई के टुकड़े को लेकर पति-पत्नी की छोटी-सी होड़, दुर्गा और बीनी का साथ बैठकर खाना। पहली नज़र में ये मामूली बातें लगती हैं, पर इन्हीं से लेखक वह कसौटी बनाते हैं जिस पर हिंदी का लोकप्रिय सिनेमा अक्सर खरा नहीं उतरता। उनके शब्दों में, "हमारी मुम्बइया या बॉलीवुडीय फ़िल्में मोटी और भोथरी होती हैं।" यह वाक्य कठोर है, पर इसके पीछे का तर्क ठोस है: जो सिनेमा अपने दर्शक के घर का बल्ब नहीं देख पाता, वह उसका जीवन कैसे दिखाएगा।
चौथी आदत है पाठक से सीधा संबोधन। "आइए देखें", "याद कीजिए", "यदि आप देखना भी चाहें, तो एक ही रास्ता अपनाना पड़ेगा" जैसे वाक्य पूरी किताब में बिखरे हैं। लेखक व्यावहारिक सलाह भी देते हैं: फ़िल्म रोककर उस पर बात कीजिए, दस-पंद्रह मित्र साथ बैठकर देखिए, 'नीचा नगर' देखनी हो तो पुणे के फ़िल्म संग्रहालय के अधिकारियों से अनुरोध कीजिए। ओज़ू वाले निबंध के अंत में वे साफ़ कहते हैं कि उनका उद्देश्य केवल परिचय देना है, ताकि "दस पन्द्रह मित्र एक साथ आएँ और इन फ़िल्मों को देखें" । अर्थात् यह किताब अपने आप में पूरी होने का दावा नहीं करती; वह उस बातचीत की भूमिका है जो फ़िल्म देखने के बाद होनी चाहिए।
पाँचवीं बात आदत से अधिक एक सरोकार है: संस्थाओं की आलोचना। लेखक बार-बार हिंदी प्रदेशों के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की ओर लौटते हैं, जहाँ बच्चों को कभी यह नहीं बताया गया कि “अच्छी फ़िल्म क्या होती है और बुरी फ़िल्म क्या होती है”, और जहाँ नई विधा पर अध्ययन शुरू करने में "अध्यापकीय संकोच" आड़े आता है । इस अर्थ में 'सिनेमा से संवाद' फ़िल्मों पर किताब होने के साथ ही हिंदी की शिक्षा-व्यवस्था पर एक लंबी टिप्पणी भी है।
यह पुस्तक किसके लिए है
'सिनेमा से संवाद' सबसे अधिक उन लोगों के काम की है जो हिंदी में फ़िल्मों पर बात करना सीखना या सिखाना चाहते हैं: कस्बों और छोटे शहरों में फ़िल्म-समाज चलाने वाले, जनसंचार और हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, विद्यालयों और महाविद्यालयों के वे अध्यापक जो कक्षा में फ़िल्म दिखाना चाहते हैं, और वे साधारण दर्शक जिन्हें लगता है कि किसी फ़िल्म में कुछ है जो उनसे छूट रहा है। जो पाठक सिद्धांत की सघन पुस्तक या संदर्भ-ग्रंथ खोज रहे हैं, उन्हें इसके साथ कुछ और भी पढ़ना होगा। जन संस्करण का डेढ़ सौ रुपये का मूल्य इसे उस पाठक तक पहुँचाता है जिसके लिए यह लिखी गई है।
इसे पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका वही है जो लेखक स्वयं सुझाते हैं: एक निबंध पढ़िए, उससे जुड़ी फ़िल्म देखिए, और फिर किसी के साथ बैठकर उस पर उतनी देर बात कीजिए जितनी देर की फ़िल्म थी। इस क्रम में नीचे दी गई फ़िल्में इस पुस्तक की सहपाठ की तरह काम आएँगी।
पुस्तक के साथ देखी जाने वाली फ़िल्में
| फ़िल्म | वर्ष | निर्देशक | निबंध |
|---|---|---|---|
| नीचा नगर | 1946 | चेतन आनंद | हिन्दी फ़िल्मों की प्रगतिशील लहर |
| कोर्ट | 2014 | चैतन्य ताम्हणे | हिन्दी फ़िल्मों की प्रगतिशील लहर |
| दो बीघा ज़मीन | 1953 | बिमल राय | बिमल राय का रचना संसार |
| बंदिनी | 1963 | बिमल राय | बिमल राय का रचना संसार |
| पाथेर पांचाली | 1955 | सत्यजित राय | 'पाथेर पांचाली': उपन्यास और फ़िल्म |
| टोकियो स्टोरी | 1953 | यासुजिरो ओज़ू | जापानी फ़िल्मकार यासुजिरो ओज़ू |
| द एंड ऑफ़ समर | 1961 | यासुजिरो ओज़ू | जापानी फ़िल्मकार यासुजिरो ओज़ू |
| द सॉफ़्ट स्किन | 1964 | फ़्रांस्वा त्रूफ़ो | 'सॉफ़्ट स्किन' निर्देशक फ़्रांस्वा त्रूफ़ो |
| बाइसिकल थीव्स | 1948 | वित्तोरियो दे सीका | महान फ़िल्म समीक्षक आँद्रे बाज़ाँ |
| सिटिज़न केन | 1941 | ऑर्सन वेल्स | महान फ़िल्म समीक्षक आँद्रे बाज़ाँ |
| स्वयंवरम | 1972 | अडूर गोपालकृष्णन | क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमा |
| घटश्राद्ध | 1977 | गिरीश कासरवल्ली | क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमा |
आभार-कथन में लेखक ने इस पुस्तक के छपने को एक बहाना कहा है। पढ़ लेने के बाद लगता है कि यह बहाना अकारथ नहीं गया। नामवर जी के लिए फ़िल्म गूँगे का गुड़ रही होगी; मनमोहन चड्ढा की यह किताब उस गुड़ का स्वाद शब्दों में बताने की एक धीरजवान कोशिश है, और हिंदी के फ़िल्म-साहित्य में ऐसी कोशिशें अभी भी उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं।
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