एक कवि के बाद, अब एक वैज्ञानिक की दृष्टि

सन् 1916 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्राध्यापक और आधुनिक व्यावहारिक मनोविज्ञान के प्रणेताओं में गिने जाने वाले जर्मन मूल के विद्वान ह्यूगो म्युन्स्टरबर्ग ने सिनेमा पर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी — 'द फ़ोटोप्ले: अ साइकोलॉजिकल स्टडी' (छायानाट्य: एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन)। यह उल्लेखनीय है कि वैचेल लिंडसे की पुस्तक 'द आर्ट ऑफ़ द मूविंग पिक्चर्स' के प्रकाशन के मात्र एक वर्ष बाद ही यह दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति सामने आई — मानो सिनेमा को गंभीरता से लेने की यह चेतना अचानक ही, एक साथ कई दिशाओं से जन्म ले रही थी।

एक प्राध्यापक का सोचने का ढंग स्वाभाविक रूप से एक लोकप्रिय कवि से भिन्न था, और यह भिन्नता इन दोनों पुस्तकों की उत्पत्ति-प्रक्रिया में ही स्पष्ट झलकती है। जहाँ वैचेल लिंडसे स्वयं फ़िल्में देखने के शौक़ीन थे, और उन्होंने अपनी पुस्तक बहुत-सी फ़िल्में देख चुकने के बाद लिखी थी, वहीं म्युन्स्टरबर्ग के साथ इसका ठीक उल्टा हुआ — उनके मन में सिनेमा पर पुस्तक लिखने का विचार पहले आया, और फ़िल्में देखने का सिलसिला उन्होंने उसके बाद आरंभ किया। यह भिन्नता कोई आकस्मिक तथ्य मात्र नहीं है; यह दो भिन्न प्रकार की बौद्धिक प्रविधियों — अनुभवजन्य प्रेम और विश्लेषणात्मक जिज्ञासा — के बीच के अंतर को रेखांकित करती है। किंतु म्युन्स्टरबर्ग की अध्यापकीय पृष्ठभूमि तथा मनोविज्ञान के गहन अध्ययन से विकसित संतुलित और निरपेक्ष विचार-पद्धति ने इस पुस्तक को विशिष्ट रूप से महत्त्वपूर्ण बना दिया — जहाँ लिंडसे की पुस्तक उत्साह और काव्यात्मक दृष्टि से संचालित थी, वहीं म्युन्स्टरबर्ग की पुस्तक पद्धतिबद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण से।

म्युन्स्टरबर्ग ने अपनी पुस्तक के आरंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया कि उस समय का बौद्धिक जगत दो स्पष्ट खेमों — उच्च-भ्रू वर्ग (हाई-ब्रो) और निम्न-भ्रू वर्ग (लो-ब्रो) — में विभाजित था, और इन दो परस्पर-विरोधी विचार-प्रणालियों को एक साझे मंच पर लाना ही उनके इस मनोवैज्ञानिक अध्ययन का मूल उद्देश्य था। यह एक साहसिक बौद्धिक परियोजना थी — एक ओर वे लोग थे जो सिनेमा को निम्नस्तरीय जन-मनोरंजन से अधिक कुछ नहीं मानते थे, और दूसरी ओर वे जो इसे भविष्य की एक गंभीर कला-विधा के रूप में देखना आरंभ कर चुके थे; म्युन्स्टरबर्ग इन दोनों के बीच एक पुल बाँधना चाहते थे।

सिनेमा का अपना स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्र

कवि लिंडसे की ही भाँति, प्राध्यापक म्युन्स्टरबर्ग का भी यही दृढ़ विश्वास था कि फ़िल्म का अपना एक स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्र है, और सिनेमा का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब वह रंगमंच और उपन्यास जैसी पूर्व-स्थापित विधाओं की छाया से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ सके — यह मान्यता दोनों विचारकों को, भिन्न पृष्ठभूमियों के बावजूद, एक समान बौद्धिक भूमि पर खड़ा करती है। म्युन्स्टरबर्ग ने अपने अध्ययन की शुरुआत सिनेमा के 'बाह्य' और 'आंतरिक' विकास-बिंदुओं को परिभाषित करने से की — बाह्य विकास से उनका तात्पर्य तकनीकी और औद्योगिक प्रगति से था, जबकि आंतरिक विकास से उनका आशय सिनेमा की अपनी आंतरिक कलात्मक भाषा के क्रमिक विकास से था। इसके पश्चात् उन्होंने मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांतों को फ़िल्मों पर प्रयुक्त करते हुए सिनेमा के दर्शक पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों का एक सुव्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया।

यहाँ एक ऐतिहासिक तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है — सन् 1916 तक सिग्मुंड फ्रायड के मनोविश्लेषण-संबंधी सिद्धांत यद्यपि यूरोपीय बौद्धिक जगत में परिचित हो चुके थे, तथापि फ़िल्म-अध्ययन के क्षेत्र में उनका प्रभाव अभी प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। इसी कारण म्युन्स्टरबर्ग की सोच में एक विशिष्ट मौलिकता दिखाई देती है — वे फ़िल्म के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को फ्रायड की स्वप्न-व्याख्या या अवचेतन की अवधारणाओं के सहारे नहीं, बल्कि संज्ञानात्मक मनोविज्ञान (कॉग्निटिव साइकोलॉजी) की तत्कालीन समझ के आधार पर विश्लेषित करते हैं — ध्यान, स्मृति, कल्पना जैसी मस्तिष्क की प्रत्यक्ष प्रक्रियाओं के माध्यम से। आगे चलकर, जब फ़िल्म-सिद्धांत के क्षेत्र में फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद का व्यापक प्रचलन हुआ (विशेषकर बीसवीं शताब्दी के छठे-सातवें दशक में), तब फ़िल्म के स्वप्निल और अचेतन पक्ष पर कहीं अधिक बल दिया जाने लगा — किंतु म्युन्स्टरबर्ग की यह आरंभिक कृति उस परवर्ती परंपरा से पूर्णतः स्वतंत्र, अपने ही युग की एक मौलिक उपज थी।

ध्यान, स्मृति और भावना: दर्शक के मस्तिष्क में झाँकने का पहला प्रयास

म्युन्स्टरबर्ग ने अपने अध्ययन की आधारशिला इस प्रस्थापना पर रखी कि फ़िल्म देखते समय बिंबों की निरंतरता और जीवंतता का जो भ्रम दर्शक के मन में उत्पन्न होता है, उसका प्रभाव प्रत्येक दर्शक पर समान रूप से नहीं पड़ता — यह प्रभाव सापेक्षिक है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि दर्शक की चेतना कितनी सजग है, तथा वह प्रत्येक बिंब की व्याख्या किस प्रकार करता है। यह एक क्रांतिकारी अंतर्दृष्टि थी, क्योंकि इसने पहली बार यह प्रतिपादित किया कि सिनेमा-दर्शन कोई निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं, बल्कि दर्शक के मस्तिष्क और पर्दे के बीच चलने वाला एक सक्रिय, गतिशील संवाद है।

उनकी पुस्तक के तीन केंद्रीय अध्यायों के शीर्षक थे — 'ध्यानपूर्वक देखना' (अटेंशन), 'स्मृति एवं कल्पना' (मेमोरी एंड इमैजिनेशन), तथा 'भावनाएँ' (इमोशन्स)। इन तीनों अध्यायों में म्युन्स्टरबर्ग ने अत्यंत विस्तार से यह प्रतिपादित किया कि किस प्रकार क्लोज़-अप दर्शक के 'ध्यान' की मानसिक प्रक्रिया की ही एक सिनेमाई प्रतिकृति है — जैसे वास्तविक जीवन में हमारा मन किसी एक वस्तु पर केंद्रित होकर शेष परिवेश को धुंधला कर देता है, ठीक वैसे ही क्लोज़-अप पर्दे पर एक विशेष बिंब को उभारकर शेष दृश्य को गौण बना देता है। इसी प्रकार, उन्होंने फ़्लैशबैक और समांतर संपादन (पैरेलल एडिटिंग) की व्याख्या मानव-मन की 'स्मृति' और 'कल्पना' की स्वाभाविक प्रक्रियाओं के सिनेमाई अनुवाद के रूप में की। इन अध्यायों के माध्यम से म्युन्स्टरबर्ग ने यह स्थापित किया कि दर्शक की जागरूकता के कारण ही फ़िल्म-दर्शन एक विशुद्ध बौद्धिक प्रक्रिया का रूप ले लेती है, जहाँ दर्शक और फ़िल्मकार के बीच एक अदृश्य, किंतु सार्थक संवाद संभव हो पाता है — यह विचार आगे चलकर संरचनावादी तथा अनुभूतिवादी (कॉग्निटिविस्ट) फ़िल्म-सिद्धांत की नींव का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ सिद्ध हुआ।

दो प्रारंभिक स्वरों का संगम, और उनकी दूरगामी विरासत

वैचेल लिंडसे तथा ह्यूगो म्युन्स्टरबर्ग की इन दो प्रारंभिक पुस्तकों का सिनेमा के आगामी विकास पर निर्णायक प्रभाव पड़ा। इन दोनों कृतियों ने, अपनी भिन्न-भिन्न पद्धतियों के बावजूद, एक ही दिशा में कार्य किया — सिनेमा को एक नया, स्वतंत्र कलात्मक माध्यम मानने वालों को एक ठोस बौद्धिक और नैतिक बल प्रदान करना। इन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद से ही सिनेमा की अपनी भाषा को दुस्साहसिक प्रयोगों के माध्यम से नया अर्थ-विस्तार देने के प्रयत्न कहीं अधिक गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ आरंभ हुए।

यह कोई संयोग नहीं है कि इन दोनों पुस्तकों के कुछ ही वर्षों बाद, विश्व के अन्य भागों में भी सिनेमा को समझने के समांतर प्रयास तीव्र गति से आगे बढ़ने लगे। हंगरी के मार्क्सवादी विचारक बेला बालाज़ ने 'विज़िबल मैन' (1924) में यह प्रतिपादित किया कि क्लोज़-अप ने मानव-चेहरे को एक सर्वथा नई दृश्य-भाषा में पढ़ने की कला सिखाई है — यह विचार म्युन्स्टरबर्ग के ध्यान-संबंधी सिद्धांत का ही एक स्वाभाविक, आगे बढ़ा हुआ रूप प्रतीत होता है। जर्मन मनोवैज्ञानिक एवं कला-समीक्षक रुडोल्फ़ आर्नहाइम ने सन् 1932 में प्रकाशित अपनी कृति 'फ़िल्म ऐज़ आर्ट' में यह तर्क दिया कि सिनेमा की यथार्थ को हूबहू प्रस्तुत कर पाने की सीमाएँ ही, विरोधाभासी ढंग से, उसकी सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति का स्रोत हैं — यह भी, एक प्रकार से, म्युन्स्टरबर्ग की उस मूल मान्यता का ही विस्तार था कि सिनेमा की कला यथार्थ की नक़ल में नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक रूपांतरण में निहित है।

रूस में सर्गेई आइज़ेंस्टीन ने 'फ़िल्म फ़ॉर्म' तथा 'फ़िल्म सेंस' नामक अपने निबंध-संग्रहों में, और वी० आई० पुदोव्किन ने 'फ़िल्म टेक्निक' में संपादन के सिद्धांत (मॉन्ताज) पर क्रांतिकारी लेख लिखे — इन दोनों विचारकों ने यह सिद्ध किया कि दो शॉटों को जोड़ने भर से एक तीसरा, स्वतंत्र अर्थ उत्पन्न हो सकता है, जो मूल दोनों शॉटों में अलग-अलग उपस्थित नहीं था। जर्मनी के ही सिगफ़्रीड क्राकाउअर ने पहले 'फ़्रॉम कैलिगरी टू हिटलर' (1947) में यह विश्लेषित किया कि किस प्रकार वाइमर-युगीन जर्मन सिनेमा ने अनजाने ही आने वाले फ़ासीवाद के मनोवैज्ञानिक पूर्वाभास दिए थे, और बाद में अपनी कृति 'थियरी ऑफ़ फ़िल्म' (1960) में यथार्थ के पुनरुद्धार के माध्यम के रूप में सिनेमा के सार को परिभाषित करने का महत्त्वाकांक्षी प्रयास किया।

फ़्रांसीसी समालोचक आंद्रे बाज़ाँ का बहुखंडीय निबंध-संग्रह 'कु-एस्त्स-स क ल सिनेमा?' (अंग्रेज़ी में 'व्हाट इज़ सिनेमा?' के नाम से प्रसिद्ध) इस समूची परंपरा की अगली बड़ी कड़ी सिद्ध हुआ, जिसमें बाज़ाँ ने यथार्थवाद और गहरे फ़ोकस (डीप फ़ोकस) के सौंदर्यशास्त्र को प्रतिष्ठित किया, और आगे चलकर फ़्रांसीसी नवतरंग (नूवेल वाग) के फ़िल्मकारों को गहराई से प्रभावित किया। इसी शृंखला में आगे बढ़ते हुए, रूसी फ़िल्मकार आंद्रेई तारकोवस्की की आत्मकथात्मक कृति 'स्कल्प्टिंग इन टाइम', फ़्रांसीसी निर्देशक रोबेर ब्रेसों की संक्षिप्त किंतु गहन 'नोट्स ऑन द सिनेमैटोग्राफ़', अमरीकी विद्वान जेम्स मोनाको की सर्वाधिक पठित परिचयात्मक कृति 'हाउ टु रीड अ फ़िल्म', तथा डेविड बोर्डवेल और क्रिस्टिन थॉम्पसन की विश्वविद्यालयों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली पाठ्य-पुस्तक 'फ़िल्म आर्ट' — इन सभी कृतियों ने मिलकर सिनेमा-अध्ययन को विश्वविद्यालयों के भीतर एक सुस्थापित, सम्मानित अकादमिक अनुशासन का दर्जा दिला दिया।

इस प्रकार, सन् 1915 में वैचेल लिंडसे की वह पहली, अकेली काव्यात्मक आवाज़, और सन् 1916 में म्युन्स्टरबर्ग का यह पहला वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण — ये दोनों मिलकर सिनेमा-सिद्धांत की उस समृद्ध, विश्वव्यापी बौद्धिक परंपरा के दो आधार-स्तंभ बने, जिस पर आगे चलकर बालाज़, आर्नहाइम, आइज़ेंस्टीन, पुदोव्किन, क्राकाउअर, बाज़ाँ, तारकोवस्की और बोर्डवेल-थॉम्पसन जैसे अगणित विचारकों ने अपनी-अपनी ईंटें चुनीं। यह सुखद संयोग ही है कि सिनेमा जैसी एक यांत्रिक, औद्योगिक आविष्कार से जन्मी कला को, उसके जन्म के मात्र बीस वर्षों के भीतर ही, एक कवि की काव्यात्मक दृष्टि और एक वैज्ञानिक की विश्लेषणात्मक दृष्टि — दोनों से एक साथ, इतनी गंभीरता से परखा गया।